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Lucknow News: शायरी, संगीत और कथक से सजा जश्न-ए-अदब
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शायरी, संगीत और कथक से सजा जश्न-ए-अदब
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लखनऊ। साहित्योत्सव जश्न-ए-अदब के दूसरे दिन शायरी, संगीत और कथक के साथ बैंतबाजी व आल्हा गायन की प्रस्तुतियां हुईं। दूसरे दिन की शुरुआत लखनऊ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की ओर से प्रस्तुत काव्य अंत्याक्षरी बैंतबाजी से हुई। इसके बाद छोटेलाल पाल ग्रुप की ओर से आल्हा गायन की प्रस्तुति दी गई।
सांस्कृतिक सत्रों में शिंजनी कुलकर्णी और उनके समूह की ओर से बुल्लेशाह की रचना पर कथक की प्रस्तुति दी गई। कॉमेडियन रहमान खान के साथ लाफ्टर, लिटरेचर और लखनवी तहज़ीब विषय पर संवाद ने दर्शकों को खूब हंसाया। शाम के आयोजनों में सबसे खास प्रस्तुति रही पद्मभूषण पं. साजन मिश्रा और स्वरांश मिश्रा की। उन्होंने ‘सुर संध्या’ शास्त्रीय गायन की प्रस्तुति दी। इसके बाद पद्मश्री डॉ. यश गुलाटी ने सेक्सोफ़ोन बजाकर श्रोताओं का दिल जीत लिया। अंतिम सत्र शब्द रंग में देश के मशहूर शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को आनंदित किया। वसीम बरेलवी ने पढ़ा- तुम अपने बारे में कुछ देर सोचना छोड़ो, तो मैं बताऊं कि तुम किस क़दर अकेले हो।
कुंवर रंजीत चौहान ने सुनाया- उस दिलनशीं को देखकर हम बस वहीं ठहर गए, ये भी नहीं कि जिंदा हैं, ये भी नहीं कि मर गए। अज़्म शाकरी पढ़ा- आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं, आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूं...। जावेद मुशिरी ने सुनाया- सहेजा है इन्हें मैंने जतन से, मेरी पहचान होती है सुखन से। जमुना प्रसाद उपाध्याय ने सुनाया- जानते हो तुम मुझे और मेरे सारे पासवर्ड, सब तुम्हें मालूम है, इस फ़ोन में है क्या छुपा। अनस फैजी ने पढ़ा- हमने उसे बिठाया था सर आंख पर मगर, दिल से उतर गया तो नज़र का नहीं रहा। रंजन निगम ने भी अपने कलाम सुनाए।
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सांस्कृतिक सत्रों में शिंजनी कुलकर्णी और उनके समूह की ओर से बुल्लेशाह की रचना पर कथक की प्रस्तुति दी गई। कॉमेडियन रहमान खान के साथ लाफ्टर, लिटरेचर और लखनवी तहज़ीब विषय पर संवाद ने दर्शकों को खूब हंसाया। शाम के आयोजनों में सबसे खास प्रस्तुति रही पद्मभूषण पं. साजन मिश्रा और स्वरांश मिश्रा की। उन्होंने ‘सुर संध्या’ शास्त्रीय गायन की प्रस्तुति दी। इसके बाद पद्मश्री डॉ. यश गुलाटी ने सेक्सोफ़ोन बजाकर श्रोताओं का दिल जीत लिया। अंतिम सत्र शब्द रंग में देश के मशहूर शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को आनंदित किया। वसीम बरेलवी ने पढ़ा- तुम अपने बारे में कुछ देर सोचना छोड़ो, तो मैं बताऊं कि तुम किस क़दर अकेले हो।
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कुंवर रंजीत चौहान ने सुनाया- उस दिलनशीं को देखकर हम बस वहीं ठहर गए, ये भी नहीं कि जिंदा हैं, ये भी नहीं कि मर गए। अज़्म शाकरी पढ़ा- आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं, आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूं...। जावेद मुशिरी ने सुनाया- सहेजा है इन्हें मैंने जतन से, मेरी पहचान होती है सुखन से। जमुना प्रसाद उपाध्याय ने सुनाया- जानते हो तुम मुझे और मेरे सारे पासवर्ड, सब तुम्हें मालूम है, इस फ़ोन में है क्या छुपा। अनस फैजी ने पढ़ा- हमने उसे बिठाया था सर आंख पर मगर, दिल से उतर गया तो नज़र का नहीं रहा। रंजन निगम ने भी अपने कलाम सुनाए।

शायरी, संगीत और कथक से सजा जश्न-ए-अदब

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