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कारगिल विजय दिवस: औरंगाबाद के वीर सपूत शिवशंकर गुप्ता के बलिदान को देश का नमन, ऐसे रोका था दुश्मनों को

Sun, 26 Jul 2026 03:40 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरंगाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरंगाबाद Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Sun, 26 Jul 2026 03:40 PM IST
सार

कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ पर औरंगाबाद के शहीद सिपाही शिवशंकर गुप्ता को श्रद्धांजलि दी गई। 1999 के कारगिल युद्ध में उन्होंने शहीद साथियों का पार्थिव शरीर लाते समय दुश्मनों से वीरतापूर्वक मुकाबला किया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।

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Kargil Vijay Diwas 2026: Shivshankar was martyred giving enemy crushing defeat aurangabad bihar news
औरंगाबाद स्थित स्मारक में स्थापित कारगिल शहीद शिवशंकर गुप्ता की आदमकद प्रतिमा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देशभर में रविवार को कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। इस अवसर पर पूरा देश उन वीर जवानों को श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ऐसे ही एक शूरवीर थे बिहार के औरंगाबाद जिले के रफीगंज प्रखंड के बंचर गांव निवासी सिपाही शिवशंकर गुप्ता, जिन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान अपने शहीद साथियों का पार्थिव शरीर लाने के प्रयास में वीरगति प्राप्त की।
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26 साल पहले कारगिल में दी थी सर्वोच्च शहादत
1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को करारा जवाब देते हुए ऊंची चोटियों पर फिर से तिरंगा फहराया था। इस युद्ध में अनेक सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हीं में बिहार रेजिमेंट के सिपाही शिवशंकर गुप्ता भी शामिल थे, जिन्होंने अपने शहीद साथियों का पार्थिव शरीर वापस लाने के लिए दुश्मनों की गोलियों का सामना किया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।
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कंपनी कमांडर का शव लाने निकले, सीने पर गोली लगने के बाद भी लड़ते रहे
4 जून 1999 को कारगिल के बटालिक उप-सेक्टर में दुश्मनों से मुकाबले के दौरान कंपनी कमांडर मेजर एम. सर्वनन और सेक्शन कमांडर नायक गणेश प्रसाद यादव शहीद हो गए थे। इसके बाद बिहार रेजिमेंट के सिपाही शिवशंकर गुप्ता ने अपने साथियों के साथ उनका पार्थिव शरीर लाने की जिम्मेदारी संभाली।
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करीब 14,230 फीट ऊंची बर्फीली और पथरीली पहाड़ी पर पहुंचकर उन्होंने पहले वहां पड़े हथियार और गोला-बारूद सुरक्षित नीचे पहुंचाया। इसके बाद वे दोबारा मेजर सर्वनन का पार्थिव शरीर लाने के लिए ऊपर गए। जैसे ही वे पार्थिव शरीर के साथ लगभग 50 मीटर नीचे आए, दुश्मनों ने उन पर भीषण फायरिंग शुरू कर दी।

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दुश्मन की गोली लगने के बावजूद शिवशंकर गुप्ता पीछे नहीं हटे। उन्होंने लगातार जवाबी फायरिंग करते हुए करीब दो घंटे तक दुश्मनों को आगे बढ़ने से रोके रखा। अत्यधिक रक्तस्राव और सीने में गोली लगने के बावजूद वे अंतिम सांस तक लड़ते रहे और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

शहादत के 35 दिन बाद घर पहुंचा था पार्थिव शरीर
शहीद के पिता नंदलाल गुप्ता बताते हैं कि 6 जून 1999 को डाक विभाग के माध्यम से उन्हें सेना का पत्र और एक हजार रुपये मिले, जिससे बेटे के शहीद होने की जानकारी मिली। हालांकि, करीब एक महीने तक पार्थिव शरीर का कोई पता नहीं चला। शहादत के 35वें दिन सेना के जवान उनका पार्थिव शरीर लेकर बंचर गांव पहुंचे, जहां पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।


बचपन से था सेना में जाने का सपना
नंदलाल गुप्ता के अनुसार, शिवशंकर गुप्ता चार भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। बचपन से ही उनका सपना सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने का था। 28 अक्टूबर 1996 को वे भारतीय सेना में भर्ती हुए। बुनियादी प्रशिक्षण के बाद उनकी पहली तैनाती बिहार रेजिमेंट में सिपाही के पद पर हुई। अपने साहस, अनुशासन और कार्यकुशलता के कारण वे कम समय में ही अपनी पलटन में मिसाल बन गए।

कारगिल विजय दिवस पर दी गई श्रद्धांजलि
कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ पर शहीद शिवशंकर गुप्ता को उनके पैतृक गांव बंचर और औरंगाबाद शहर स्थित स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। बंचर गांव में परिवारजनों, ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों ने उनकी शहादत को नमन किया। वहीं औरंगाबाद स्थित स्मारक पर 13 बिहार बटालियन एनसीसी के कैडेटों, अधिकारियों, गणमान्य नागरिकों और आम लोगों ने पुष्पांजलि अर्पित कर उनके अदम्य साहस और बलिदान को याद किया। इस अवसर पर शहीद के पिता नंदलाल गुप्ता, उनकी पत्नी, छोटे भाई शिवदयाल गुप्ता सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
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