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Gorakhpur News: सुख व दुख में समान परिस्थितियों में रहते हैं भगवान राम
Mon, 27 Jul 2026 02:20 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Mon, 27 Jul 2026 02:20 AM IST
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गोरखपुर। गुरु पूर्णिमा पर गोरखनाथ मंदिर में चल रही सप्तदिवसीय रामकथा के चौथे दिन रविवार को कथा व्यास आचार्य शांतनु कहा कि परिस्थिति सुखद हो या दुखद, दोनों में जो समान रहता है वह राम हैं। वे सुख में बहुत प्रसन्न नहीं होते और दुख में विचलित भी नहीं होते हैं।
कथा व्यास ने रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से जीवन को सुखी, संतुलित और संस्कारित बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धनुष अभिमान का प्रतीक है और धनुष यज्ञ यह शिक्षा देता है कि विवाह से पहले वर और वधू यदि अपने अहंकार का त्याग कर दें तो दांपत्य जीवन सुखमय और सामंजस्यपूर्ण बन सकता है।
उन्होंने कहा कि क्रोध आने पर व्यक्ति को अपना स्थान बदल लेना चाहिए। इससे क्रोध का वेग स्वतः शांत हो जाता है। जीव को संसार में बांधने वाली दो सबसे बड़ी रस्सियां ''''मैं'''' और ''''मेरा'''' हैं। जब मनुष्य इनका त्याग करता है, तभी उसके हृदय में भगवान का प्रवेश होता है। उन्होंने कहा कि आज विवाह समारोहों में नाच-गाने पर अधिक जोर दिया जाता है जबकि मंत्रोच्चार और वैदिक परंपराओं की उपेक्षा की जा रही है। उन्होंने कहा कि परिवार में सुख और सौहार्द बनाए रखने के लिए सास-ससुर बहू को बेटी और बहू अपने सास-ससुर को माता-पिता का सम्मान दें।
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उन्होंने कहा कि शुभ कार्य को कभी टालना नहीं चाहिए और दूसरों के सुख से ईर्ष्या करने के बजाय उसमें प्रसन्न होना चाहिए। मंथरा प्रसंग के माध्यम से उन्होंने दहेज प्रथा और कुसंग की बुराइयों पर प्रकाश डाला। कथा में परशुराम-लक्ष्मण संवाद, राम विवाह, राम के राज्याभिषेक और वनवास के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया।
इस अवसर पर गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, कालीबाड़ी महंत रविंद्रदास, योगी मिथिलेश नाथ, डॉ. अरविंद कुमार चतुर्वेदी, सांसद जगदंबिका पाल, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश सिंह, ब्लॉक प्रमुख डॉ. सुनीता सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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कथा व्यास ने रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से जीवन को सुखी, संतुलित और संस्कारित बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धनुष अभिमान का प्रतीक है और धनुष यज्ञ यह शिक्षा देता है कि विवाह से पहले वर और वधू यदि अपने अहंकार का त्याग कर दें तो दांपत्य जीवन सुखमय और सामंजस्यपूर्ण बन सकता है।
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उन्होंने कहा कि क्रोध आने पर व्यक्ति को अपना स्थान बदल लेना चाहिए। इससे क्रोध का वेग स्वतः शांत हो जाता है। जीव को संसार में बांधने वाली दो सबसे बड़ी रस्सियां ''''मैं'''' और ''''मेरा'''' हैं। जब मनुष्य इनका त्याग करता है, तभी उसके हृदय में भगवान का प्रवेश होता है। उन्होंने कहा कि आज विवाह समारोहों में नाच-गाने पर अधिक जोर दिया जाता है जबकि मंत्रोच्चार और वैदिक परंपराओं की उपेक्षा की जा रही है। उन्होंने कहा कि परिवार में सुख और सौहार्द बनाए रखने के लिए सास-ससुर बहू को बेटी और बहू अपने सास-ससुर को माता-पिता का सम्मान दें।
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उन्होंने कहा कि शुभ कार्य को कभी टालना नहीं चाहिए और दूसरों के सुख से ईर्ष्या करने के बजाय उसमें प्रसन्न होना चाहिए। मंथरा प्रसंग के माध्यम से उन्होंने दहेज प्रथा और कुसंग की बुराइयों पर प्रकाश डाला। कथा में परशुराम-लक्ष्मण संवाद, राम विवाह, राम के राज्याभिषेक और वनवास के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया।
इस अवसर पर गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, कालीबाड़ी महंत रविंद्रदास, योगी मिथिलेश नाथ, डॉ. अरविंद कुमार चतुर्वेदी, सांसद जगदंबिका पाल, भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश सिंह, ब्लॉक प्रमुख डॉ. सुनीता सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।