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Hindi News ›   Bihar ›   Kargil Vijay Diwas 27 Years of Broken Promises Family of Martyr Vishuni Rai

Bihar: '27 साल सिर्फ भाषण और खोखले वादे', शहीद विशुनी राय के परिजनों का छलका दर्द, आज भी अधूरी हैं घोषणाएं

Sun, 26 Jul 2026 09:45 AM IST
सारण ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सारण
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सारण Published by: सारण ब्यूरो Updated Sun, 26 Jul 2026 09:45 AM IST
सार

कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर सारण के कारगिल शहीद विशुनी राय का परिवार आज भी सरकार से किए गए अधूरे वादों के पूरा होने का इंतजार कर रहा है। शहीद की प्रतिमा, स्मारक, सड़क और चौक के नामकरण सहित कई घोषणाएं आज तक धरातल पर नहीं उतर सकीं।

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Kargil Vijay Diwas 27 Years of Broken Promises Family of Martyr Vishuni Rai
कारगिल शहीद विष्णु राय और परिवार - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

कारगिल युद्ध भारत के सैन्य इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। इसी युद्ध में भारतीय सेना ने कठिन परिस्थितियों में दुश्मनों को परास्त कर दुनिया को अपनी वीरता का परिचय दिया था। इस विजय में देश के सैकड़ों जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिनमें सारण के वीर सपूत विशुनी राय भी शामिल थे। उनकी शहादत पर पूरा देश गर्व करता है, लेकिन उनके सम्मान से जुड़ी अधूरी घोषणाएं व्यवस्था पर कई सवाल भी खड़े करती हैं।
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27 साल बाद भी पूरे नहीं हुए अधूरे वादे
देश आज कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ मना रहा है। प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को पूरा देश उन अमर वीरों को नमन करता है, जिन्होंने वर्ष 1999 में कारगिल की दुर्गम चोटियों पर पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को ध्वस्त करते हुए तिरंगे की शान को अक्षुण्ण रखा। लेकिन इस गौरवशाली दिवस पर सारण जिले के मकेर प्रखंड अंतर्गत बथुई गांव में गर्व के साथ-साथ एक टीस भी हर साल उभर आती है। यह टीस उस अधूरे वादे की है, जो कारगिल युद्ध में शहीद हुए जिले के वीर सपूत विशुनी राय के परिवार से किए गए थे, लेकिन 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी धरातल पर नहीं उतर सके हैं।
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अधिकांश घोषणाएं सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गईं
कारगिल युद्ध के दौरान वीरगति प्राप्त करने वाले शहीद विशुनी राय का पार्थिव शरीर जब उनके गांव पहुंचा था, तब पूरा बिहार शोक में डूब गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, स्थानीय सांसद राजीव प्रताप रूडी सहित कई मंत्री और अधिकारी शहीद के घर पहुंचे थे। उस समय मंच से एक के बाद एक कई घोषणाएं की गईं। लोगों को लगा कि सरकार अपने वीर सपूत के सम्मान में इतिहास रचेगी, लेकिन समय बीतता गया और अधिकांश घोषणाएं सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गईं।
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पटना में अभी तक नहीं मिल पाई जमीन
आज भी बथुई गांव में शहीद विशुनी राय की कोई प्रतिमा नहीं है। मकेर चौक का नाम कारगिल चौक नहीं रखा गया। गांव की सड़क का नाम शहीद विशुनी राय पथ नहीं रखा गया। गांव का नाम भी शहीद के नाम पर नहीं हो सका। पटना में जमीन उपलब्ध कराने की घोषणा भी अधूरी रह गई। शहीद के परिवार का कहना है कि सरकारें बदलती रहीं और उनकी उम्मीदें हर बार टूटती चली गईं। शहीद की पत्नी सुशीला देवी आज भी वर्ष 1999 की यादों को याद कर भावुक हो जाती हैं। आंखों में आंसू भरकर वह बताती हैं कि उस समय नेताओं और अधिकारियों ने भरोसा दिलाया था कि परिवार को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होने दी जाएगी।

सरकारी नौकरी देने का आश्वासन भी नहीं हुआ पूरा
भारत सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं के सहारे किसी तरह परिवार चल रहा है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा किए गए कई वादे आज भी अधूरे हैं। उन्होंने बताया कि बेटे और बेटी की बेहतर शिक्षा के लिए उन्हें पटना में किराए के मकान में रहकर संघर्ष करना पड़ा। बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका है, लेकिन अब भी अच्छी नौकरी की तलाश में है। उस समय सरकारी नौकरी देने का आश्वासन भी दिया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका।

शिकायत की ताकत खत्म हो चुकी है- शहीद पुत्र रवीश
शहीद के पुत्र रवीश राज कहते हैं कि यदि मकेर चौक पर उनके पिता की प्रतिमा लग जाती, तो वह केवल एक मूर्ति नहीं होती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति की सबसे बड़ी प्रेरणा बनती। गांव और जिले के युवा उस प्रतिमा को देखकर सेना में जाने का संकल्प लेते, लेकिन हर वर्ष कारगिल विजय दिवस पर पत्रकार आते हैं। वही सवाल पूछते हैं और उन्हें हर बार यही कहना पड़ता है कि आज तक कोई वादा पूरा नहीं हुआ। अब शिकायत करने की ताकत भी खत्म हो चुकी है।

परिजन बोले- आश्वासन भी समय के साथ हवा-हवाई साबित हुए
परिजनों का कहना है कि शहादत के बाद राहत के नाम पर केवल पेट्रोल पंप मिला, लेकिन उसका संचालन भी आसान नहीं रहा। वर्तमान में उसे लीज पर देकर किसी तरह आय का साधन बनाया गया है। उनका कहना है कि शहीद का सम्मान केवल भाषणों और पुष्पांजलि से पूरा नहीं होता, बल्कि उनके परिवार से किए गए वादों को निभाने से होता है। स्थानीय लोगों का भी मानना है कि यदि सरकार शहीद विशुनी राय के नाम पर प्रतिमा, स्मारक या चौक का निर्माण कर देती, तो यह केवल एक परिवार का सम्मान नहीं, बल्कि पूरे सारण जिले का गौरव होता। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेताओं द्वारा किए जाने वाले वादों की तरह शहीद के परिवार से किए गए आश्वासन भी समय के साथ हवा-हवाई साबित हो गए।


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कारगिल विजय दिवस पर जब देशभर में शहीद स्मारकों पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है, तब बथुई गांव का यह परिवार भी अपने वीर सपूत को नमन करता है। फर्क सिर्फ इतना है कि उनके लिए यह दिन गर्व के साथ-साथ अधूरे वादों का दर्द भी लेकर आता है। परिवार का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में शहीदों का सम्मान करना चाहती है, तो वर्षों पहले किए गए वादों को पूरा करे। यही शहीद विशुनी राय के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा संदेश भी है। 

 

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