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UP: युवक के दो हत्यारों को फांसी की सजा, एक हत्यारे की पत्नी से थे अवैध संबंध, गला घोंटकर जला दिया था शव

अमर उजाला नेटवर्क, मुजफ्फरनगर Published by: Mohd Mustakim Updated Sun, 21 Jun 2026 11:48 AM IST
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सार

Muzaffarnagar News: मुजफ्फरनगर जिले के ककरौली गांव निवासी राजेंद्र सैनी की हत्या में मेरठ निवासी गजेंद्र और रामकरण को फांसी की सजा दी गई है। कोर्ट ने सजा सुनाते हुए दोनों के ऊपर सख्त टिप्पणी भी की है।  

UP: Two killers of a young man sentenced to death; one had an illicit relationship with the other's wife
कोर्ट। सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Freepik
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विस्तार

ककरौली के अविवाहित राजेंद्र सैनी (28) की हत्या के मामले में दोषी मेरठ के गजेंद्र उर्फ गीलू (38) और रामकरण उर्फ सावन गिरी (75) को अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई है। मुख्य आरोपी वीरसैन की डेढ़ साल पहले बीमारी से मौत हो चुकी है। अवैध संबंधों के शक में आठ साल पहले कपड़े से गला घोंटकर हत्या करने के बाद शव को खेत में पेट्रोल से जला दिया गया था। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-03 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने फैसला सुनाया। अपराध को विरल से विरलतम माना गया।

 

चार जून 2018 की सुबह 10 बजे राजेंद्र बाइक पर सवार होकर आरोपियों के साथ घर से निकला था। पांच जून को मीरापुर थानाक्षेत्र के खेड़ी गांव के जंगल में जली अवस्था में शव बरामद हुआ। पुलिस ने 11 जून 2018 को तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर वारदात का खुलासा किया था।
वीरसैन और राजेंद्र सैनी के बीच दोस्ती थी। गांव के मंदिर पर रह रहे मेरठ के बहसूमा थानाक्षेत्र के मोहम्मदपुर गांव निवासी रामकरण उर्फ सावन गिरी के साथ बैठकर दोनों शराब पीते थे। वीरसैन को शक था कि राजेंद्र उसकी पत्नी से बात करता है। दोनों के बीच झगड़ा हुआ।
 
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इसके बाद वीरसैन ने सावन के साथ मिलकर हत्या की योजना बनाई और मोहम्मदपुर के गीलू को भी शामिल कर लिया। शराब की दावत के लिए आरोपी बाइक पर राजेंद्र को मोहम्मदपुर ले गए। नशे की हालत में कपड़े से गला घोंटकर हत्या कर दी और शव को खेड़ी के जंगल में लाकर पेट्रोल से जला दिया था। अभियोजन पक्ष ने अदालत में आठ गवाह पेश किए। बुधवार को दो आरोपियों पर दोष सिद्ध हुआ था। शनिवार को अदालत ने दोषियों को मृत्युदंड और एक लाख रुपये अर्थदंड लगाया गया।
 
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अभियुक्त सोचते होंगे...लाश नहीं तो केस नहीं
अदालत ने टिप्पणी में लिखा कि अभियुक्त टीवी शो या फिल्मों से प्रेरित होकर सोचते होंगे कि नो बॉडी, नो केस (लाश नहीं तो केस नहीं)। न्यायालय के मतानुसार यह एक व्यावहारिक भ्रम होता है, क्योंकि सच, सच होता है, वह लाख प्रयास करने के बाद भी छिपता नही है। आधुनिक समय में फोरेंसिक साइंस डीएनए के जरिये भी मौत का कारण पता लग ही जाता है।
 

दोषियों की भावभंगिमा में पश्चाताप नहीं
अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-03 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने 49 पेज के फैसले में लिखा कि सॉफ्ट जस्टिस अर्थात कोमल न्याय से समाज में गलत संदेश जाएगा। राजेंद्र सैनी की हत्या पाश्विक ढंग से की गई। दोषियों की भावभंगिमा में कभी पश्चाताप नहीं दिखा। दोषियों का जीवित रहना सार्वजनिक एवं सामाजिक सुरक्षा के लिए खतरा है।
 

फैसले के दूसरे हिस्से के आठवें पेज पर सात जून 2018 को पुलिस की ओर से शिनाख्त के लिए जारी जले हुए शव का फोटो भी लगाया गया। अदालत ने लिखा कि दया एक मानवीय गुण है लेकिन दोषियों में इसका घोर अभाव है। मृत्यु की वजह गला दबाने से दम घुटने के कारण हुई। गहरी व्यक्तिगत दुश्मनी या बदला लेने की प्रवृत्ति रही होगी। घृणा एवं नफरत को जाहिर करने के लिए शव को जलाकर विकृत कर दिया गया। हत्या करने के बाद शव को बुरी तरह से जला देने के पीछे मुख्य रूप से सबूत मिटाने और पकड़े जाने का गहरा डर था।
 

ऐसी गंभीर और हिंसक घटनाओं के पीछे कई तरह की मानसिक स्थितियां और रणनीतियां होती है। यह रणनीति भी हो सकती है कि मृतक राजेंद्र सैनी के शरीर को बुरी तरह से जलाकर अभियुक्त पुलिस के लिए मृतक की पहचान करना नामुमकिन बनाना चाहते हो। वह मृतक का चेहरा दोबारा नहीं देखना चाहते हो, क्योंकि मृतक राजेंद्र सैनी का अभियुक्त वीरसेन की पत्नी से अवैध संबंध का शक था।
 

डीएनए से हुई पहचान...चंपा देवी साबित हुई मां
मृतक राजेंद्र सैनी का पूरा शरीर जला होने के कारण हुलिया स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। शरीर पर कोई कपड़ा मौजूद नहीं था। कपड़े जलकर शरीर से चिपके हुए थे। जली हुई अवस्था में होने के कारण कोई भी चोट स्पष्ट नहीं हुई। पहचान के लिए डीएनए परीक्षण करवाया गया। रिपोर्ट में मृतक की बायोलॉजिकल मां चंपा देवी पाई गई।
 

अदालत ने लिखा...इसलिए जरूरी है मृत्युदंड
मृत्युदंड अपराधियों में भय उत्पन्न करता है और भविष्य में होने वाली हत्याओं को रोकता है। समाज में हमेशा अपराधियों को गैर कानूनी गतिविधियों से रोकने के लिए दंड का उपयोग किया है। समाज का सर्वोपरि हित हत्या को रोकना है। इसलिए हत्या को रोकने के लिए उपलब्ध सबसे कठोर दंड अर्थात मृत्युदंड का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि समाज में अमन-चैन बना रहे और जो व्यक्ति कानून का सम्मान नहीं करते हैं, ऐसे व्यक्तियों में कानून का भय दिखे और वे ऐसी आपराधिक घटनाओं में शामिल होने से पहले सौ बार सोचें। यह उचित है कि न कोई मारा जाए और न ही किसी के प्राण लिए जाएं और न ही किसी को फांसी पर लटकाया जाए लेकिन क्या यह व्यावहारिक दृष्टि से संभव है, शायद नहीं। समाज में किसी निर्दोष की हत्या न हो, इसलिए भी न्यायालय को ऐसे मामलों में मृत्युदंड अवश्य ही देना चाहिए। सभी को जीवित रहने का समान अधिकार है। जीवन ईश्वर देता है, तो जीवन केवल ईश्वर ही ले सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की जान ले लेता है, तो ऐसे व्यक्ति को भी जीने का अधिकार नहीं रह जाता है। समाज में ऐसा व्यक्ति दया का पात्र नहीं रह जाता है और चाहे वह कोई भी क्यों न हो, यह न्यायसंगत भी है कि उसे अपनी करनी का वैसा ही फल मिलना ही चाहिए।

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