गोरखपुर में चीनी सामान के लिए शटर डाउन, 53 करोड़ की चीनी झालर, खिलौनों से व्यापारियों ने कर लिया किनारा
- दीवाली त्योहार की तैयारियों में बाजार में चीन के झालरों की बढ़ जाती है डिमांड
- इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों की होती है पूछ, दुकानदारों ने बेचने से की मनाही
विस्तार
शहर में चीन की झालर और इलेक्ट्रानिक खिलौनों का 53 करोड़ रुपये का बाजार है। दीवाली के मौके पर चीन की झालर शहर से गांव तक छोटी-बड़ी सभी इलेक्ट्रिक दुकानों में खूब पाई जाती हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। व्यापारियों ने इन झालरों से किनारा कर लिया है। कहा कि, दुकान में जो चीनी माल है, उसे भी नहीं बेचेंगे। इसके अलावा नए स्टाक के लिए किसी तरह का आर्डर नहीं करेंगे।
चीन के इलेक्ट्रानिक खिलौनों की भी शहर में काफी मांग है। जिले में हर महीने 30 से 32 लाख रुपये के खिलौने आसानी से बेच लिए जाते हैं। साल में साढ़े तीन करोड़ रुपये से अधिक का बाजार चीन के खिलौनों का होता है। फिलहाल दोनों व्यापार ठप हो गए हैं।
दीवाली में 50 करोड़ रुपये से अधिक का होता है व्यापार
दुकानों में जो पुरानी चीन की झालर पड़ी हैं, प्रशासन उस स्टाक को खपाने के लिए उनकी मदद करे। इन उत्पादों का 60 प्रतिशत खर्च सरकार वहन कर लें तो बचा 40 प्रतिशत का घाटा सभी व्यापारी स्वीकार कर माल को दुकान के बाहर ही जला देंगे।
कोतवाली रोड स्थित नव दुर्गा इलेक्ट्रिकल के राजेश गुप्ता ने बताया दीवाली के चार महीने पहले से झालर का बाजार आ जाता है। पूरे जिले में 50 करोड़ रूपये से अधिक का बाजार होता है। इस बार सभी व्यापारियों ने फैसला किया है कि चीन के झालरों का नया स्टाक नहीं मंगवाएंगे। दीवाली में भारतीय झालरों के अलावा अन्य भारतीय उत्पादों को ही बेचा जाएगा।
चीन से नहीं मंगाएंगे झालरें
गोलघर स्थित विजय इलेक्ट्रिक स्टोर के राजेश चंद्र कौशिक ने बताया कि हमारे लिए देश पहले, व्यापार उसके बाद है। प्रत्येक वर्ष चीन की झालरों की भारी डिमांड आती है। दीवाली के चार से पांच महीने पहले इनका स्टाक आना शुरू हो जाता है। इस बार कोरोना की वजह से काफी स्टाक नहीं आ पाया और चीन के इस गंदी हरकत से उत्पाद क्या मंगाएंगे, इसके नाम से ही नफरत होने लगी है।
दीवाली पर चीनी झालर एकदम नहीं बेचेंगे। सेना के जवानों के साथ देश के नागरिकों का भी फर्ज है, अपने स्तर से चीन को जवाब दें। चीन की झालर सस्ती होती हैं, इसलिए इनकी पूछ अधिक है। दीवाली में कई करोड़ का व्यापार होता है। इस बार विरोध में माल ही नहीं आएगा तो कोई बेचेगा ही नहीं।
भारतीय खिलौने ही खरीदें, चिपकाएंगे नोटिस
गोलघर स्थित लवली गिफ्ट के मनीष विश्वकर्मा ने बताया कि भारतीय खिलौनों की पूछ अधिक होती है। पर जब इलेक्ट्रिक खिलौने की बात आती है तो सस्ता होने की वजह से चीन के खिलौने लोग खरीदते हैं। दो दिन बार दुकान खोलेंगे तो बाहर नोटिस लगा देंगे कृपया भारतीय खिलौने ही दुकान से खरीदें।
परिवार के साथ देश भी हमारा अपना है। इसकी जिम्मेदारी भी हमारी है। दुकान से कुछ और सामान बेच लेंगे लेकिन चीन का सामान नहीं बेचेंगे। भारतीय साइकिल, ट्वाय, गुड्डा गुड़िया के अलावा अन्य खिलौने हैं, ग्राहक भी इन्हें ही खरीदें। हर महीने लगभग 30 लाख रुपये का इनका बाजार है। साल में लगभग 3.6 करोड़ रुपये का इनका बाजार होता है।
सच्चाई: आसान नहीं है चीन के उत्पादों की अनदेखी
चीन के आर्थिक बहिष्कार की मुहिम तेज हो गई है। न सिर्फ जन साधारण बल्कि कई सेलिब्रेटी भी चीन के उत्पादों का पूरी तरह से बहिष्कार करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर यह कितना संभव हो पाएगा, यह आने वाले समय में तय होगा। क्योंकि स्मार्टफोन, गैजेट से लेकर बेडरूम और किचन तक जरूरत के हर सामान में चीन की ‘घुसपैठ’ हो चुकी है। वहीं बाजार चीन निर्मित इंटीरियर लाइट्स, फैंसी लाइट्स, सेलफोन, रेशम, आर्टिफिशियल लेदर से पटे हुए हैं।
भारतीय बाजार में स्मार्टफोन, गैजेट और इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में चीन की कंपनियों का माल छाया हुआ है। एक अनुमान के अनुसार भारत में कुल स्मार्टफोन मार्केट में अकेले चीन की कंपनियों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से ज्यादा है। इसी तरह टीवी-इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में भी चीन की अच्छी खासी घुसपैठ है।
विकल्प की तलाश करेंगे देश के नागरिक
यह सारा चीन के रुख निर्भर करता है। अगर देश के सैनिकों को अब थोड़ा सा भी नुकसान होगा तो इसका अंजाम चीन को न सिर्फ सामरिक बल्कि आर्थिक रूप से भी भुगतना होगा। निश्चित तौर पर अभी भारतीय बाजार पर चीन का आधिपत्य है, लेकिन देश का लोग चीन का विकल्प ढूंढ लेंगे। चीन के विरोधी देश हांगकांग और ताइवान भी इलेक्ट्रानिक्स के मामले में कई बेहतर उत्पाद तैयार करते हैं।
यहां के आयातक चीन को छोड़कर अन्य देशों से आयात करना शुरू कर देंगे। सभी देशों को भी बाजार की तलाश है। वहीं निश्चित तौर पर चीन के बहिष्कार का भारत पर ज्यादा असर होगा, लेकिन भारत के लिए बेहतर स्थिति तब होगी जब वो चीन के अनुपात में स्मार्टफोन, इलेक्ट्रानिक और गैजेट में प्रतिस्पर्धी निवेश लेकर आए या इन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी निर्माण को बढ़ावा दे। भारत के लिए जापान, ताइवान और साउथ कोरिया निवेश के लिए चीन के मुक़ाबले बेहतर सहयोगी हो सकते हैं।
डॉ. संजीत कुमार गुप्ता, शिक्षक वाणिज्य, गोरखपुर विश्वविद्यालय
स्मार्ट फोन के बाजार में चीन की तगड़ी घुसपैठ
देश- ब्रांड
चीन- जियोमी, रेडमी, एमआई, विवो, रियल-मी, ओप्पो, वन-प्लस, लिनोवो, मोटोरोला, मिजू, कूल-पैड, हुआई, ऑनर, इनफिनिक्स
भारत- जियो, आईबॉल, सेलकॉन, इंटेक्स, कार्बन, लावा, एचसीएल, माइक्रोमैक्स, ओनिडा, वीडियोकॉन
नीदरलैंडर- फिलिप्स
फिनलैंड- नोकिया
जापान- सैनसुई, पैनासोनिक, शार्प, सोनी, तोशिबा
दक्षिण कोरिया- एलजी, सैमसंग
ताइवान- असुस, बेनक्यू, एचटीसी
अमेरिका- एप्पल, गूगल, एचपी, इनफोकस
चीन का पैंतरा, मेड इन चाइना की जगह मेड इन पीआरसी
गोरखपुर। चीन के प्रति भारतीय जनमानस के विरोध को देखते हुए चीन ने भी पैंतरा बदल लिया है। अब चीन में निर्मित सामानों पर मेड इन चाइना की जगह मेड इन पीआरसी (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) लिखना शुरू कर दिया है। ताकि लोगों को यह पता नहीं चल सके कि उत्पाद चीन में बना हुआ है।