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UP: ओवैसी से दूरी बनाए रखेगी सपा, सॉफ्ट हिंदुत्व और PAD पर दांव; इसलिए AIMIM को गठबंधन से दूर रखने का है प्लान
Tue, 28 Jul 2026 09:05 AM IST
Sharukh Khan
अजीत खरे, अमर उजाला, नई दिल्ली
अजीत खरे, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Sharukh Khan
Updated Tue, 28 Jul 2026 09:05 AM IST
सार
यूपी विधानसभा चुनाव की जंग में समाजवादी पार्टी असदुद्दीन ओवैसी से दूरी बनाए रखेगी। सॉफ्ट हिंदुत्व और पीडीए पर पार्टी का दांव रहेगा। कांग्रेस के साथ तालमेल पर जोर है, पार्टी एआईएमआईएम को गठबंधन में शामिल करने के पक्ष में नहीं है।
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UP Assembly Elections
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही समाजवादी पार्टी अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद पार्टी अब उसी सामाजिक समीकरण को 2027 में भी दोहराना चाहती है।
इसी रणनीति के तहत सपा कांग्रेस के साथ तालमेल बनाए रखने की पक्षधर है, लेकिन सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) से दूरी बनाए रखने के संकेत दे रही है।
एआईएमआईएम लंबे समय से विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने की इच्छा जता रही है। हाल के दिनों में उसने एक बार फिर सपा के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार सपा नेतृत्व फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर उत्साहित नहीं है।
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पार्टी का मानना है कि एआईएमआईएम के साथ खुला राजनीतिक गठजोड़ उसके व्यापक सामाजिक विस्तार की रणनीति को नुकसान पहुंचा सकता है।
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इसी रणनीति के तहत सपा कांग्रेस के साथ तालमेल बनाए रखने की पक्षधर है, लेकिन सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) से दूरी बनाए रखने के संकेत दे रही है।
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एआईएमआईएम लंबे समय से विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने की इच्छा जता रही है। हाल के दिनों में उसने एक बार फिर सपा के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार सपा नेतृत्व फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर उत्साहित नहीं है।
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पार्टी का मानना है कि एआईएमआईएम के साथ खुला राजनीतिक गठजोड़ उसके व्यापक सामाजिक विस्तार की रणनीति को नुकसान पहुंचा सकता है।
हिंदुत्व की रणनीति छोड़ना नहीं चाहती सपा
सूत्रों का कहना है कि सपा अब खुद को केवल मुस्लिम समर्थक दल की पारंपरिक छवि तक सीमित नहीं रखना चाहती। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने टिकट वितरण और चुनावी भाषणों में इस रणनीति का स्पष्ट संकेत दिया।
सूत्रों का कहना है कि सपा अब खुद को केवल मुस्लिम समर्थक दल की पारंपरिक छवि तक सीमित नहीं रखना चाहती। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने टिकट वितरण और चुनावी भाषणों में इस रणनीति का स्पष्ट संकेत दिया।
पार्टी ने 80 सीटों में केवल चार मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और सभी विजयी रहे। पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की बात करते हुए भी पार्टी ने अल्पसंख्यक राजनीति का आक्रामक प्रदर्शन करने से परहेज किया।
इसीलिए, एआईएमएम के साथ खुली नजदीकी भाजपा को एक बार फिर सपा पर 'मुस्लिम तुष्टीकरण' का आरोप लगाने का अवसर दे सकती है। यही वजह है कि पार्टी फिलहाल ओवैसी से दूरी बनाए रखने में ही अपनी राजनीतिक भलाई देख रही है।
मुस्लिम और यादव समीकरण रहेगा, लेकिन बिना शोर के
सपा की पारंपरिक राजनीति मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण पर आधारित रही है, लेकिन 2024 में पार्टी ने इसे व्यापक पीडीए गठजोड़ में बदलने का प्रयास किया। मुस्लिम मतदाताओं को साथ रखने की कोशिश जारी रही, मगर उसका सार्वजनिक प्रदर्शन सीमित रखा गया। साथ ही गैर-यादव पिछड़े वर्गों को साधने पर विशेष जोर दिया गया। पार्टी मानती है कि यही संतुलन उसे व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता दिला सकता है।
सपा की पारंपरिक राजनीति मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण पर आधारित रही है, लेकिन 2024 में पार्टी ने इसे व्यापक पीडीए गठजोड़ में बदलने का प्रयास किया। मुस्लिम मतदाताओं को साथ रखने की कोशिश जारी रही, मगर उसका सार्वजनिक प्रदर्शन सीमित रखा गया। साथ ही गैर-यादव पिछड़े वर्गों को साधने पर विशेष जोर दिया गया। पार्टी मानती है कि यही संतुलन उसे व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता दिला सकता है।
2027 में फिर दोहराया जाएगा 2024 का फार्मूला
सूत्रों के अनुसार सपा 2022 विधानसभा चुनाव की बजाय 2024 लोकसभा चुनाव की रणनीति पर आगे बढ़ेगी। सामान्य सीटों पर अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की योजना बनाई जा रही है। अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद की जीत को पार्टी सामाजिक संदेश के तौर पर पेश करती रही है और उन्हें इस रणनीति का प्रमुख चेहरा बनाया गया है।
सूत्रों के अनुसार सपा 2022 विधानसभा चुनाव की बजाय 2024 लोकसभा चुनाव की रणनीति पर आगे बढ़ेगी। सामान्य सीटों पर अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की योजना बनाई जा रही है। अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद की जीत को पार्टी सामाजिक संदेश के तौर पर पेश करती रही है और उन्हें इस रणनीति का प्रमुख चेहरा बनाया गया है।
परिवारवाद के आरोपों से बचने की बड़ी चुनौती
इसके साथ ही पार्टी बहुसंख्यक समाज में स्वीकार्यता बढ़ाने, गैर-यादव ओबीसी वर्ग को जोड़ने और टिकट वितरण में संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। 2024 में सपा ने केवल पांच यादव उम्मीदवार उतारे थे और सभी मुलायम सिंह यादव के परिवार से थे। 2027 में परिवारवाद के आरोपों से बचते हुए व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व देना भी अखिलेश यादव के सामने बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
इसके साथ ही पार्टी बहुसंख्यक समाज में स्वीकार्यता बढ़ाने, गैर-यादव ओबीसी वर्ग को जोड़ने और टिकट वितरण में संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। 2024 में सपा ने केवल पांच यादव उम्मीदवार उतारे थे और सभी मुलायम सिंह यादव के परिवार से थे। 2027 में परिवारवाद के आरोपों से बचते हुए व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व देना भी अखिलेश यादव के सामने बड़ी चुनौती माना जा रहा है।