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मूल संहिताओं का अध्ययन करना जरूरी : प्रो. करतार
Fri, 17 Jul 2026 03:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Fri, 17 Jul 2026 03:51 AM IST
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कुरुक्षेत्र। आचार्य सुश्रुत की परंपरा से जुड़ना गौरव और जिम्मेदारी का विषय है। आयुर्वेद के विद्यार्थी भविष्य में प्रभावी शिक्षक, चिकित्सक या वक्ता बनना चाहते हैं तो उन्हें मूल संहिताओं का गहन अध्ययन करना होगा। केवल नोट्स या पुस्तकों पर निर्भर रहने से ज्ञान की मौलिकता प्रभावित होती है।
समय के साथ अनेक त्रुटियां भी आगे बढ़ती हैं। ये विचार श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र तथा प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की ओर से आचार्य सुश्रुत जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में चिकित्सकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि आचार्य सुश्रुत को ऋषि स्वरूप में चित्रित किया जाना केवल कलाकारों की कल्पना नहीं, उनके तप, अनुसंधान, ज्ञान-साधना और चिकित्सा विज्ञान में अद्वितीय योगदान का प्रतीक है। शल्य चिकित्सा का अभ्यास ही नहीं किया, अपने शोध एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा प्रदान की। सुश्रुत संहिता के विकास को सही ऐतिहासिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।
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बाद में आचार्य नागार्जुन सहित अनेक विद्वानों ने समय की आवश्यकता अनुसार इसमें संपादन, संशोधन एवं विस्तार किया। विशेष रूप से उत्तरतंत्र का समावेश आयुर्वेद की निरंतर विकसित होती वैज्ञानिक परंपरा का प्रमाण है। आचार्य सुश्रुत के योगदान का जितना गहराई से अध्ययन किया जाए, नए वैज्ञानिक तथ्य सामने आएंगे।
कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता ने कहा कि नींव दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरा भवन उसी पर खड़ा होता है। बीज दिखाई नहीं देता, लेकिन उसी से विशाल वृक्ष बनता है और हवा दिखाई नहीं देती, लेकिन वही जीवन का आधार है। संवाद
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समय के साथ अनेक त्रुटियां भी आगे बढ़ती हैं। ये विचार श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र तथा प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की ओर से आचार्य सुश्रुत जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में चिकित्सकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
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उन्होंने कहा कि आचार्य सुश्रुत को ऋषि स्वरूप में चित्रित किया जाना केवल कलाकारों की कल्पना नहीं, उनके तप, अनुसंधान, ज्ञान-साधना और चिकित्सा विज्ञान में अद्वितीय योगदान का प्रतीक है। शल्य चिकित्सा का अभ्यास ही नहीं किया, अपने शोध एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा प्रदान की। सुश्रुत संहिता के विकास को सही ऐतिहासिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।
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बाद में आचार्य नागार्जुन सहित अनेक विद्वानों ने समय की आवश्यकता अनुसार इसमें संपादन, संशोधन एवं विस्तार किया। विशेष रूप से उत्तरतंत्र का समावेश आयुर्वेद की निरंतर विकसित होती वैज्ञानिक परंपरा का प्रमाण है। आचार्य सुश्रुत के योगदान का जितना गहराई से अध्ययन किया जाए, नए वैज्ञानिक तथ्य सामने आएंगे।
कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता ने कहा कि नींव दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरा भवन उसी पर खड़ा होता है। बीज दिखाई नहीं देता, लेकिन उसी से विशाल वृक्ष बनता है और हवा दिखाई नहीं देती, लेकिन वही जीवन का आधार है। संवाद