{"_id":"6a3988b9713622cdde0fa850","slug":"unnao-news-unnao-news-c-221-1-sknp1054-152661-2026-06-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"Unnao News: ईंट-भट्ठों को जिग-जैग तकनीक में बदलने के लिए मांगी दो साल की मोहलत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Unnao News: ईंट-भट्ठों को जिग-जैग तकनीक में बदलने के लिए मांगी दो साल की मोहलत
विज्ञापन
फोटो-19- मांगपत्र देते ईंट निर्माता कल्याण समिति के अध्यक्ष रविसहाय मिश्र व अन्य। स्रोत: संगठन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
उन्नाव। ईंट निर्माता कल्याण समिति ने भट्ठों का संचालन जिग-जैग तकनीक से करने के आदेश में दो साल की मोहलत मांगी है। संघ अध्यक्ष रवि सहाय मिश्र ने सदर विधायक पंकज गुप्ता के माध्यम से मुख्यमंत्री को मांगपत्र भेजा। उन्होंने सदन में भी मुद्दे को रखने की मांग की है।
समिति अध्यक्ष ने बताया कि ईंट-भट्ठा उद्योग मंदी और बढ़ती लागत से जूझ रहा है। ईंट भट्ठा हजारों परिवारों को रोजगार देता है। एक ईंट भट्ठे को जिग-जैग तकनीक में बदलने में करीब 50 लाख से 60 लाख रुपये खर्च आता है। सरकार से वित्तीय सहायता भी नहीं मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय युद्धों के प्रभाव से कोयला और पेट्रोलियम महंगा हुआ है जिससे उत्पादन लागत बढ़ी है। बेमौसम बारिश के कारण उत्पादन आधा रह गया है। पर्यावरण नियमों से आग जलाने में देरी से भी उत्पादन प्रभावित हो रहा है। सरकार दो साल की मोहलत देकर संचालकों को राहत दे। सदर विधायक ने मांग पत्र मुख्यमंत्री तक पहुंचाने और समस्या से अवगत कराने का आश्वासन दिया।
ये है जिग-जैग तकनीक
इस तकनीक में धुएं को चिमनियों में टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजारकर अधिक समय तक रोका जाता है। इससे हानिकारक कण वातावरण में नहीं फैलते और वे ठीक से जल जाते है। इस तकनीक से धुएं में 70 फीसदी तक कमी लाती है। ईंधन की खपत भी घटती है; सामान्य भट्ठों में 26 टन की जगह 15 से 20 टन कोयला लगता है। ईंटों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है, हालांकि हाईस्पीड पंखों से बिजली का खर्च बढ़ता है।
विज्ञापन
समिति अध्यक्ष ने बताया कि ईंट-भट्ठा उद्योग मंदी और बढ़ती लागत से जूझ रहा है। ईंट भट्ठा हजारों परिवारों को रोजगार देता है। एक ईंट भट्ठे को जिग-जैग तकनीक में बदलने में करीब 50 लाख से 60 लाख रुपये खर्च आता है। सरकार से वित्तीय सहायता भी नहीं मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय युद्धों के प्रभाव से कोयला और पेट्रोलियम महंगा हुआ है जिससे उत्पादन लागत बढ़ी है। बेमौसम बारिश के कारण उत्पादन आधा रह गया है। पर्यावरण नियमों से आग जलाने में देरी से भी उत्पादन प्रभावित हो रहा है। सरकार दो साल की मोहलत देकर संचालकों को राहत दे। सदर विधायक ने मांग पत्र मुख्यमंत्री तक पहुंचाने और समस्या से अवगत कराने का आश्वासन दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
ये है जिग-जैग तकनीक
इस तकनीक में धुएं को चिमनियों में टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजारकर अधिक समय तक रोका जाता है। इससे हानिकारक कण वातावरण में नहीं फैलते और वे ठीक से जल जाते है। इस तकनीक से धुएं में 70 फीसदी तक कमी लाती है। ईंधन की खपत भी घटती है