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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sonebhadra News ›   UP last village No longer smell of gunpowder but peace and serenity on every face terrorized by Naxalites

UP का अंतिम गांव: अब बारूद की गंध नहीं, शांति और सुकून, कभी नक्सलियों का आतंक; बिहार से सटे बसुहारी की कहानी

Sat, 15 Aug 2026 08:24 AM IST
Sharukh Khan मनीष जायसवाल, अमर उजाला, सोनभद्र
मनीष जायसवाल, अमर उजाला, सोनभद्र Published by: Sharukh Khan Updated Sat, 15 Aug 2026 08:24 AM IST
सार

बिहार-झारखंड सीमा से सटे यूपी के अंतिम गांव बसुहारी में कभी हथियारबंद नक्सलियों का आतंक था। अब यहां बारूद की गंध नहीं हर चेहरे पर शांति और सुकून है। अब सड़क, स्कूल, बिजली और प्रस्तावित पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं से रोजगार व विकास की उम्मीद जगी हैं।

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UP last village No longer smell of gunpowder but peace and serenity on every face terrorized by Naxalites
यूपी के अंतिम गांव बसुहारी गांव का प्राथमिक विद्यालय - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

यूपी का अंतिम गांव बसुहारी अब शांत है। कभी नक्सली आतंक के कारण पहचाना जाने वाला यह गांव अब विकास और बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। गांव में नए स्कूल खुल चुके हैं। पक्की सड़क बन चुकी है। बिजली-पानी की सुविधा है। 
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बारूद की गंध भी नहीं है लेकिन सार्वजनिक परिवहन सेवा और मोबाइल नेटवर्क की समस्या बनी हुई है। मोबाइल का 2जी नेटवर्क है जो पूरे गांव को भी कवर नहीं कर पाता। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 22 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
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बिहार और झारखंड सीमा पर बसा बसुहारी वही गांव है जहां कभी हथियारबंद नक्सलियों की आवाजाही के कारण ग्रामीण हर वक़्त खौफ के साये में जीते थे। आज इस गांव के हालात बदल चुके हैं। ग्रामीणों के चेहरे पर अब शांति और सुकून का भाव है। फिजाओं में बारूद की गंध की जगह विकास और बदलाव की खुशबू महसूस की जा सकती है। 
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हाल ही में सुरक्षा बलों की ओर से भाकपा माओवादी के अंतिम पोलित ब्यूरो सदस्य और दो करोड़ के इनामी मिसिर बिसरा की गिरफ्तारी के बाद अमर उजाला की टीम इस सीमावर्ती गांव पहुंची तो वहां ग्रामीणों में उत्साह और भरोसा साफ नजर आया। पहले भय के कारण गांव छोड़ने वाले लोग भी इसे लेकर आशान्वित दिखे।

 

ये बदलाव आया
सोन नदी पर चांची कला से रानीडीह के बीच पक्का पुल बन चुका है।
गांव के अंतिम छोर तक डामरयुक्त चौड़ी पीएमजीएसवाई सड़क है।
सुरक्षा के लिए चननी और पोखरिया में दो पुलिस चौकी है।
दो प्राथमिक, एक कंपोजिट और एक राजकीय बालिका हाईस्कूल (सह शिक्षा) भी बन चुका है।
घरों तक पाइप से पानी पहुंचने लगा है। बिजली भी आ रही है।
 

सुधार की दरकार अब भी
  • यातायात साधनों की कमी है। बाइक, साइकिल सहित अन्य निजी साधन ही गांव तक आवागमन का जरिया है।
  • 5-जी के दौर में भी गांव में मोबाइल नेटवर्क नहीं है। चौकी परिसर में बीएसएनएल के 2-जी टॉवर लगे हैं, मगर इनकी क्षमता कम होने से आसपास खड़े होकर ही बात हो पाती है।

हर काम के बदले पहुंचाना पड़ता था हिस्सा
वर्ष 2001 से 05 तक इस गांव का प्रधान रहा। तब नक्सल गतिविधियां भी चरम पर थीं। गांव में जो भी पैसा विकास के लिए आता था, उसमें से 10 प्रतिशत हिस्सा पीसी (लेवी) के रूप में नक्सलियों को देना ही पड़ता था। इसके बाद भी काम कराने में तरह-तरह की दिक्कतें थीं। सचिव तो गांव में आने से ही कतराते थे। -बलिराम सिंह खरवार, पूर्व प्रधान।

 

फूंक दिया था मकान, गांव में रुकना था मुश्किल
नक्सलियों से सबसे ज्यादा प्रताड़ित हमारा परिवार रहा। मकान फूंक दिया गया था। हर वक्त उत्पीड़न की ताक में रहते थे। हालात इतने खराब थे कि गांव छोड़कर ज्यादातर रॉबर्ट्सगंज ही रहना पड़ता था। नक्सल गतिविधियां खत्म हुई तब गांव में स्थाई रूप से निवास हुआ है। -मुन्ना सिंह, ग्रामीण।

गांव से एक किमी पर बिहार की सीमा, सोन नदी के ठीक पीछे झारखंड
कोन ब्लॉक (पहले नगवां) की चननी ग्राम पंचायत चार टोलों में बसा है। पोखरिया, चननी, अरगुड़ और बसुहारी की कुल आबादी करीब पांच हजार है। गांव से एक किमी पर बिहार की सीमा है, जबकि गांव के पीछे बहने वाली सोन नदी के ठीक पीछे झारखंड है।

गांव तक पहुंचने के लिए पहले लोगों को चांची कला से नाव के सहारे सोन नदी पार कर आना-जाना होता था। नगवां और पटवध से गांव तक सड़क आती थी, लेकिन कच्ची, पथरीली, पहाड़ी, घुमावदार होने के साथ ही बेहद दुरुह व खतरनाक थी। गांव में सीधे संपर्क का कोई जरिया नहीं था। नक्सलियों ने इसी जटिलता का लाभ उठाते हुए इसे अपना ठिकाना बनाया था।
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