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सद्भाव की अयोध्या : एक ही रिक्शे पर बैठकर कचहरी जाते थे परमहंस और हाशिम

Fri, 18 Oct 2019 03:48 PM IST
Amulya Rastogi नितिन कुमार मिश्र, अमर उजाला अयोध्या
नितिन कुमार मिश्र, अमर उजाला अयोध्या Published by: Amulya Rastogi Updated Fri, 18 Oct 2019 03:48 PM IST
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ayodhya of good intentions : flash back of paramhans and hashim's good friendship
परमहंस और हाशिम - फोटो : amar ujala
राम मंदिर के पैरोकार रहे परमहंस रामचंद्र दास और बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं। दोनों के बीच वैचारिक लड़ाई जरूर थी, लेकिन उनकी दोस्ती अटूट थी। अब शायद ही ऐसा देखने को मिले। दोनों साथ एक ही रिक्शे पर सवार होकर कचहरी जाते थे। दिनभर की जिरह के बाद हसंते-बोलते एक ही रिक्शे से घर वापस आते थे। करीब 6 दशक तक यूं ही उन्होंने दोस्ती निभाई। 

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राम मंदिर के पैरोकार रहे परमहंस रामचंद्र दास और बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं। दोनों के बीच वैचारिक लड़ाई जरूर थी, लेकिन उनकी दोस्ती अटूट थी। अब शायद ही ऐसा देखने को मिले। दोनों साथ एक ही रिक्शे पर सवार होकर कचहरी जाते थे। दिनभर की जिरह के बाद हसंते-बोलते एक ही रिक्शे से घर वापस आते थे। करीब 6 दशक तक यूं ही उन्होंने दोस्ती निभाई। 

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद को लेकर सुनवाई के दौरान अंदर व बाहर पक्षकारों की तल्खी और अब फैसले के इंतजार में कड़वे बोल के बीच परमहंस व हाशिम को याद करना मौजूं है। मौजूदा समय में दोनों तरफ के जो पैरोकार हैं उनके जैसे रिश्ते नहीं दिखते। एक वक्त था कि आंदोलन उफान पर होने के बावजूद संवाद होता था। 

अयोध्या के महंत नारायणाचारी बताते हैं कि उन दिनों में हम यह इंतजार किया करते थे कि कब दोनों लोग खाली समय में दन्तधावन कुंड के पास आएंगे। अक्सर शाम होते वह एक साथ आते थे और ताश खेलते थे। यह खेल देर रात तक चलता था। चाय पी जाती थी, नाश्ता किया जाता था, लेकिन एक भी शब्द मंदिर-मस्जिद को लेकर नहीं बोला जाता था। उनकी लड़ाई वैचारिक थी। 

वह अपने-अपने हक और आराध्य के लिए कचहरी में पैरवी करते थे। उनकी कोई भी व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। परमहंस पर किताब लिखने वाले संतोष त्रिपाठी की मानें तो हाशिम अंसारी गजब जीवट के आदमी थे। उनके चेहरे पर झुर्रियों के साथ-साथ मायूसी कभी नहीं देखी। हाशिम अयोध्या के उन कुछ चुनिंदा बचे हुए लोगों में से थे, जो दशकों तक अपने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान और कानून के दायरे में रहते हुए अदालती लड़ाई लड़ते रहे। 

हाशिम अंसारी के स्थानीय हिंदू साधु-संतों से उनके रिश्ते कभी खराब नहीं हुए। मैं जब भी उनके घर गया, हमेशा आस-पड़ोस के हिंदू युवक चचा-चचा कहते हुए उनसे बतियाते हुए मिले। समाजसेवी शैलेंद्र मोहन मिश्र जब महंत रामचंद्र परमहंस का देहांत की सूचना हाशिम अंसारी को मिली तो वह पूरी रात उनके पास रहे। दूसरे दिन अंतिम संस्कार के बाद ही वह अपने घर गए।

हाशिम के बेटे इकबाल अंसारी बताते हैं कि अब्बू (हाशिम) 1949 से मुकदमें की पैरवी शुरू की थी, लेकिन आज तक किसी हिंदू ने उनको एक लफ्ज गलत नहीं कहा। हमारा उनसे भाईचारा है, वो हमको दावत देते हैं। मैं उनके यहां सपरिवार दावत खाने जाता हूं। दिगंबर अखाड़ा के रामचंद्र परमहंस से अब्बू की अंत तक गहरी दोस्ती रही। 

महंत ज्ञानदास कहते हैं कि परमहंस और हाशिम अब जीवित नहीं रहे, लेकिन उनकी दोस्ती अयोध्या-अवध की मिलीजुली गंगा-जमुनी तहजीब का केंद्र रही है। हाशिम इसी संस्कृति में पले बढ़े थे, जहां मुहर्रम के जुलूस पर हिंदू फूल बरसाते हैं और नवरात्रि के जुलूस पर मुसलमान फूलों की बारिश करते हैं। हाशिम का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है। वो 1921 में पैदा हुए थे। 20 जुलाई 2016 को उनका देहांत हो गया। 

वहीं, 11 साल की उम्र में 1932 में हाशिम के पिता का देहांत हो गया था। दर्जा (कक्षा) दो तक पढ़ाई की थी। फिर सिलाई यानी दर्जी का काम करने लगे। फैजाबाद में उनकी शादी हुई। उनके दो बच्चे एक बेटा और एक बेटी हैं। उनके परिवार की आमदनी का कोई खास जरिया नहीं है। 6 दिसंबर 1992 के बलवे में बाहर से आए दंगाइयों ने उनका घर जला दिया, लेकिन अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचा लिया। 

परमहंस रामचंद्र 1913 में जन्मे 92 वर्षीय रामचंद्र परमहंस का 31 जुलाई 2003 को अयोध्या में निधन हो गया था। वे 1934 से ही अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े थे। दिगम्बर अखाड़ा, अयोध्या में परमहंस रामचन्द्र दास अध्यक्ष रहे, जिसमें श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। 
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