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इंपोस्टर सिंड्रोम: 'सब पाना है' की चाह में टूट रहे बच्चे, छोटी कमियों को समझ रहे हार- जानिए क्या हैं लक्षण

Tue, 04 Aug 2026 11:46 AM IST
Rohit Singh रजनी ओझा, गोरखपुर
रजनी ओझा, गोरखपुर Published by: Rohit Singh Updated Tue, 04 Aug 2026 11:46 AM IST
सार

ऐसे बच्चे खुद की उपलब्धि, काबिलियत व कामयाबी पर शक करने लगते हैं। ऐसे में कोई छोटी सी भी खुशी उनके हिस्से में आती है तो उन्हें इस बात पर विश्वास नहीं हो पाता है कि यह उन्होंने हासिल की है। उन्हें लगता है यह किस्मत से आई है। ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग भी की जा रही है।

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Children fall victim to imposter syndrome due to the pressure of competition.
दिमागी उलझनों से परेशान होता बचपन

विस्तार

प्रतियागी दौर में सब कुछ पा लेने की चाहत जितनी बच्चों को नहीं है उससे अधिक दबाव अभिभावक बना रहे हैं। नतीजतन बच्चे ‘इंपोस्टर सिंड्रोम’ का शिकार हो रहे हैं। सपनों को पूरा करने के लिए दौड़ लगा रहे बच्चे अपनी छोटी-छोटी कमियों को भी हार समझने लगे हैं।
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हाल-फिलहाल ऐसे कई मामले तेजी से बढ़े हैं और मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. मनोज पृथ्वीराज ने बताया कि इंपोस्टर सिंड्रोम एक ऐसा रोग है जो प्रतिस्पर्धा की वजह से 30 प्रतिशत बच्चों में दिखाई देता है।
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बीमारी के लक्षण हासिल करने के बाद भी व्यक्ति अपने आप को सक्षम नहीं समझता है। वह कड़ी मेहनत से हासिल जीत का श्रेय भी भाग्य को ही देता हैं।

ऐसे बच्चे खुद की उपलब्धि, काबिलियत व कामयाबी पर शक करने लगते हैं। ऐसे में कोई छोटी सी भी खुशी उनके हिस्से में आती है तो उन्हें इस बात पर विश्वास नहीं हो पाता है कि यह उन्होंने हासिल की है। उन्हें लगता है यह किस्मत से आई है। ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग भी की जा रही है। 
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अभिभावक समझें, हर बच्चा दूसरे से अलग
मनोचिकित्सक डॉ. आकृति बताती हैं कि इंपोस्टर सिंड्रोम होने न होने में अभिभावकों व वातावरण की मुख्य भूमिका रहती है। माता-पिता के साथ बच्चों को भी यह समझना होगा कि हर व्यक्ति एक दूसरे से अलग होता है। उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती।

साथ ही बच्चों को अपनी हार से सीखना होगा, जिससे आगे वह ऐसी गलती न करें। उन्हें हार के कारणों पर फोकस करना होगा और यह समझना होगा कि दुनिया में कोई भी इंसान हर क्षेत्र में उत्तम नहीं हो सकता।

ये हैं लक्षण
-
आत्मविश्वास की कमी
- सफल होने पर कोई पुरस्कार व खुशी मिलने की कोई आस न रखना

- नकारात्मक ख्याल रखना, खुबियों में भी खामियां ढूंढना

- भाग लेने से पहले ही नतीजे तय कर लेना
- किसी काम को करने से पहले अधिक सोचना

केस 1
देवरिया निवासी 13 वर्षीय बालक पढ़ने में काफी तेज था। माता-पिता चाहते थे कि वह उनकी तरह साहित्य में रुचि बढ़ाए। कक्षा में दूसरे, तीसरे स्थान पर होने पर भी परिवार वाले उसके साहित्य में आए कम अंकों के लिए उसे डांटते थे।

आलोचनाओं से परेशान होकर उसने एक-दो बार घर से भागने की कोशिश की पर सफल न हो सका। माता-पिता को पता लगने पर उन्होंने उसके दोस्तों से बात की। दोस्तों ने बताया कि वह दिन-रात किताबें पढ़ता है, अच्छे अंक भी लाता है लेकिन फिर भी अपने को अक्षम समझता है।

केस 2
राजेंद्र नगर में रहने वाली 15 वर्षीय एक बालिका को बैडमिंटन का बेहद शौक है लेकिन उसके परिवार का मानना है कि खेल में कॅरिअर नहीं बनाया जा सकता। करीब दो साल जब उसने माता-पिता से छुपकर खेल का प्रशिक्षण लिया तो उसका असर पढ़ाई में भी दिखने लगा।

एक शानदार खिलाड़ी होने के बाद भी उसे कम अंक लाने पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। मनोचिकित्सक ने बच्चे के अलावा माता-पिता की भी काउंसिलिंग की। उसके बाद धीरे-धीरे चीजों में सुधार हुआ।
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