परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समय के साथ हर चीज बदलती है। सिनेमा की दुनिया भी इससे अछूती नहीं है। फिल्म मेकिंग से लेकर एक्टिंग, कहानी और किरदार, हर चीज बदली है। साथ ही बदला है सिनेमा देखने का तरीका भी। एक जमाना था, जब सिनेमा देखना एक लग्जरी थी। महिलाओं की पहुंच से तो यह कोसों दूर था, लेकिन पुरुषों के लिए भी यह सुलभ नहीं था। लोगों के पास समय था, लेकिन सिनेमा देखने का चलन तब भी काफी कम था। लोग दूसरों की जुबानी सिनेमा देख लिया करते थे। गांव-देहात में या शहरों में भी आस-पड़ोस का कोई शौकीन व्यक्ति सिनेमा देखकर आता था तो बाकी लोग उसे घेरकर सिर्फ स्टोरी सुना करते। थिएटर जाना काल्पनिक था। मगर, वक्त के साथ मल्टीप्लेक्स ने लोगों को फिल्में देखना सिखाया। और...अब ओटीटी के जमाने में सिनेमा बस एक क्लिक की दूरी पर है। आइए चलते हैं समय के साथ सिनेमा में आए बदलाव के सफर पर...
Changes In Cinema: कैसेट से सीडी और अब ओटीटी का दौर, जानें किस तरह बदल गया सिनेमा देखने का तरीका
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थिएटर मंडली होती थीं जरिया
आज से चार-पांच दशक पहले फिल्में दिखाने के लिए थिएटर मंडलियां आया करती थीं। गांव में किसी चौपाल पर अपना सेटअप लगाकर वह धार्मिक फिल्में या महापुरुषों पर आधारित फिल्में और डॉक्युमेंट्री दिखाती थीं। गांव वालों के बीच इन थिएटर मंडलियों का अलग ही क्रेज होता था। कभी सालभर में या छह महीने में एक बार कोई थिएटर मंडली आ जाती थी और लोगों का मनोरंजन हो जाता था। कुछ गिनती के ही लोग बॉलीवुड की मनोरंजक फिल्में देखने हॉल तक जा पाते थे!
पिक्चर हॉल जाने की शुरुआत
गांव से शहरों की ओर लोगों का पलायन शुरू हुआ तो सिनेमा के प्रति आकर्षण और जानकारी बढ़ी। कॉलेज में पढ़ने वाले या नौकरी करने वाले वर्ग ने भी पिक्चर हॉल जाना शुरू किया। अच्छी और पारिवारिक फिल्में हॉल में लगनी शुरू हुईं तो लोगों ने परिवार और रिश्तेदारों के साथ सिनेमाघरों में एंट्री लेनी शुरू की। फिर सिलसिला शुरू हुआ तो लोग अपने शहर घूमने आए रिश्तेदारों को अच्छे रेस्टोरेंट ले जाने, शहर भ्रमण कराने और खरीदारी कराने के अलावा सिनेमा दिखाने भी ले जाने लगे। फिल्में दिखाना रिश्तेदारों की खातिरदारी का एक तरीका भी बन गया। इसी दौर में धीरे-धीरे महिलाओं की एंट्री भी सिनेमाहॉल में होनी शुरू हुई। इस दौर में ब्याही गईं कितनी ही महिलाओं की यादों में यह बात दर्ज होगी कि उन्होंने जिंदगी में पहली पिक्चर अपने पति के साथ देखी!
खूबसूरत था वीसीआर वाला जमाना
वीसीआर (वीडियो कैसेट रिकॉर्डर) का नाम सुनते ही आज भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान और आंखों में चमक उतर आती है। वीसीआर ने लोगों को सिनेमा देखना सिखाया। किसी के जन्मदिन के मौके पर या किसी आयोजन में अक्सर लोग अपने घर पर वीसीआर चलवाते थे। इसका एक दिन का किराया जाया करता था। वीसीआर चलवाने से पहले लोग बाकायदा आपस में इस बात पर सहमित बनाते कि कौन-कौन सी फिल्में देखें? इसके बाद तीन-चार फिल्में मंगवाई जातीं। दिलचस्प बात यह है कि लोग रात भर बैक टू बैक तीन से चार फिल्में देख भी लिया करते थे। शायद वीसीआर का पूरा किराया वसूल करने का भी यह तरीका रहा होगा! कई बार लोग सामूहिक रूप से चंदा डालकर वीसीआर चलवाते थे। ऐसे में वीसीआर को किसी की चौपाल पर लगाया जाता था। चौपाल-चूबतरे पर पुरुषों का जमघट होता था। महिलाएं सिर्फ अपने घर की चहारदीवारी में रहकर घूंघट की ओट से ही सिनेमा देखने की कोशिश किया करती थीं।
वीसीआर के बाद सीडी प्लेयर का जमाना आया। यह बहुत पुरानी नहीं सिर्फ दो दशक पुरानी बात है। शुरुआत में तो लोग वीसीआर की तरह सीडी प्लेयर भी किराए पर मंगवाते थे। लेकिन, फिर बाजार में इनका चलन यूं बढ़ा कि कीमत काफी सस्ती हो गईं। सिनेमा के शौकीन एक आम इंसान के लिए सीडी प्लेयर खरीदना मुश्किल नहीं रह गया था। लिहाजा, लोगों ने सीडी प्लेयर खरीदना शुरु किया और किराए पर सीडी लाकर पसंदीदा फिल्में देखनी शुरू कीं। सीडी के साथ अच्छी बात यह थी कि किसी एक घर में अगर सीडी प्लेयर चल रहा होता तो दूसरे घर के टीवी पर भी वह कैच हो जाता यानी एक घर के सीडी प्लेयर से आस-पड़ोस के दो-तीन घर भी सिनेमा दर्शन कर रहे होते। इसी के साथ डिश कनेक्शन का चलन भी शुरू हो गया था। लोगों के घरों में रंगीन टीवी पहुंच गया था। स्टार गोल्ड से लेकर जी सिनेमा तक तमाम चैनलों ने दर्शकों को अच्छी फिल्में दिखानी शुरू कीं।