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बाइस्कोप: पूरे हुए मुश्किलों से बनी फिल्म ‘बरसात’ के 25 साल, पहली फिल्म में ही बॉबी को लगे इतने झटके

Mon, 05 Oct 2020 05:59 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Mon, 05 Oct 2020 05:59 PM IST
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barsaat this day that year series by pankaj shukla 5 october 1995 bioscope bobby deol twinkle khanna
बरसात फिल्म - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सन 77 में रिलीज हुई निर्माता सुभाष देसाई की मनमोहन देसाई निर्देशित फिल्म ‘धरमवीर’ में पहली बार बॉबी देओल किसी मूवी कैमरे के सामने दिखे। ये किरदार बॉबी ने यूं ही हंसी खेल में कर लिया था। लेकिन जब हीरो बनने का नंबर आया तो बाद में उनकी तगड़ी ट्रेनिंग चली। पहली फिल्म की रिलीज से से पहले ही तमाम उठापटकें हुईं। कभी लगा कि ये फिल्म बनेगी, तो कभी लगा कि वो फिल्म बनेगी, लेकिन बतौर हीरो जो पहली फिल्म बॉबी की रिलीज हुई वह रही ‘बरसात’। फिल्म ‘बरसात’ की रिलीज की तमाम तारीखें आपको इंटरनेट पर पढ़ने को मिलेंगी, लेकिन इसका प्रीमियर हुआ था 5 अक्टूबर 1995 को और बॉबी देओल इसी तारीख को अपने बतौर हीरो करियर की शुरूआत का दिन मानते हैं। इस लिहाज से बॉबी देओल को सिनेमा में आए 25 साल सोमवार को पूरे हो गए। इन 25 साल में बॉबी देओल से कई बार मुलाकातें हुईं, लंबी लंबी बातें हुईं और हर बार बात यही सामने आई कि बॉबी देओल के भीतर अब भी बहुत कुछ ऐसा बतौर अभिनेता बाकी है, जो बाहर आना बाकी है। वह कहते भी हैं कि जब तक जीवन के एंड क्रेडिट्स रोल हों, तब तक वह अभी बहुत कुछ करना चाहते हैं। बॉबी देओल को मैं तब ‘एंग्री यंगब्वॉय’ कहकर बुलाया करता था, बाद में ये उनका निकनेम भी लंबे अरसे तक बना रहा। 1995 में रिलीज हुई फिल्म ‘बरसात’ ही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।


 

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बरसात फिल्म - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

इसलिए शेखर कपूर ने छोड़ी फिल्म
बॉबी देओल बताते हैं, ‘फिल्म ‘बरसात’ के लिए मैंने पहला शॉट तब दिया था जब इसे शेखर कपूर निर्देशित कर रहे थे। मुझे एक विशालकाय सेट की सीढ़ियों से मुस्कुराते हुए नीचे उतरना था। ये बतौर हीरो मेरा पहला शॉट था। बाद में शेखर कपूर को ‘बैंडिट क्वीन’ निर्देशित करने के मौका मिल गया तो उन्होंने ‘बरसात’ छोड़ दी और राजकुमार संतोषी ने ये फिल्म निर्देशित की। फिल्म में जो मेरा पहला शॉट है, वह शूटिंग के आखिरी दिन फिल्माया गया है। और यही वह शॉट है जिसमें मैं अपना पैर तुड़वा बैठा था। पहली ही फिल्म के बाद मुझे लंबा गैप इसीलिए लेना पड़ा। यहां तक कि फिल्म ‘गुप्त’ की शूटिंग के दौरान भी मैं पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया था। मैं नाचते समय भी पैर हिलाने से डरता था और बाद में वही मेरा डांसिंग स्टाइल बना दिया गया। राजकुमार संतोषी के साथ फिल्म करना अलग ही अनुभव हुआ करता था, वह मुझे और टीना (ट्विंकल खन्ना) को खूब प्रशिक्षित करते थे। अपनी फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ के गानों पर खूब नचाते। संतोषी जी कमाल के राइटर डायरेक्टर हैं, उनकी सिखाई हर बात मुझे अब भी याद है।’

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बरसात फिल्म - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

पहली कमाई 10 हजार रुपये
इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री को लेकर काफी नकारात्मकता सोशल मीडिया पर देखी जाती है। लेकिन, जिन दिनों बॉबी देओल फिल्मों में आए थे, लोगों ने न सिर्फ उनका बल्कि उनके आगे-पीछे आए तमाम स्टार पुत्र पुत्रियों का दिल खोलकर स्वागत किया था। बॉबी बताते हैं, ‘हम फिल्मों में आए तो ये नहीं कि बस एक दिन तय किया और अगले दिन फिल्म करने लगे। कम से कम मेरी तो बहुत ज्यादा ट्रेनिंग हुई है। पापा ने मुझसे काफी मेहनत करवाई है मेरी पहली फिल्म से पहले। मैं डांस की ट्रेनिंग लेने जाता था। घुड़सवारी और बाइकिंग की ट्रेनिंग भी खूब हुई है मेरी। बाइक्स चलाने हम लोग जुहू बीच जाया करते थे, वहीं सलमान खान भी खूब आते थे। हमारी दोस्ती भी तभी की है। फिल्म ‘बरसात’ के दिनों की तमाम यादें हैं मेरी।’ बॉबी की याददाश्त वाकई कमाल की है, वह ‘बरसात’ के बारे में तो ढेर सारी बातें करते ही हैं, उन्हें अपनी एक्टिंग की पहली कमाई भी अब तक याद है जो उनके पापा धर्मेंद्र ने उन्हें फिल्म ‘धरमवीर’ में उनके बचपन का रोल करने पर बॉबी को दी थी। बॉबी बताते हैं, ‘मेरे एक्टिंग करियर की मेरी पहली लाइन थी, ‘ये बात है बाबा तो ये लो’ जो मैंने ‘धरमवीर’ के सेट पर बोली थी।’ बॉबी ने उस दिन शूटिंग से लौटते समय धर्मेंद्र से शिकायत की कि एक्टिंग तो मुझसे करवा ली गई लेकिन फीस? धर्मेंद्र ने तब अपने पास से सौ सौ की नोटों की एक गड्डी बॉबी को पकड़ा दी। ये रुपये बॉबी ने जाकर अपनी दादी को दे दिए, जिन्होंने ये पूरी गड्डी अपने पोते पर निछावर करके घर में काम करने वालों में बांट दी।’

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बरसात फिल्म - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

करिश्मा कपूर के साथ शुरू हुई फिल्म
फिल्म ‘बरसात’ रिलीज भले 1995 में हुई हो लेकिन बॉबी देओल को हीरो बनाने का काम धर्मेद्र ने इससे पांच साल पहले 1990 में ही शुरू कर दिया था। ये फिल्म पहले ‘बादल’ के नाम से बननी शुरू हुई थी और तब फिल्म की हीरोइन थीं करिश्मा कपूर। बॉबी और करिश्मा की फोटो एक अंग्रेजी पत्रिका के कवर पर छपी तो इंडस्ट्री में हलचल मच गई। करिश्मा कपूर को उसके बाद ऑफर दर ऑफर आने लगे। करिश्मा और बॉबी देओल ने फिल्म ‘बादल’ की करीब तीन हफ्ते तक शूटिंग भी की और फिर शेखर कपूर ये फिल्म छोड़कर चले गए। करिश्मा की मां बबीता इससे काफी घबरा गईं और उन्होंने तुरत फुरत निर्देशक के मुरली मोहन राव की फिल्म ‘प्रेम कैदी’ में करिश्मा को लॉन्च करने की स्वीकृति दे दी। फिल्म ‘बरसात’ में भी बॉबी देओल का नाम बादल ही है लेकिन फिल्म का नाम जानबूझकर ‘बादल’ नहीं रखा गया ताकि फिल्म पुरानी न लगे। फिल्म का हालांकि एक नाम ‘जान’ भी रखा गया। फिर ये बदलकर ‘मेरी जान’ हुआ, फिर कुछ दिनों के लिए इसका नाम ‘जीत’ भी रहा, फिर किसी ने सुझाया ‘सातवां आसमान’ और धर्मेंद्र ने इसका नाम तय किया ‘सातों जहां’। ये टाइटल तब कमाल अमरोही ने अपने प्रोडक्शन हाउस के नाम रजिस्टर्ड करवा रखा था और उन्होंने धर्मेंद्र से अपनी अदावत के चलते ये टाइटल उन्हें दिया नहीं। इसके अलावा ‘जान’ नाम भी धर्मेंद्र को बहुत पसंद आया था लेकिन ये नाम सुभाष घई के पास रजिस्टर्ड था और उन्होंने भी धर्मेंद्र के बेटे की इस फिल्म के लिए ये नाम देने से मना कर दिया।

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बरसात फिल्म - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

तकनीकी टीम ने दिखाया पूरा दमखम
फिल्म ‘बरसात’ की कहानी बादल और टीना की है। बादल देहाती लड़का है और शहर के कॉलेज में एक दो ‘मुठभेड़ों’ के बाद उसे दौलतमंद सेठ की बेटी टीना से प्यार हो जाता है। सेठ दिनेश ओबेरॉय को ये रिश्ता मंजूर नहीं है। दिनेश की नजर टीना को विरासत में मिली दौलत पर है। वह टीना का सौतेला पिता है। उसका दोस्त अपने बेटे की शादी टीना से करने की योजना बना रहा है। और, यही बेटा एक दिन बादल पर मी टू का आरोप लगा देता है। कॉलेज में बवाल होता है लेकिन टीना गवाही देती है बादल के पक्ष में। फिर कहानी में पुलिस अफसर नेगी की एंट्री होती है, बादल का पिता भैरों गांव से शहर आता है। तमाम साजिशें होती हैं। बादल और टीना शहर से गांव भागते हैं तो नेगी के भेजे गुंडे उनका पीछा करते हैं। बचने बचाने की इन कोशिशों के दौरान ही टीना को अपने सौतेले पिता की असलियत पता चल जाती है। कहानी का असली खेल यहीं से शुरू होता है। बादल को तमाम मुसीबतों का सामना करना होता है। टीना को उसका हर कदम साथ देना होता है। नेगी इनको जिंदा नहीं रहने देना चाहता और भैरों किसी भी कीमत पर ऐसा होने नहीं देना चाहता। तमाम उठापटक के बाद फिल्म सुखांत मोड़ पर आकर खत्म होती है। पहली फिल्म  के हिसाब से फिल्म में बॉबी देओल का अभिनय ट्विंकल के अभिनय से काफी बेहतर रहा। डैनी, मुकेश खन्ना और राज बब्बर जैसे सितारों ने तो अपनी वैसी ही एक्टिंग की जिसके लिए वह मशहूर थे, लेकिन बॉबी देओल ने अपने एक अलग अंदाज से लोगों को खूब प्रभावित किया। फिल्म तकनीकी रूप से बहुत मजबूत फिल्म रही। खासतौर से संतोष सीवन की फोटोग्राफी इसकी जान है।

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