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Pratapgarh News: उम्मीद...अब जहरीली मिट्टी में भी उग सकेगा सुरक्षित गेहूं
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मुख्य शोधकर्ता आनंद कुमार। स्रोत: शोधकर्ता
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एमएनएनआईटी का एक शोध अगर जमीन पर उतरता है तो जहरीली मिट्टी में भी गेहूं उगाया जा सकेगा। इससे देश में गेहूं के उत्पादन में अभूतपूर्व उछाल आ सकता है।
दरअसल, खेतों की मिट्टी में बढ़ता जहरीला लेड (सीसा) अब केवल जमीन तक सीमित नहीं रह गया है। धीरे-धीरे खाद्य सामग्री के माध्यम से लोगों की थाली तक पहुंच रहा है। गेहूं सहित अन्य फसलों के जरिये यह मानव शरीर में प्रवेश कर सकती है। इससे तंत्रिका तंत्र, रक्त, गुर्दा संबंधी और विकासात्मक विकारों जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
इस चिंता के बीच मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) की जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर राधा रानी के मार्गदर्शन में आनंद कुमार, मयंक भास्कर और अखिल पांडेय ने शोध किया। पाया कि खास सूक्ष्मजीवों और एन-एसिटाइलसिस्टीन (एनएसी) का एक साथ इस्तेमाल कर गेहूं के दानों में लेड की मात्रा करीब 54 प्रतिशत तक कम हो गई। यह शोध एल्सवियर जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
ऐसे किया गया पूरा प्रयोग
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने मिट्टी में कृत्रिम रूप से लेड मिलाकर उसमें गेहूं की खेती की। अलग-अलग समूह बनाकर कुछ पौधों को केवल लेड दिया गया, जबकि कुछ में सूक्ष्मजीव, एनएसी और दोनों का संयुक्त उपयोग किया गया। करीब 120 दिनों तक मिट्टी और पौधों की स्थिति का अध्ययन किया गया।
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मिट्टी भी सुधरी, फसल भी हुई बेहतर
शोध में सामने आया कि सूक्ष्मजीव और एनएसी के संयुक्त उपयोग से मिट्टी में पोषक तत्व और लाभकारी बैक्टीरिया सात प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक बढ़ गए। पौधों में हरियाली बढ़ी, क्लोरोफिल बेहतर हुआ और कुल बायोमास लगभग 48 प्रतिशत तक बढ़ गया। इससे गेहूं की पैदावार पहले की तुलना में काफी अच्छी रही। शोधकर्ताओं के अनुसार एनएसी भारी धातुओं को बांधकर उनका जहरीला असर कम करता है, जबकि सूक्ष्मजीव लेड को मिट्टी में रोक कर उसकी मौजूदगी घटा देते हैं।
भोजन सुरक्षा की दिशा में अहम कदम
शोध में यह भी पाया गया कि इस तकनीक से जड़ों और तनों में लेड का जमाव काफी कम हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि गेहूं के खाने योग्य दानों तक लेड पहुंचना बहुत कम हो गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ तकनीक आने वाले समय में भारी धातुओं से प्रभावित खेतों में सुरक्षित खेती का नया रास्ता खोल सकती है।
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दरअसल, खेतों की मिट्टी में बढ़ता जहरीला लेड (सीसा) अब केवल जमीन तक सीमित नहीं रह गया है। धीरे-धीरे खाद्य सामग्री के माध्यम से लोगों की थाली तक पहुंच रहा है। गेहूं सहित अन्य फसलों के जरिये यह मानव शरीर में प्रवेश कर सकती है। इससे तंत्रिका तंत्र, रक्त, गुर्दा संबंधी और विकासात्मक विकारों जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
इस चिंता के बीच मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) की जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर राधा रानी के मार्गदर्शन में आनंद कुमार, मयंक भास्कर और अखिल पांडेय ने शोध किया। पाया कि खास सूक्ष्मजीवों और एन-एसिटाइलसिस्टीन (एनएसी) का एक साथ इस्तेमाल कर गेहूं के दानों में लेड की मात्रा करीब 54 प्रतिशत तक कम हो गई। यह शोध एल्सवियर जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
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ऐसे किया गया पूरा प्रयोग
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने मिट्टी में कृत्रिम रूप से लेड मिलाकर उसमें गेहूं की खेती की। अलग-अलग समूह बनाकर कुछ पौधों को केवल लेड दिया गया, जबकि कुछ में सूक्ष्मजीव, एनएसी और दोनों का संयुक्त उपयोग किया गया। करीब 120 दिनों तक मिट्टी और पौधों की स्थिति का अध्ययन किया गया।
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मिट्टी भी सुधरी, फसल भी हुई बेहतर
शोध में सामने आया कि सूक्ष्मजीव और एनएसी के संयुक्त उपयोग से मिट्टी में पोषक तत्व और लाभकारी बैक्टीरिया सात प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक बढ़ गए। पौधों में हरियाली बढ़ी, क्लोरोफिल बेहतर हुआ और कुल बायोमास लगभग 48 प्रतिशत तक बढ़ गया। इससे गेहूं की पैदावार पहले की तुलना में काफी अच्छी रही। शोधकर्ताओं के अनुसार एनएसी भारी धातुओं को बांधकर उनका जहरीला असर कम करता है, जबकि सूक्ष्मजीव लेड को मिट्टी में रोक कर उसकी मौजूदगी घटा देते हैं।
भोजन सुरक्षा की दिशा में अहम कदम
शोध में यह भी पाया गया कि इस तकनीक से जड़ों और तनों में लेड का जमाव काफी कम हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि गेहूं के खाने योग्य दानों तक लेड पहुंचना बहुत कम हो गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ तकनीक आने वाले समय में भारी धातुओं से प्रभावित खेतों में सुरक्षित खेती का नया रास्ता खोल सकती है।