पर्दे पर हम जिनती भी फिल्में देखते हैं, उनके हीरो और हीरोइन को कभी नहीं भूलते। लेकिन किसी भी कहानी को पर्दे पर उतारने में सबसे बड़ा हाथ जिसका होता है उसे बहुत ही कम लोग पहचानते हैं। लेकिन समय के साथ इसमें भी बदलाव आने लगा है। अब दर्शक फिल्मी पर्दे पर कहानी को बेहतरीन ढंग से पेश करने वाले डायरेक्टर को भी जानने लगे हैं। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि फिल्म की कहानी के साथ एडिटिंग भी बहुत मायने रखती हैं। एडिटिंग सिर्फ अच्छे शॉट्स या सीन्स को फिल्म में रखना नहीं होती, एडिटिंग में फिल्म के हर पहलू को ध्यान में रखा जाता है। हमारी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई डायरेक्टर हैं, जो अपनी ज्यादातर फिल्मों की एडिटिंग खुद ही करना पसंद करते हैं। और ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हें एडिटिंग की समझ हैं और इन्होंने अपने करियर की शुरुआत भी एडिटिंग से ही की थी। ये कहना बिलकुल गलत नहीं होगा कि एक अच्छा एडिटर एक सुपरहिट डायरेक्टर बन सकता है और इस बात को इनकी कहानी सही भी साबित करती हैं। तो चलिए आपको मिलवाते हैं ऐसे ही सुपरहिट डायरेक्टर्स से और नजर डालते हैं इनके कामयाबी के सफर पर।
Bollywood: अच्छे एडिटर इसलिए बनते हैं सुपरहिट डायरेक्टर, जानिए ऋषिकेश मुखर्जी से जय बसंतू सिंह तक की कामयाबी के राज
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ऋषिकेश मुखर्जी
ऋषिकेश मुखर्जी बॉलीवुड के प्रतिष्ठित लेखक, निर्माता, निर्देशक और एडिटर में से एक थे। उन्होंने बिमल रॉय की प्रोडक्शन कंपनी में एक प्रशिक्षु के रूप में शुरुआत की, जहां उन्होंने दो बीघा जमीन (1953) लिखी और एडिट की। एक बार बिमल रॉय की टीम फिल्म ‘राशोमोन’ देखने गई थी। जब फिल्म देखकर सभी वापस लौटने लगे, तो बिमल दा ने पूछा कि कौन है जो ऐसी बेहतरीन कहानी लिख सकता है? इस पर ऋषि दा बोले, ‘आप मौका तो दीजिए।’ बस यही से बिमल रॉय प्रोडक्शंस की नींव रख गई और ऋषि दा अपना बेहतरीन काम दिखाने में जुट गए। बतौर डायरेक्टर उनकी पहली फिल्म ‘मुसाफिर’ आई, वहीं दूसरी फिल्म ‘अनाड़ी’ ने पांच फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की खास बात ये थी कि अधिकांश की एडिटिंग वह खुद ही किया करते थे। उन्होंने 1956 में 'नौकरी', 1959 में 'मधुमती' और 1972 में 'आनंद' के लिए तीन बार बेस्ट एडिटिंग के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था।
एन. चंद्रा
चंद्रशेखर नार्वेकर जिन्हें एन. चंद्रा के नाम से जाना जाता है, 80 और 90 के दशक के बॉलीवुड के शीर्ष निर्देशकों में से एक हैं। अपनी स्कूली शिक्षा के बाद, एन चंद्रा ने मुंबई के तारदेव में फिल्म केंद्र में एक फिल्म संपादक के रूप में अपना करियर शुरू किया, जहां उनके पिता ने भी काम किया। एन. चंद्रा ने 80 के दशक में अपने करियर की शुरुआत 'बेजुबान', 'वो 7 दिन', 'धर्म और कानून' और 'मोहब्बत' जैसी फिल्मों को एडिट करके की थी। इसके बाद 1986 में वह फिल्म 'अंकुश' के साथ निर्देशक बने, जिसमें नाना पाटेकर, मदन जोशी और निशा सिंह ने अभिनय किया था। तब से, उन्होंने अपनी कई फिल्मों को डायरेक्ट और लिखने के साथ ही उनकी एडिटिंग भी की। इनमें 'प्रतिघाट', 'तेजाब', 'नरसिम्हा', 'बेकाबू' और 'वाईएमआई: ये मेरा इंडिया' जैसी फिल्में शामिल हैं।
राजकुमार हिरानी
राजकुमार हिरानी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के वो डायरेक्टर हैं, जिन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। वह एक ऐसे फिल्म निर्माता हैं, जिसने अभी तक असफलता का स्वाद नहीं चखा है। राजकुमार ने मुंबई में आकर 1200 महीने के वेतन पर एक स्टूडियो में एडिटर के तौर पर काम करना शुरू किया था। पांच महीने बाद वह फ्रीलांसिंग करने लगे और निर्देशक जॉय ऑगस्टीन की 1991 की फिल्म 'जब प्यार किया तो डरना क्या' की एडिटिंग से अपना फिल्मी करियर शुरू किया। एक बार उन्हें विदु विनोद चोपड़ा की फिल्म '1942 ए लव स्टोरी' के प्रोमोज एडिट करने का मौका मिला। इसके बाद 'मिशन कश्मीर' की एडिटिंग के दौरान जब चोपड़ा का एडिटर बीमार हुआ तो उन्होंने राजकुमार को याद किया। चोपड़ा उन्हें अक्सर फिल्म बनाने के लिए कहते थे, ऐसे में उन्होंने छह महीने का ब्रेक लेकर एक कहानी लिखी, जो चोपड़ा को भी पसंद आई और फिर 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' बनी।
डेविड धवन ने अपने करियर में कई फिल्मों का निर्देशन किया, जो हिट साबित हुई। लेकिन शुरुआती दिनों में वह एक एडिटर हुआ करते थे। उन्होंने 1978 में सावन कुमार टाक की 'साजन बिना सुहागन' के साथ एडिटर के रूप में अपना करियर शुरू किया। 1989 में संजय दत्त व गोविंदा अभिनीत फिल्म 'तकतवार' का निर्देशन करने से पहले उन्होंने 'साजन की सहेली', 'प्रेमी', 'सारांश', 'इंसाफ' सहित 20 से अधिक फिल्मों को एडिट किया था। इन फिल्मों को एडिट करने के बाद उन्हें हर शॉट और सीन की समझ अच्छे से हो गए थी। इसके बाद ही वह निर्देशक की कुर्सी पर बैठने के लिए आगे बढ़े थे। डेविड धवन ने अपनी 13 से अधिक फिल्मों को डायरेक्टर करने के साथ उनमें एडिटिंग भी की है। इनमें कुछ हैं 'स्वर्ग', 'आग का गोला', 'शोला और शबनम', 'जोड़ी नंबर 1', 'दुल्हन हम ले जाएंगे' आदि शामिल हैं।

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