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चातुर्मास शुरू : चार महीने थमेगी शहनाई, त्योहारों की रहेगी झड़ी
Mon, 27 Jul 2026 01:47 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 27 Jul 2026 01:47 AM IST
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देवशयनी एकादशी से देवोत्थान तक मांगलिक कार्यों पर विराम, सावन से दीपावली तक आस्था के रंग में रंगेगा माहौल
सिद्धार्थनगर। चार महीने तक शहनाइयों की आवाज धीमी रहेगी लेकिन मंदिरों की घंटियां और त्योहारों की रौनक बढ़ती जाएगी। शनिवार आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से चातुर्मास की शुरुआत हो गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा। हालांकि सावन से लेकर दीपावली तक धार्मिक पर्वों की लंबी शृंखला चलेगी। इस दौरान आस्था, बाजार, खेती और लोगों की दिनचर्या में भी बदलाव दिखाई देगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित सतीश मणि त्रिपाठी के अनुसार चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है और इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवोत्थान एकादशी को माना जाता है। करीब चार महीने की इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत और नए शुभ कार्यों की शुरुआत नहीं करने की परंपरा है। मान्यता है कि देवोत्थान एकादशी के बाद भगवान विष्णु के जागने के साथ ही मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होता है। बाजार के नजरिए से देखें तो मांगलिक कार्यों पर भले ही विराम रहेगा लेकिन धार्मिक उत्सवों की रौनक बनी रहेगी। चातुर्मास में सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास के कई बड़े पर्व आएंगे।
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सावन से दीपावली तक त्योहारों की झड़ी
- सावन में शिव भक्ति का रंग: सावन मास में भगवान शिव की आराधना, सावन सोमवार, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक जैसे धार्मिक आयोजन होंगे।
- भाद्रपद में कृष्ण और गणपति उत्सव : इस दौरान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी और अनंत चतुर्दशी जैसे पर्व मनाए जाएंगे।
- आश्विन में शक्ति अराधना : पितृ पक्ष के बाद शारदीय नवरात्र, दुर्गा पूजा और दशहरा का आयोजन होगा।
- कार्तिक में दीपों का पर्व : करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज के बाद देवोत्थान एकादशी के साथ चातुर्मास का समापन होगा।
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बाजार में बदलेगी खरीदारी की तस्वीर
- चातुर्मास शुरू होने के साथ ही शादी-ब्याह से जुड़े कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ेगी। मैरिज हॉल, टेंट, कैटरिंग, बैंड-बाजा, फूल सजावट, कपड़ा और आभूषण कारोबार में मांग कम होगी। वहीं, त्योहारों की तैयारी के कारण पूजा सामग्री, सजावट के सामान, मिठाई, मिट्टी के दीपक और धार्मिक वस्तुओं के बाजार में गतिविधियां बढ़ेंगी। व्यापारियों का कहना है कि चार महीने तक शादी कारोबार प्रभावित रहता है, लेकिन त्योहारों के मौसम में दूसरे क्षेत्रों के कारोबार को सहारा मिलता है।
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बारिश के मौसम से भी जुड़ी हैं परंपराएं
- चातुर्मास का समय बारिश और मौसम परिवर्तन का दौर भी होता है। नमी बढ़ने से संक्रमण और पाचन संबंधी समस्याओं की आशंका को देखते हुए इस अवधि में सात्विक भोजन, संयमित दिनचर्या और स्वच्छता पर जोर देने की परंपरा रही है। कई लोग अपनी मान्यता के अनुसार हरी सब्जियां, मांसाहार और कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं।
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मठ-मंदिरों में बढ़ेगी धार्मिक गतिविधियां
- चातुर्मास में साधु-संतों के एक स्थान पर रहकर साधना, प्रवचन और धर्म चर्चा करने की परंपरा है। मंदिरों में कथा, पूजा और धार्मिक आयोजनों की संख्या बढ़ जाती है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में अधिक समय देते हैं।
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खेतों में बढ़ेगी रौनक, गांवों में तेज होंगी गतिविधियां
- तराई क्षेत्र में चातुर्मास का समय खेती-किसानी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होता है। बारिश के साथ धान रोपाई और खरीफ फसलों की देखभाल का काम तेज हो जाता है। ऐसे में धार्मिक परंपराओं के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी सक्रिय रहती है।
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फैक्ट फाइल : चातुर्मास
- चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से होती है।
- इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवोत्थान एकादशी को माना जाता है।
- अवधि करीब चार महीने की होती है।
- इस दौरान साधना, व्रत और धार्मिक गतिविधियों का महत्व बढ़ जाता है।
- मांगलिक कार्यों पर विराम के बाद शुभ कार्य फिर शुरू होते हैं।
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सिद्धार्थनगर। चार महीने तक शहनाइयों की आवाज धीमी रहेगी लेकिन मंदिरों की घंटियां और त्योहारों की रौनक बढ़ती जाएगी। शनिवार आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से चातुर्मास की शुरुआत हो गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा। हालांकि सावन से लेकर दीपावली तक धार्मिक पर्वों की लंबी शृंखला चलेगी। इस दौरान आस्था, बाजार, खेती और लोगों की दिनचर्या में भी बदलाव दिखाई देगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित सतीश मणि त्रिपाठी के अनुसार चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है और इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवोत्थान एकादशी को माना जाता है। करीब चार महीने की इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत और नए शुभ कार्यों की शुरुआत नहीं करने की परंपरा है। मान्यता है कि देवोत्थान एकादशी के बाद भगवान विष्णु के जागने के साथ ही मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होता है। बाजार के नजरिए से देखें तो मांगलिक कार्यों पर भले ही विराम रहेगा लेकिन धार्मिक उत्सवों की रौनक बनी रहेगी। चातुर्मास में सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास के कई बड़े पर्व आएंगे।
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सावन से दीपावली तक त्योहारों की झड़ी
- सावन में शिव भक्ति का रंग: सावन मास में भगवान शिव की आराधना, सावन सोमवार, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक जैसे धार्मिक आयोजन होंगे।
- भाद्रपद में कृष्ण और गणपति उत्सव : इस दौरान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी और अनंत चतुर्दशी जैसे पर्व मनाए जाएंगे।
- आश्विन में शक्ति अराधना : पितृ पक्ष के बाद शारदीय नवरात्र, दुर्गा पूजा और दशहरा का आयोजन होगा।
- कार्तिक में दीपों का पर्व : करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज के बाद देवोत्थान एकादशी के साथ चातुर्मास का समापन होगा।
बाजार में बदलेगी खरीदारी की तस्वीर
- चातुर्मास शुरू होने के साथ ही शादी-ब्याह से जुड़े कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ेगी। मैरिज हॉल, टेंट, कैटरिंग, बैंड-बाजा, फूल सजावट, कपड़ा और आभूषण कारोबार में मांग कम होगी। वहीं, त्योहारों की तैयारी के कारण पूजा सामग्री, सजावट के सामान, मिठाई, मिट्टी के दीपक और धार्मिक वस्तुओं के बाजार में गतिविधियां बढ़ेंगी। व्यापारियों का कहना है कि चार महीने तक शादी कारोबार प्रभावित रहता है, लेकिन त्योहारों के मौसम में दूसरे क्षेत्रों के कारोबार को सहारा मिलता है।
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बारिश के मौसम से भी जुड़ी हैं परंपराएं
- चातुर्मास का समय बारिश और मौसम परिवर्तन का दौर भी होता है। नमी बढ़ने से संक्रमण और पाचन संबंधी समस्याओं की आशंका को देखते हुए इस अवधि में सात्विक भोजन, संयमित दिनचर्या और स्वच्छता पर जोर देने की परंपरा रही है। कई लोग अपनी मान्यता के अनुसार हरी सब्जियां, मांसाहार और कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं।
मठ-मंदिरों में बढ़ेगी धार्मिक गतिविधियां
- चातुर्मास में साधु-संतों के एक स्थान पर रहकर साधना, प्रवचन और धर्म चर्चा करने की परंपरा है। मंदिरों में कथा, पूजा और धार्मिक आयोजनों की संख्या बढ़ जाती है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में अधिक समय देते हैं।
खेतों में बढ़ेगी रौनक, गांवों में तेज होंगी गतिविधियां
- तराई क्षेत्र में चातुर्मास का समय खेती-किसानी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होता है। बारिश के साथ धान रोपाई और खरीफ फसलों की देखभाल का काम तेज हो जाता है। ऐसे में धार्मिक परंपराओं के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी सक्रिय रहती है।
फैक्ट फाइल : चातुर्मास
- चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से होती है।
- इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवोत्थान एकादशी को माना जाता है।
- अवधि करीब चार महीने की होती है।
- इस दौरान साधना, व्रत और धार्मिक गतिविधियों का महत्व बढ़ जाता है।
- मांगलिक कार्यों पर विराम के बाद शुभ कार्य फिर शुरू होते हैं।