अयोध्या: राष्ट्रपति ने राम मंदिर में की दिव्य श्रीराम यंत्र की स्थापना, स्थानीय सांसद को नहीं मिला निमंत्रण
Shri Ram Yantra: इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने कहा कि हम सभी एक समावेशी समाज और विकसित राष्ट्र के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। प्रभु श्री राम के आशीर्वाद से हम इन लक्ष्यों को 2047 तक, शायद उससे भी पहले, प्राप्त कर लेंगे।
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अयोध्या के भव्य श्रीराम मंदिर में बृहस्पतिवार को एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण साकार हुआ, जब अभिजीत मुहूर्त की पावन बेला में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंदिर के दूसरे तल पर श्रीराम यंत्र की विधिवत स्थापना की और उसकी प्रथम आरती उतारी। दीप की लौ के साथ जैसे ही आरती आरंभ हुई, पूरा परिसर जय श्रीराम के उद्घोष, शंखध्वनि और घंटों के नाद से गुंजायमान हो उठा।
इस दिव्य क्षण तक पहुंचने के लिए पिछले कई दिनों से वैदिक अनुष्ठानों की सतत शृंखला चल रही थी। राष्ट्रपति सुबह 10:30 बजे महर्षि बाल्मीकि एयरपोर्ट पहुंचीं। यहां से सड़क मार्ग से होते हुए राम मंदिर के गेट नंबर 11 से परिसर में प्रवेश किया। इसके बाद लिफ्ट से राम मंदिर के प्रथम तल पर पहुंचीं। यहां से 40 सीढि़या चढ़कर मंदिर के दूसरे तल पर गईं। जहां राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि और आचार्य इंद्रदेव मिश्र सहित अन्य आचार्यों ने विधि-विधानपूर्वक श्रीराम यंत्र का पूजन-अर्चन संपन्न कराया। अभिजीत मुहूर्त में 11:17 बजे राष्ट्रपति ने श्रीराम यंत्र की पहली आरती उतारी।
यहां पूजन के बाद नीचे उतरकर प्रथम तल पर रामपरिवार की आरती उतारी। फिर सिढि़यों से नीचे आकर भूतल में विराजमान रामलला के दरबार में हाजिरी लगाई। इस दौरान श्रीराम चंद्र कृपालु भज मन हरण...की धुन निरंतर गूंज रही थी। पूजन-अर्चन के बाद उन्होंने परकोटा व मंदिर की दीवारों पर बने म्यूरल्स को भी देखा। वह अपने साथ परिवार के दो बच्चे भी लाई थीं, जो पूजन के दौरान पूरे समय मौजूद रहे। श्रीराम यंत्र स्थापना के समय उनके साथ सीएम योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मां अमृतानंदमयी, डॉ़ अनिल मिश्र, गोपाल राव भी मौजूद रहे।
राम मंदिर में स्थापित श्रीराम यंत्र की खासियत
- सिंहासन के ऊपर जय श्रीराम लिखा है।
- श्रीराम यंत्र में 125 देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं।
- महाराष्ट्र के टीक वुड की लकड़ी के फ्रेम में यंत्र निर्मित है।
- लकड़ी यानी फ्रेम का निर्माण हैदराबाद में हुआ है।
नव संवत्सर कार्यक्रम में भी सांसद को नहीं मिला निमंत्रण
श्रीराम मंदिर में बृहस्पतिवार को आयोजित नव संवत्सर व श्रीराम यंत्र स्थापना के अवसर पर भी सांसद अवधेश प्रसाद को निमंत्रण नहीं मिला। इस पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देकर सरकार की छोटी मानसिकता का प्रतीक बताया है।
सांसद ने कहा कि आमंत्रण देना राष्ट्रपति का नहीं, सरकार का काम है। इस बार भी उन्हें जिला प्रशासन या राम मंदिर ट्रस्ट की ओर से नहीं बुलाया गया है। हालांकि, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की धरती पर देश की राष्ट्रपति का आगमन हो रहा है, उनका अभिनंदन और स्वागत है। देवतुल्य मतदाताओं व प्रभु श्रीराम की जनता-जनार्दन की तरफ से उनका अभिवादन है।
अच्छा होता है कि सरकार उन्हें इस कार्यक्रम में आमंत्रित करती तो वह नजदीक से एक सांसद और अयोध्या के प्रतिनिधि के रूप में उनका स्वागत करते। कहा कि न जाने सरकार उनसे क्यों परहेज करती है। अयोध्या में दीपोत्सव, प्राण प्रतिष्ठा और ध्वजारोहण जैसे कार्यक्रमों में श्रीराम की प्रजा से भी सरकार दूरी बनाती है। इससे प्रभु श्रीराम की मर्यादा को भी ठेस पहुंचती है।
राष्ट्रपति ने अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर जाकर रामलला के दर्शन किए
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (19 मार्च, 2026) उत्तर प्रदेश के अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर जाकर राम लला के दर्शन किये। उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर के भीतर विभिन्न स्थानों पर दर्शन एवं आरती की और श्री राम यंत्र स्थापना और पूजन भी किया।इस अवसर पर अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि अयोध्या नगरी की पवित्र धूलि का स्पर्श करना ही उनका परम सौभाग्य है, यह वही पवित्र नगरी है जहां प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था। उन्होंने कहा कि चैत्र शुक्ल संवत्सर 2083 के प्रारंभ और नवरात्रि के पहले दिन यहां उपस्थित होना उनके लिए वास्तव में एक सौभाग्य है।
राष्ट्रपति ने कहा कि इस अत्यंत पवित्र श्री राम जन्मभूमि मंदिर के भूमि पूजन, यहां राम लला के दिव्य विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा, राम दरबार का भक्तजनों के लिए खोला जाना तथा मंदिर के शिखर पर धर्म-ध्वजारोहण के दिन हमारे इतिहास और संस्कृति की स्वर्णिम तिथियां हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि हम सभी एक समावेशी समाज और विकसित राष्ट्र के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। प्रभु श्री राम के आशीर्वाद से हम इन लक्ष्यों को 2047 तक, शायद उससे भी पहले, प्राप्त कर लेंगे। 21वीं सदी में, हमारे समावेशी समाज और विकसित राष्ट्र की परिकल्पना राम राज्य के वर्णन में प्राप्त होती है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि राम-राज्य में न कोई दुखी है, न निर्धन है, न परावलंबी है, न बुद्धिहीन है और न ही कोई संस्कारहीन है।
राष्ट्रपति ने कहा कि राम राज्य का आदर्श आर्थिक समृद्धि और सामाजिक समरसता के उच्चतम मानकों को प्रस्तुत करता है। प्रभु श्री राम के जीवन के अनेक उदाहरण सर्वव्यापी और समावेशी जीवन दर्शन के आदर्श को दर्शाते हैं। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि समकालीन संदर्भ में सामाजिक समावेश और आर्थिक न्याय सहित राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं और उन्हें क्रियान्वित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राम राज्य के आदर्शों पर चलते हुए हम सब नैतिकता और धर्माचरण पर आधारित राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे। राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे देश का पुनर्जागरण आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सभी आयामों में हो रहा है।
राष्ट्रपति ने कहा कि नागरिकों को एकता की भावना से आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रभु श्री राम के प्रति भक्ति के पवित्र बंधन से एकजुट होकर और सभी के प्रति आत्मीयता की भावना रखते हुए, हमें राष्ट्र निर्माण में संलग्न होना चाहिए।
राम मंदिर से देश को संदेश, आस्था के साथ सम्मान का उत्सव
श्रीराम यंत्र की स्थापना का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि इसने आस्था के साथ सम्मान और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया है। राष्ट्रपति की मौजूदगी में हुए इस आयोजन में विभिन्न जाति, धर्म व राज्य के लोगों की भागीदारी से ''''एक भारत-श्रेष्ठ भारत'''' की भावना भी सशक्त हुई।
राम मंदिर में बृहस्पतिवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मौजूदगी में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीराम यंत्र की स्थापना की गई। इस आयोजन में देश के कोने-कोने से रामभक्त आमंत्रित किए गए थे। अलग-अलग भाषाएं, वेशभूषाएं और परंपराएं एक ही मंच पर दिखाई दीं, जिससे सांस्कृतिक विविधता में एकता का संदेश और मजबूत हुआ। इसी दौरान उन्होंने मंदिर निर्माण में किसी भी तरह का योगदान देने वालों को भी तरजीह दी।
श्रम और समर्पण के प्रति मजबूत किया आदर का भाव
मंदिर निर्माण में जुटे श्रमिकों, कारीगरों, शिल्पकारों और अभियंताओं व सहयोगियों को सम्मानित करना इस कार्यक्रम का भावुक क्षण रहा। इससे राष्ट्रपति ने संदेश दिया कि राम मंदिर एक धार्मिक स्थल ही नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और हजारों हाथों के श्रम का परिणाम भी है। इस सम्मान के जरिये उन्होंने समाज में श्रम और समर्पण के प्रति आदर का भाव मजबूत किया। अपने भाषण में भी उन्होंने रामराज्य और विविधता में एकता की भावना का कई बार जिक्र किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा है। उन्होंने आस्था के प्रति सम्मान, परंपराओं के प्रति स्वीकार्यता और सभी वर्गों के योगदान की सराहना की।
दुनिया में युद्ध चल रहे और हम कर रहे रामराज्य की अनुभूति: योगी
जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध, अस्थिरता और भय का माहौल है, उसी समय अयोध्या से शांति, आस्था और रामराज्य का संदेश गूंजा। श्रीराम यंत्र स्थापना के अनुष्ठान अवसर पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सरयू का पावन प्रवाह अयोध्या को निरंतर पवित्र करता है। आज यहां उपस्थित होकर हजारों लोग भयमुक्त वातावरण में रामराज्य की अनुभूति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया में युद्ध चल रहे हैं, लेकिन हम यहां श्रीराम यंत्र की प्रतिष्ठा में सहभागी बन रहे हैं, यह भारत की आत्मा है।
मुख्यमंत्री ने बदलती सामाजिक सोच पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी अब भटकाव से दूर होकर अपनी जड़ों की ओर लौट रही है। अब लोग नववर्ष पर परिवार के साथ मंदिर जाते हैं, न कि ऐसे पर्यटन स्थलों पर जहां सनातन के विरोध में गतिविधियां होती हैं। मुख्यमंत्री ने श्रीराम मंदिर निर्माण की पूरी यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि भूमि पूजन से लेकर रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा और अब श्रीराम यंत्र स्थापना तक का हर चरण करोड़ों भारतीयों के लिए गर्व और आनंद का विषय है।
मुख्यमंत्री के अनुसार, वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थलों पर 156 करोड़ श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचे। अयोध्या, काशी, प्रयागराज और मथुरा-वृंदावन में उमड़ी यह भीड़ बताती है कि भारत की आध्यात्मिक धारा अब और प्रबल हो रही है। मुख्यमंत्री ने राम मंदिर आंदोलन में योगदान देने वाले संतों, रामभक्तों और कारीगरों को नमन किया। उन्होंने विशेष रूप से दिवंगत विहिप नेता अशोक सिंघल सहित उन सभी को याद किया, जिनके प्रयासों से यह स्वप्न साकार हुआ।
आस्था को अंधविश्वास कहकर अपमानित किया गया था
विपक्ष पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग कभी राम मंदिर, काशी और मथुरा की आस्था को अंधविश्वास बताते थे, वही लोग अपने राजनीतिक हितों के लिए अलग मानदंड अपनाते रहे। कहा कि आस्था को अंधविश्वास कहकर अपमानित किया गया था। इसे अपमानित करने वाले वही लोग हैं, जो सत्ता बचाने के लिए नोएडा नहीं जाते थे। नोएडा न जाना उनके लिए अंधविश्वास नहीं था, लेकिन राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम, कृष्ण-कन्हैया के मथुरा-वृंदावन की बात करना अंधविश्वास का पर्याय था। लेकिन जो आस्था 500 वर्ष तक निरंतर बनी रही, संघर्षों का मुकाबला करती रही, वह न रुकी, न डिगी और न झुकी। आस्था को अपमानित करने वाली सत्ता के खिलाफ संघर्ष निरंतर जारी रहा। अंततः वह दिन आया, जब अयोध्या इस रूप में सबके सामने है।