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Congress failed to match RJD in seat sharing, got only this many seats!
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सीट शेयरिंग में RJD के सामने नहीं चली कांग्रेस की, मिली इतनी ही सीटें!
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Sat, 11 Oct 2025 04:54 PM IST
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महागठबंधन (INDIA गठबंधन) के भीतर सीट बंटवारे का समीकरण अब लगभग तय हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस पार्टी ने इस बार सिर्फ 58 सीटों पर चुनाव लड़ने की सहमति जताई है। यह 2020 के मुकाबले 12 सीटें कम हैं, जब पार्टी ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था और केवल 19 सीटें जीत पाई थी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह समझौता कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और तेजस्वी यादव के बीच हुई बैठक में लगभग तय हो गया है। आधिकारिक ऐलान आने में कुछ वक्त लग सकता है, लेकिन सियासी गलियारों में इसे कांग्रेस की रणनीतिक ‘पीछे हटने’ की नीति के रूप में देखा जा रहा है।
कुछ सप्ताह पहले तक कांग्रेस नेताओं का रुख बेहद आक्रामक था। बिहार प्रभारी समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने संकेत दिए थे कि पार्टी राज्य में स्वतंत्र पहचान और बराबरी की भूमिका चाहती है। पार्टी ने कम से कम 100 सीटों की मांग भी रखी थी।
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। सीटों में कटौती यह साफ बताती है कि कांग्रेस की bargaining power कमजोर पड़ गई है। दरअसल, बिहार में पार्टी के पास अब न तो मजबूत संगठन बचा है, न ही बूथ स्तर तक पहुंच रखने वाले कार्यकर्ता। 2020 में कांग्रेस का strike rate महज 27% था जिससे यह संदेश गया कि पार्टी महागठबंधन की कमजोर कड़ी है।
चुनाव से पहले कांग्रेस ने बिहार में Special Intensive Revision (SIR) यानी मतदाता सूची संशोधन का बड़ा मुद्दा उठाया था। पार्टी ने केंद्र और चुनाव आयोग पर आरोप लगाया था कि अल्पसंख्यकों और दलितों के नाम जानबूझकर voter list से हटाए जा रहे हैं।
हालांकि जब चुनाव आयोग ने अपने आंकड़े जारी किए, तो पता चला कि डिलीशन की प्रक्रिया सामान्य थी। कांग्रेस का आरोप तथ्यात्मक रूप से कमजोर साबित हुआ और उसका जन-नैरेटिव ठंडा पड़ गया।
यह कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि इसी मुद्दे पर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की थी।
मुद्दे की हवा निकलने से कांग्रेस का वह momentum भी खत्म हो गया, जो उसे राजद की छाया से बाहर निकाल सकता था।
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (JSP) का उभार भी कांग्रेस की मुश्किल बढ़ाने वाला साबित हुआ है। पीके की पार्टी ने रोजगार, शिक्षा और सुशासन जैसे ठोस मुद्दों पर युवाओं और मध्यम वर्ग के मतदाताओं में जगह बना ली है। ये वही तबके हैं जो कभी कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक हुआ करते थे।
JSP का विस्तार खासकर सीमांचल, कोसी और मगध क्षेत्रों में दिख रहा है जहां कांग्रेस पहले से कमजोर है। ऐसे में कांग्रेस के लिए आरजेडी से टकराव मोल लेना राजनीतिक आत्मघात साबित हो सकता था। इसलिए उसने ‘व्यावहारिक समझौता’ का रास्ता चुना, ताकि गठबंधन में अपनी उपस्थिति बरकरार रख सके।
2020 के चुनाव के मुकाबले इस बार महागठबंधन में सहयोगियों की संख्या बढ़ गई है। अब इसमें RJD, कांग्रेस, वाम दलों के साथ-साथ विकासशील इंसान पार्टी (VIP) और कुछ छोटे सामाजिक समूह भी शामिल हैं। इससे RJD के पास विकल्प बढ़ गए, जबकि कांग्रेस के हिस्से की सीटें स्वतः घट गईं।
तेजस्वी यादव की पार्टी स्वाभाविक रूप से अपने कोर इलाकों में ज्यादा सीटें रखना चाहती है। इसलिए कांग्रेस को 58 सीटों पर सीमित रहना पड़ा, ताकि गठबंधन की एकता बनी रहे।
कांग्रेस समर्थक नेता यह तर्क दे रहे हैं कि इस बार पार्टी ने संख्या नहीं, गुणवत्ता पर फोकस किया है।2020 में उसे जो 70 सीटें मिली थीं, उनमें से अधिकतर “हारने वाली सीटें” मानी जाती थीं। इस बार कांग्रेस चाहती है कि उसे ऐसी सीटें मिलें जहां उसका पारंपरिक जनाधार या स्थानीय प्रभाव हो।
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस अपने 17 में से 15 मौजूदा विधायकों को दोबारा टिकट देने जा रही है। दो सीटों पर नाम होल्ड पर हैं, जिन पर बदलाव संभव है या वे सीटें राजद के साथ अदला-बदली की जा सकती हैं।
2020 में कांग्रेस से जीते दो विधायक मुरारी प्रसाद गौतम (चेनारी) और सिद्धार्थ सौरव (विक्रम) पहले ही पार्टी से बगावत कर चुके हैं।सूत्रों का कहना है कि दोनों आगामी चुनाव में बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतर सकते हैं। इससे कांग्रेस के लिए चुनौती और बढ़ जाएगी। पार्टी में फिलहाल करीब 25 उम्मीदवारों के नाम फाइनल बताए जा रहे हैं, जिन पर जल्द ही केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी मिलने की संभावना है।
बिहार कांग्रेस के लिए यह चुनाव ‘अस्तित्व बचाने की लड़ाई’ जैसा है। न संगठन, न चेहरा और न स्वतंत्र एजेंडा इन परिस्थितियों में पार्टी के पास आरजेडी की छतरी के नीचे रहना ही व्यावहारिक विकल्प बचा है। सीटों में कटौती भले ही हार मानने जैसा दिखे, लेकिन रणनीतिक रूप से कांग्रेस ने गठबंधन में जीवित रहने का रास्ता चुना है।
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