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टैरिफ मीटिंग में ट्रंप ने छेड़ा नोबेल का मुद्दा
वीडियो डेस्क अमर उजाला डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Fri, 15 Aug 2025 08:18 PM IST
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर कितने गंभीर और उत्सुक हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे बार-बार सार्वजनिक मंचों, सोशल मीडिया पोस्ट और यहां तक कि विदेशी नेताओं के साथ बातचीत में भी इसका जिक्र करते रहे हैं। अब यह खुलासा हुआ है कि उन्होंने नॉर्वे के एक वरिष्ठ मंत्री से फोन पर हुई बातचीत में भी इस विषय को छेड़ दिया।
गौरतलब है कि नोबेल शांति पुरस्कार का चयन नॉर्वे की नोबेल समिति करती है। ऐसे में ट्रंप का यह कदम राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
अमेरिकी मैगजीन पॉलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने पिछले महीने नॉर्वे के वित्त मंत्री और नाटो के पूर्व प्रमुख जेंस स्टोलटेनबर्ग को फोन किया। शुरुआती बातचीत टैरिफ और आर्थिक सहयोग पर केंद्रित थी, लेकिन अचानक ही ट्रंप ने बात को मोड़कर नोबेल शांति पुरस्कार की चर्चा शुरू कर दी।
यह जानकारी सबसे पहले नॉर्वे के डागेंस नेरिंगस्लिव अखबार ने दी, जिसके बाद पॉलिटिको ने ओस्लो में सरकारी सूत्रों से इसकी पुष्टि की। रिपोर्ट के अनुसार, यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने स्टोलटेनबर्ग से इस मुद्दे पर बात की है, बल्कि पहले भी वे इसी विषय पर चर्चा कर चुके हैं।
जेंस स्टोलटेनबर्ग ने इस कॉल को लेकर कहा-
“मुझे राष्ट्रपति ट्रंप का फोन आया था। कॉल में उनके कुछ स्टाफ मेंबर्स भी शामिल थे, जिनमें वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और व्यापार प्रतिनिधि ग्रियर थे। हमने टैरिफ, आर्थिक सहयोग और नॉर्वे के प्रधानमंत्री स्टॉयर से होने वाली बैठक की तैयारी पर बात की।”
हालांकि, स्टोलटेनबर्ग ने नोबेल पुरस्कार को लेकर हुई चर्चा के विवरण का खुलासा करने से इनकार कर दिया।
ट्रंप लंबे समय से यह दावा करते रहे हैं कि उन्हें कई अवसरों पर नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए था। हाल ही में उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर लिखा-
“मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, जबकि मैंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रोका। मैंने सर्बिया और कोसोवो के बीच समझौता कराया। मिस्र और इथियोपिया के बीच तनाव कम किया। पश्चिम एशिया में अब्राहम समझौता कराया।”
ट्रंप का कहना है कि अगर सब कुछ योजना के अनुसार चला तो अब्राहम समझौते में और देश शामिल होंगे, जो दशकों में पहली बार पश्चिम एशिया को एकजुट करेगा। उनके अनुसार, उन्हें अब तक यह पुरस्कार 4-5 बार मिल जाना चाहिए था।
ट्रंप का आरोप है कि नोबेल समिति उन्हें यह सम्मान इसलिए नहीं दे रही क्योंकि वे इसे केवल “लिबरल” विचारधारा वाले लोगों को देती है।
“चाहे रूस-यूक्रेन, इस्राइल-ईरान या कोई और संकट हो, मैं समाधान निकाल भी दूं तो भी मुझे यह पुरस्कार नहीं मिलेगा,” ट्रंप ने कहा।
उनके इस बयान को कई विशेषज्ञ आत्म-प्रचार और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानते हैं, खासकर 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद के राजनीतिक माहौल में।
कूटनीतिक दृष्टि से, नॉर्वे के मंत्री के साथ हुई इस बातचीत में नोबेल पुरस्कार का जिक्र करना असामान्य माना जा रहा है। आमतौर पर, इस तरह के मुद्दे आधिकारिक चर्चाओं का हिस्सा नहीं होते, खासकर तब जब पुरस्कार का चयन स्वतंत्र समिति करती है। हालांकि, ट्रंप के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने अपने ‘व्यक्तिगत उपलब्धियों’ को अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में जोड़ा हो।
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन प्रक्रिया गोपनीय होती है और चयन नॉर्वे की संसद द्वारा नियुक्त पांच सदस्यों की समिति करती है। इसमें किसी भी देश का नेता सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का बार-बार इस विषय को उठाना उनकी वैश्विक छवि को लेकर चिंता और मान्यता पाने की इच्छा को दर्शाता है।
डोनाल्ड ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इच्छा अब एक बार फिर सुर्खियों में है, खासकर नॉर्वे के वरिष्ठ मंत्री के साथ बातचीत में इस विषय को उठाने के बाद। चाहे यह आत्म-प्रचार हो या मान्यता की खोज, ट्रंप के इस रुख ने एक बार फिर अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा को गर्मा दिया है।
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