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Unnao News: कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की दुर्दशा पर इंजीनियर भी हैरान
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फोटो-29- कानपुर-लखनऊ लेन पर किमी संख्या 69 के पास उखड़ी सड़क की दिखती गिट्टियां। संवाद
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उन्नाव। कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की दुर्दशा ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है। हाल ही में शुरू हुआ यह एक्सप्रेसवे कई जगहों पर धंस गया है। सिविल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ इसे खतरनाक बता रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 45 किलोमीटर ग्रीन फील्ड हिस्से की पूरी सड़क बनाने में कम से कम तीन महीने का वक्त लग सकता है।
पीडब्ल्यूडी के सेवानिवृत्त इंजीनियर रंजीत कुमार ने बताया कि हल्की सी बारिश में ही सड़क (बिटुमिन) का उखड़ना सामान्य घटना नहीं है। उनका मानना है कि एक्सप्रेसवे के निर्माण तकनीकी परीक्षण में बड़े पैमाने पर लापरवाही हुई है। मिट्टी की भार करने के बाद उसकी भार क्षमता को नहीं जांचा गया और पूरी क्षमता से यातायात शुरू होते ही सड़क भार नहीं सह पाई। यह भी कहा जा सकता है कि एक्सप्रेसवे का डिजाइन, भारत के वास्तविक यातायात भार के लायक नहीं था।
तकनीक के दावों भी सवाल
उन्नाव। एनएचएआई का दावा है कि यह एक्सप्रेसवे एआईएमसी तकनीक से बनाया गया है। इस तकनीक में सड़क में उपयोग होने वाली सामग्रियों में जैसे डामर कंक्रीट की गुणवत्ता की एआई मशीनों से जांच की जाती है। यह तकनीक सड़क में मिश्रण, बिछाने की प्रक्रिया, उसकी संरचना, तापमान, नमी व अन्य महत्वपूर्ण मापदंडों की निगरानी करके निर्माण पूरा किया जाता है। एनएचएआई के इंजीनियर राजीव कुमार ने बताया कि एआईएमसी तकनीक के माध्यम से सामग्री के मिश्रण में गलती नहीं होती। तकनीक में विभिन्न सेंसर, कैमरे और डेटा विश्लेषण उपकरण शामिल होते हैं। उपकरण निर्माण स्थल पर सामग्री के गुणों को मापते हैं। यदि डामर का मिश्रण बहुत गर्म या ठंडा है, तो एआई सिस्टम तापमान को समायोजित करने का संकेत देता है। 45 किलोमीटर ग्रीन फील्ड हिस्से में केवल 15 किमी हिस्से में बनी सड़क में कमी आई है। किस स्तर पर क्या गड़बड़ी हुई जांच में स्पष्ट हो जाएगा।
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पीडब्ल्यूडी के सेवानिवृत्त इंजीनियर रंजीत कुमार ने बताया कि हल्की सी बारिश में ही सड़क (बिटुमिन) का उखड़ना सामान्य घटना नहीं है। उनका मानना है कि एक्सप्रेसवे के निर्माण तकनीकी परीक्षण में बड़े पैमाने पर लापरवाही हुई है। मिट्टी की भार करने के बाद उसकी भार क्षमता को नहीं जांचा गया और पूरी क्षमता से यातायात शुरू होते ही सड़क भार नहीं सह पाई। यह भी कहा जा सकता है कि एक्सप्रेसवे का डिजाइन, भारत के वास्तविक यातायात भार के लायक नहीं था।
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तकनीक के दावों भी सवाल
उन्नाव। एनएचएआई का दावा है कि यह एक्सप्रेसवे एआईएमसी तकनीक से बनाया गया है। इस तकनीक में सड़क में उपयोग होने वाली सामग्रियों में जैसे डामर कंक्रीट की गुणवत्ता की एआई मशीनों से जांच की जाती है। यह तकनीक सड़क में मिश्रण, बिछाने की प्रक्रिया, उसकी संरचना, तापमान, नमी व अन्य महत्वपूर्ण मापदंडों की निगरानी करके निर्माण पूरा किया जाता है। एनएचएआई के इंजीनियर राजीव कुमार ने बताया कि एआईएमसी तकनीक के माध्यम से सामग्री के मिश्रण में गलती नहीं होती। तकनीक में विभिन्न सेंसर, कैमरे और डेटा विश्लेषण उपकरण शामिल होते हैं। उपकरण निर्माण स्थल पर सामग्री के गुणों को मापते हैं। यदि डामर का मिश्रण बहुत गर्म या ठंडा है, तो एआई सिस्टम तापमान को समायोजित करने का संकेत देता है। 45 किलोमीटर ग्रीन फील्ड हिस्से में केवल 15 किमी हिस्से में बनी सड़क में कमी आई है। किस स्तर पर क्या गड़बड़ी हुई जांच में स्पष्ट हो जाएगा।
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