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प्रेमचंद जयंती: लमही में सजा साहित्य का महाकुंभ, 'ठाकुर का कुआं' और 'कफन' के मंचन ने छोड़ी गहरी छाप
Fri, 31 Jul 2026 01:37 PM IST
Pragati Chand
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: Pragati Chand
Updated Fri, 31 Jul 2026 01:37 PM IST
सार
Varanasi News: साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर शुक्रवार को उनके गांव में उत्सव का आयोजन हुआ। इस दौरान प्रेमचंद की कालजयी कृतियों पर आधारित नाट्य मंचन हुए।
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प्रेमचंद जयंती पर लमही में सजा साहित्य का महाकुंभ
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर शुक्रवार को उनके पैतृक गांव लमही में प्रेमचंद उत्सव का भव्य आयोजन किया गया। इस दौरान गांव में पुष्पांजलि कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों ने भाग लिया। शहर के विभिन्न स्थानों पर भी प्रेमचंद की कालजयी कृतियों पर आधारित नाट्य मंचन हुए।
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प्रेमचंद उत्सव का मुख्य उद्देश्य महान साहित्यकार को श्रद्धांजलि अर्पित करना था। लमही स्थित उनके आवास पर सुबह से ही लोगों का तांता लगा रहा। पुष्पांजलि अर्पित कर लोगों ने उनकी साहित्यिक विरासत को याद किया। इस अवसर पर गांव के रामलीला मैदान में प्रेमचंद के प्रसिद्ध नाटक 'ठाकुर की कुआं' का मंचन किया गया। यह नाटक सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव पर आधारित है। इसके साथ ही, गरीबी और मानवीय संवेदनहीनता को दर्शाने वाले उनके चर्चित नाटक 'कफन' का भी मंचन हुआ। इन नाटकों के माध्यम से प्रेमचंद के यथार्थवादी लेखन को जीवंत किया गया। कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शकों ने इन प्रस्तुतियों की सराहना की।
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साहित्यिक विरासत का स्मरण
प्रेमचंद को हिंदी साहित्य का युग प्रवर्तक माना जाता है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में ग्रामीण जीवन, किसानों की दुर्दशा और सामाजिक कुरीतियों का सजीव चित्रण मिलता है। उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके समय में थीं। यह उत्सव उनकी साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। प्रेमचंद का साहित्य समाज को जागरूक करने का संदेश देता है।
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बीएचयू में संगोष्ठी
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) स्थित मुंशी प्रेमचंद स्मारक एवं शोध संस्थान में एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें विभिन्न संस्थानों से वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य पर अपने गहन विचार प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने उनके लेखन की सामाजिक प्रासंगिकता और मानवीय मूल्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रेमचंद के योगदान को अविस्मरणीय बताया और वर्तमान संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता पर जोर दिया। संगोष्ठी में साहित्य प्रेमियों और शोधार्थियों की अच्छी उपस्थिति रही।