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Lucknow News: सरकारी संस्थानों में कैंसर की दवाओं का संकट गहराया
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प्रतीकात्मक।
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लखनऊ। राजधानी के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में कैंसर मरीजों के इलाज पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। जीवनरक्षक कीमोथेरेपी दवाएं सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लाटिन और ऑक्सालिप्लाटिन मांग के मुताबिक उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। खुले बाजार से भी ये दवाएं पूरी तरह गायब हैं, जिससे मरीजों का इलाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
केजीएमयू, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान और लोहिया अस्पताल सहित सभी बड़े सरकारी संस्थानों में यह संकट बना हुआ है। अस्पताल प्रभारियों का कहना है कि नया स्टॉक नहीं मिल रहा है और पुराना स्टॉक खत्म होने की कगार पर है।
प्लेटिनम की कीमतों में उछाल से थमी आपूर्ति
अधिकारियों और दवा निर्माताओं के मुताबिक, इस किल्लत के पीछे मुख्य वजह इन दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली धातु प्लेटिनम की कीमतों में आई भारी तेजी है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जो प्लेटिनम सितंबर 2025 में लगभग 3,869 रुपये प्रति ग्राम था, वह फरवरी 2026 तक बढ़कर करीब 8,000 रुपये प्रति ग्राम पहुंच चुका है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, खनन संकट और सेमीकंडक्टर व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उद्योगों में प्लेटिनम की बढ़ती मांग के चलते इसकी उपलब्धता पर भारी दबाव है।
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घाटे का सौदा बना उत्पादन, कंपनियों ने मांगी 50% बढ़ोतरी की अनुमति
दवा कंपनियों का साफ कहना है कि कच्चे माल (प्लेटिनम) की लागत अब राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की ओर से तय की गई अधिकतम खुदरा मूल्य से भी ज्यादा हो गई है। मौजूदा सरकारी कीमतों पर दवाओं का उत्पादन करना कंपनियों के लिए घाटे का सौदा बन चुका है। इस स्थिति से निपटने के लिए फार्मा कंपनियों ने एनपीपीए से कीमोथेरेपी दवाओं की कीमतों में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी की अनुमति मांगी है। यदि सरकार ने जल्द ही कीमतों पर कोई फैसला नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में यह संकट और बढ़ सकता है।
खतरे में पड़ेगी मरीजों की जान
सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लाटिन और ऑक्सालिप्लाटिन को सिर, गले, कोलन, फेफड़े और अंडाशय के कैंसर के इलाज के लिए सबसे भरोसेमंद और सस्ती दवाएं माना जाता है। कैंसर रोग विशेषज्ञों का कहना है कि मरीज पहले से ही महंगे इलाज और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में इन बुनियादी दवाओं की कमी के कारण हजारों मरीजों की कीमोथेरेपी रुक सकती है, जिससे सीधे तौर पर उनकी जान को खतरा पैदा हो गया है।
Iइन तीन दवाओं में दो दवा संस्थान में है। इसमें एक दवा आर्डर देने के बाद भी नहीं मिल पाई है।I
Iडॉ. सीएम सिंह, निदेशक लोहिया संस्थानI
Iदवाओं का नया स्टाक नहीं मिल पा रहा है। अभी तक पुराने बचे हुए स्टाक से मरीजों को दवा मिल रही थी। अभी संकट बना हुआ है। I
Iडॉ. एमएलबी भट्ट, निदेशक कैंसर संस्थानI
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केजीएमयू, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान और लोहिया अस्पताल सहित सभी बड़े सरकारी संस्थानों में यह संकट बना हुआ है। अस्पताल प्रभारियों का कहना है कि नया स्टॉक नहीं मिल रहा है और पुराना स्टॉक खत्म होने की कगार पर है।
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प्लेटिनम की कीमतों में उछाल से थमी आपूर्ति
अधिकारियों और दवा निर्माताओं के मुताबिक, इस किल्लत के पीछे मुख्य वजह इन दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली धातु प्लेटिनम की कीमतों में आई भारी तेजी है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जो प्लेटिनम सितंबर 2025 में लगभग 3,869 रुपये प्रति ग्राम था, वह फरवरी 2026 तक बढ़कर करीब 8,000 रुपये प्रति ग्राम पहुंच चुका है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, खनन संकट और सेमीकंडक्टर व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उद्योगों में प्लेटिनम की बढ़ती मांग के चलते इसकी उपलब्धता पर भारी दबाव है।
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घाटे का सौदा बना उत्पादन, कंपनियों ने मांगी 50% बढ़ोतरी की अनुमति
दवा कंपनियों का साफ कहना है कि कच्चे माल (प्लेटिनम) की लागत अब राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की ओर से तय की गई अधिकतम खुदरा मूल्य से भी ज्यादा हो गई है। मौजूदा सरकारी कीमतों पर दवाओं का उत्पादन करना कंपनियों के लिए घाटे का सौदा बन चुका है। इस स्थिति से निपटने के लिए फार्मा कंपनियों ने एनपीपीए से कीमोथेरेपी दवाओं की कीमतों में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी की अनुमति मांगी है। यदि सरकार ने जल्द ही कीमतों पर कोई फैसला नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में यह संकट और बढ़ सकता है।
खतरे में पड़ेगी मरीजों की जान
सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लाटिन और ऑक्सालिप्लाटिन को सिर, गले, कोलन, फेफड़े और अंडाशय के कैंसर के इलाज के लिए सबसे भरोसेमंद और सस्ती दवाएं माना जाता है। कैंसर रोग विशेषज्ञों का कहना है कि मरीज पहले से ही महंगे इलाज और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में इन बुनियादी दवाओं की कमी के कारण हजारों मरीजों की कीमोथेरेपी रुक सकती है, जिससे सीधे तौर पर उनकी जान को खतरा पैदा हो गया है।
Iइन तीन दवाओं में दो दवा संस्थान में है। इसमें एक दवा आर्डर देने के बाद भी नहीं मिल पाई है।I
Iडॉ. सीएम सिंह, निदेशक लोहिया संस्थानI
Iदवाओं का नया स्टाक नहीं मिल पा रहा है। अभी तक पुराने बचे हुए स्टाक से मरीजों को दवा मिल रही थी। अभी संकट बना हुआ है। I
Iडॉ. एमएलबी भट्ट, निदेशक कैंसर संस्थानI