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UP: देश में मॉडल बना नगर निगम का जलभराव से बचाव का इंतजाम, शहरी निकायों के लिए उदाहरण बना गोरखपुर

अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Wed, 08 Apr 2026 02:57 AM IST
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सार

नगर निगम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी और फ्लड मॉडलिंग जैसी आधुनिक तकनीक से धरातल पर काम किया है। इससे 24 घंटे पहले ही वर्षा व जलभराव का पूर्वानुमान 80 प्रतिशत से अधिक सटीक हो गया है।

Gorakhpur Municipal Corporation's Waterlogging Management Becomes a Model for the Country
नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवार - फोटो : स्त्रोत- नगर निगम
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विस्तार

नगर निगम का एआई आधारित अर्बन फ्लड मैनेजमेंट सिस्टम देश भर में मॉडल बन गया है। इसके जरिये मानसूनी जलभराव की समस्या को कम करने में 65 प्रतिशत से अधिक सुधार दर्ज किया गया है। गोरखपुर में देश का पहला एआई-आधारित अर्बन फ्लड मैनेजमेंट सेल (यूएफएमसी) स्थापित किया गया है, जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) व नीति आयोग ने सराहा है।
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नगर निगम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी और फ्लड मॉडलिंग जैसी आधुनिक तकनीक से धरातल पर काम किया है। इससे 24 घंटे पहले ही वर्षा व जलभराव का पूर्वानुमान 80 प्रतिशत से अधिक सटीक हो गया है।
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ट्रायल फेज में 250 से अधिक शिकायतों में से 70 प्रतिशत का समाधान कुछ घंटों में हो गया जबकि समग्र प्रणाली दक्षता में 65 प्रतिशत से अधिक सुधार देखा गया। इस प्रणाली में एआई आधारित वर्षा पूर्वानुमान, सेंसर आधारित जलस्तर मॉनिटरिंग और स्टॉर्म वाटर मॉडलिंग को एकीकृत किया गया है।

जैसे ही जलस्तर बढ़ता है, सेंसर अलर्ट भेजते हैं और ऑटोमेटेड पंपिंग सिस्टम तुरंत सक्रिय हो जाता है, इससे जलभराव वाले इलाकों में रियल-टाइम समाधान सुनिश्चित होता है।

देशभर के शहरी निकायों के लिए बना उदाहरण
नीति आयोग ने अपने मूल्यांकन में पाया कि गोरखपुर मॉडल डेटा-आधारित पूर्वानुमान के जरिये देशभर के शहरी निकायों की आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत कर सकता है। इसे प्रतिक्रियात्मक से सक्रिय शहरी प्रबंधन की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना गया है।

इस अर्बन फ्लड मैनेजमेंट सेल (यूएफएमसी) का उद्घाटन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 23 जुलाई 2025 को किया था। यह एक उन्नत अर्बन फ्लड अर्ली वार्निंग और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम है।

दो प्रमुख पहलुओं पर किया गया कार्य
नगर आयुक्त गौरव सिंह सोगरवाल के अनुसार, शहरी बाढ़ जोखिम प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत दो प्रमुख पहलुओं पर कार्य किया गया है। पहला, अर्बन फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम, जो नागरिकों को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए चेतावनी और वास्तविक समय पर सूचना उपलब्ध कराता है।

दूसरा, डिसीजन सपोर्ट सिस्टम, जो शहर के लिए दीर्घकालिक योजना और नीति निर्माण में सहायता प्रदान करता है ताकि भविष्य में बाढ़ प्रबंधन क्षमताओं को अधिक सुदृढ़ और प्रभावी बनाया जा सके।

सभी पंपिंग स्टेशनों का पूर्ण ऑटोमेशन
इस परियोजना के अंतर्गत शहर के सभी महत्वपूर्ण नालों, सभी उपकरणों तथा सभी जिम्मेदार अधिकारियों एवं टीमों को उनके संपर्क विवरण सहित मैप किया गया है। शहर में कुल 28 जलभराव हॉटस्पॉट और 85 पॉइंट्स ऑफ इंटरेस्ट चिह्नित किए गए हैं, जो जलभराव की दृष्टि से अधिक संवेदनशील हैं।

शहर के सभी पंपिंग स्टेशनों का पूर्ण ऑटोमेशन किया गया है। 24 घंटे इमरजेंसी कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है, जो लगातार निगरानी और समन्वय का कार्य करता है। नागरिकों के लिए ग्रीवांस पोर्टल तैयार किया गया है, जिससे किसी भी समस्या की सूचना और उसका त्वरित समाधान सुनिश्चित किया जा सके।

हर 15 मिनट पर मिलती है बारिश से जुड़ी जानकारी
नगर आयुक्त ने बताया कि शहर में नगर निगम की ओर से दो ऑटोमेटिक रेन गेज भी लगाए गए हैं, जो हर 15 मिनट पर बारिश से जुड़ी जानकारी देते हैं। प्राइमरी व सेकंडरी नालों पर कुल 110 ऑटोमेटिक वाटर लेवल रिकॉर्डर लगाए गए हैं।

ये सेंसर हर 2 से 15 मिनट में जलस्तर से संबंधित सूचनाएं भेजते हैं। जब नालों में जलस्तर 80 प्रतिशत से अधिक हो जाता है तो संबंधित अधिकारियों को ऑटोमेटेड अलर्ट्स पहुंचने लगते हैं। जब संपवेल्स में जलस्तर 60 प्रतिशत से अधिक होता है, ऑटोमेटिक सिस्टम के माध्यम से पंप स्वतः चालू हो जाते हैं। ईंधन की कमी और पंप के रखरखाव से संबंधित चेतावनी भी अधिकारियों को समय रहते मिल जाती हैं।

जलभराव की शिकायतों पर प्रतिक्रिया का समय अब काफी कम
शहर के जिन पंपिंग स्टेशनों के संपवेल्स में जलस्तर 60 प्रतिशत से अधिक होता है, उन्हें कंट्रोल रूम से स्वचालित रूप से चालू कर दिया जाता है। यह प्रणाली पिछले चार महीनों से चल रही है और इसके नतीजे बहुत अच्छे रहे हैं।

मसलन, जलभराव की शिकायतों पर प्रतिक्रिया का समय काफी कम हुआ है। पहले 10-12 घंटे लगते थे, अब यह समय 1-2 घंटे से कम हो गया है, खासकर उन जगहों पर जहां पर बार-बार जलभराव होता था।
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