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UP: बैटरी से चलेगा लकड़ी वाला चूल्हा, धुआं भी नहीं, एक बार में बनाता है दस लोगों का खाना; कीमत है सिर्फ इतनी

अमर उजाला नेटवर्क, कुशीनगर Published by: Sharukh Khan Updated Thu, 11 Jun 2026 03:07 PM IST
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सार

कुशीनगर के मार्कडेय सिंह ने एक ऐसा लकड़ी वाला चूल्हा बनाया है जो बैटरी से चलेगा। धुआं भी नहीं होगा। यह चूल्हा एक बार में दस लोगों का खाना बनाता है। इस रिचार्जेबल चूल्हे की कीमत 1500 रुपये है। अब तक 40 बिक चुके हैं।

UP Innovator Develops Battery-Powered Smokeless Wood Stove Offers Efficient Cooking
battery powered stove - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

कुशीनगर के उजारनाथ के ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी के पारंपरिक चूल्हों से निकलने वाले धुएं और अधिक ईंधन खपत की समस्या के बीच करमैनी गांव के मार्कंडेय सिंह ने अनोखा समाधान खोज निकाला है। गांव निवासी मार्कंडेय सिंह ने ऐसा धुआं रहित लकड़ी का चूल्हा तैयार किया है, जो कम लकड़ी में अधिक तापमान उत्पन्न करता है और भोजन को जल्दी पकाने में मदद करता है।


स्टील से निर्मित इस चूल्हे में छोटा पंखा और रिचार्जेबल बैटरी लगाई गई है। पंखा लकड़ी को लगातार ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है, जिससे दहन बेहतर होता है और धुएं का उत्सर्जन काफी कम हो जाता है। मार्कंडेय सिंह के अनुसार, एक बार चार्ज करने पर बैटरी लगभग तीन दिन तक कार्य करती है।
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उन्होंने बताया कि इस चूल्हे से ईंधन की खपत भी कम होती है। उनका दावा है कि करीब एक किलोग्राम लकड़ी से दस लोगों के लिए भोजन तैयार किया जा सकता है। धुआं कम निकलने से रसोई में काम करने वाली महिलाओं को भी राहत मिलती है। 

 

तमकुहीराज की एसडीएम आकांक्षा मिश्रा ने चूल्हे का परीक्षण कर इसकी कार्यप्रणाली को देखा। नवाचार से प्रभावित होकर उन्होंने इसकी सराहना की और स्वयं भी एक चूल्हा खरीदा। 

 
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एक बार चार्ज करने पर तीन दिन चलता है
चूल्हे में 12 वोल्ट की बैटरी और एक पंखा लगा है। बैटरी रिचार्जेबल है जो तीन घंटे में पूरी तरह चार्च हो जाती है। एक बार चार्ज करने के बाद यह करीब 12 घंटे तक आराम से चल सकती है। इसको बनाने की लागत करीब एक हजार रुपये आती है। गैस चूल्हे की तरह इसकी आंच को भी कम और ज्यादा किया जा सकता है।

 

दसवीं तक ही शिक्षा...
मार्कडेय सिंह की शिक्षा दसवीं तक ही हुई है पर तकनीकी काम करने के कारण उनके मन में हमेशा कुछ न कुछ करने की इच्छा रहती थी। मुंबई से लेकर दुबई तक रोजी-रोटी के सिलसिले में गए। करीब एक साल पहले उनके दिमाग में इस तरह के चूल्हे का ख्याल आया। तीन बार असफल रहे पर चौथी बार में कामयाबी मिली और आज जो भी लोग उनके बनाए चूल्हे का इस्तेमाल कर रहे हैं वे इसके मुरीद हो चुके हैं।
 
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