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BHU: वैज्ञानिकों ने खोजी 47 दुर्लभ बीमारियां, 300 मरीजों का पंजीकरण; 10 नए जीन की भी पहचान

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Wed, 17 Jun 2026 03:57 PM IST
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सार

Varanasi News: बीएचयू के वैज्ञानिकों ने 47 दुर्लभ बीमारियां खोजी। न्यूरोलॉजिकल बीमारियां सबसे अधिक मिलीं। सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के प्रोफेसर के शोध में 10 नए जीन की भी पहचान की गई। वहीं नेत्र और कार्डियक बीमारियों वाले मरीज भी मिले। 

BHU scientists discover 47 rare diseases 300 patients registered in Varanasi
बनारस हिंदी विश्वविद्यालय, BHU - फोटो : X (@bhupro)
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विस्तार

बीएचयू के सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के वैज्ञानिकों ने 47 दुर्लभ बीमारियां खोजी हैं। साथ ही वाराणसी और आसपास के जिलों में इन बीमारियों से ग्रसित 300 मरीजों का पंजीकरण भी किया है। बच्चों में होने वाली दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों पर चल रहे देशव्यापी मिशन कार्यक्रम के तहत वैज्ञानिकों ने 10 नए जीन की पहचान भी की है।



सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के प्रो. परिमल दास के निर्देशन में दुर्लभ बीमारियों पर शोध चल रहा है। मिशन प्रोग्राम ऑन पीडियाट्रिक रेयर डिसऑर्डर्स के तहत चल रहे रिसर्च में जिन 47 दुर्लभ डिसऑर्डर्स की पहचान की गई है, उसमें अधिकांश न्यूरोलॉजिकल विकार है। इसके अलावा न्यूरोमस्कुलर, नेत्र संबंधी, स्केलेटन और कार्डियक विकार हैं। 
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प्रो. परिमल का कहना है कि अब तक 47 रोगियों को आनुवंशिक रिपोर्ट प्रदान की जा चुकी है, जिसमे 10 नए जीन वैरिएंट्स की खोज की गई है। यह रिसर्च भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की ओर स्वीकृत एक अखिल भारतीय परियोजना है।

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प्रो. परिमल दास ने कहा कि शोध में भाग लेने वाले परिवारों को निशुल्क आनुवंशिक परीक्षण, परामर्श और निदान-पश्चात विशेषज्ञ चिकित्सकीय सलाह का लाभ मिला है। 2023 से अब तक वाराणसी और आसपास के जिलों में दुर्लभ आनुवंशिक रोगों पर पांच जागरुकता कार्यक्रम भी आयोजित किए गए हैं, जिनका उद्देश्य आनुवंशिक रोगों के प्रति आम समुदायों को अवगत करना, आनुवंशिक विकारों से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना है। इसके अतिरिक्त, यह परियोजना जनसंख्या स्तर पर दुर्लभ बाल्यकालीन विकारों के आनुवंशिक कारणों के बारे में जानकारी दी जा रही है।

100 डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ को दिया गया प्रशिक्षण
प्रो. परिमल दास ने बताया कि डॉक्टरों, रेजिडेंट्स और नर्सिंग स्टाफ सहित 100 से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण दिया गया है। शोधकर्ता डॉ. ऋतु दीक्षित और दीपिका मारू 2024 से मरीजों का पंजीकरण, परामर्श, जेनेटिक डेटा विश्लेषण और वाराणसी में जागरूकता के लिए निरंतर अथक प्रयास कर रही हैं। 

कार्यक्रम के सह-प्रधान अन्वेषक डॉ. अशोक कुमार ने कहा किसी दुर्लभ विकार के आनुवंशिक आधार की पुष्टि होने से माता-पिता के मन में अनिश्चितता खत्म होती है और उन्हें अपने बच्चे में रोग के वास्तविक कारण के बारे में पता चलता है। सही निदान के अभाव में वे अनेक चिकित्सकों के पास जाते हैं। बहुत अधिक धन और समय व्यय करते हैं। सही निदान उन्हें भविष्य में गर्भधारण की योजना बनाने में भी सहायता करता है।

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