{"_id":"69c996bf400d49fe300ca77d","slug":"aiims-gorakhpur-has-achieved-a-new-breakthrough-in-the-effective-treatment-of-pulmonary-alveolar-proteinosis-gorakhpur-news-c-7-gkp1038-1273265-2026-03-30","type":"story","status":"publish","title_hn":"Gorakhpur News: सौ प्रतिशत ऑक्सीजन पर रहता था निर्भर, अब मरीज को मिली राहत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Gorakhpur News: सौ प्रतिशत ऑक्सीजन पर रहता था निर्भर, अब मरीज को मिली राहत
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Mon, 30 Mar 2026 02:46 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
गोरखपुर। एम्स में पूरे फेफड़े का लैवेज सफलतापूर्वक किया है। यह जटिल प्रक्रिया ‘सेकेंडरी पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस जैसी अत्यंत दुर्लभ बीमारी से पीड़ित मरीज पर की गई, जिससे उसे नई जिंदगी मिली है। बीमारी के गंभीर होने पर मरीज 100 प्रतिशत ऑक्सीजन पर मरीज था।
डॉक्टरों के अनुसार, पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस एक दुर्लभ बीमारी है। इसमें फेफड़ों में सर्फेक्टेंट का जमाव हो जाता है, जिससे सांस लेने में गंभीर समस्या उत्पन्न होती है। मरीज कई महीनों से सांस लेने में तकलीफ से जूझ रहा था। हाल के कुछ सप्ताह पहले गंभीर होने पर उसे रेस्पिरेटरी आईसीयू में भर्ती कर लगभग 100 प्रतिशत ऑक्सीजन और बाई-पैप सपोर्ट पर रखा गया था।
जांच के दौरान ब्रोंकोस्कोपी और पैथोलॉजी रिपोर्ट्स में की संभावना की पुष्टि हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बीमारी के उपचार के लिए फिलहाल पूरे फेफड़े का लैवेज ही सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है, जिसमें ऑपरेशन थिएटर में हर फेफड़े के लिए तीन से चार घंटे तक सूक्ष्म योजना और समन्वय के साथ काम करना पड़ता है। छह दिन के अंतराल पर दो चरणों में की गई इस प्रक्रिया के बाद मरीज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ और उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटा दिया गया। मरीज में क्लीनिकल और रेडियोलॉजिकल दोनों स्तर पर तेजी से सुधार देखा गया।
इस सफलता में पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. सुबोध कुमार, डॉ. देवेश प्रताप सिंह, डॉ. कनुप्रिया, डॉ. हर्ष, डॉ. राघवेंद्रन, डॉ. दर्शी और डॉ. चाहत की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं।
Trending Videos
डॉक्टरों के अनुसार, पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस एक दुर्लभ बीमारी है। इसमें फेफड़ों में सर्फेक्टेंट का जमाव हो जाता है, जिससे सांस लेने में गंभीर समस्या उत्पन्न होती है। मरीज कई महीनों से सांस लेने में तकलीफ से जूझ रहा था। हाल के कुछ सप्ताह पहले गंभीर होने पर उसे रेस्पिरेटरी आईसीयू में भर्ती कर लगभग 100 प्रतिशत ऑक्सीजन और बाई-पैप सपोर्ट पर रखा गया था।
विज्ञापन
विज्ञापन
जांच के दौरान ब्रोंकोस्कोपी और पैथोलॉजी रिपोर्ट्स में की संभावना की पुष्टि हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बीमारी के उपचार के लिए फिलहाल पूरे फेफड़े का लैवेज ही सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है, जिसमें ऑपरेशन थिएटर में हर फेफड़े के लिए तीन से चार घंटे तक सूक्ष्म योजना और समन्वय के साथ काम करना पड़ता है। छह दिन के अंतराल पर दो चरणों में की गई इस प्रक्रिया के बाद मरीज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ और उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटा दिया गया। मरीज में क्लीनिकल और रेडियोलॉजिकल दोनों स्तर पर तेजी से सुधार देखा गया।
इस सफलता में पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. सुबोध कुमार, डॉ. देवेश प्रताप सिंह, डॉ. कनुप्रिया, डॉ. हर्ष, डॉ. राघवेंद्रन, डॉ. दर्शी और डॉ. चाहत की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं।