इस बार दिवाली पर गोरखपुर में बनीं गोबर की लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां चीन की मूर्तियों को कड़ी टक्कर देंगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी महिला शाखा सहकार भारती की महिलाएं इन मूर्तियों को तैयार कर रहीं हैं। ये मूर्तियां पूरी तरह से हर्बल होने के कारण पर्यावरण के लिहाज से भी काफी बेहतर होंगी। सहकार भारती ने गाय के गोबर के बने उपले से गौरी गणेश की मूर्तियों का निर्माण शुरू किया है। इन मूर्तियों को बनाने के लिए गाय के गोबर से बने उपलों को सबसे पहले ग्राइंडर में पीस कर पाउडर बना लिया जाता है। फिर इसे बारीक छलनी से छान लिया जाता है। इसके बाद इसे ग्वार गम के साथ मिक्स किया जाता है। मैदा, लकड़ी, मोम, समेत कुछ औषधियों को मिलाकर ग्वार गम तैयार किया जाता है।
चीन निर्मित मूर्तियों को टक्कर देंगी गोबर की बनी मूर्तियां, गोरखपुर की महिलाओं ने शुरू किया इसका निर्माण
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक किलो उपले के पाउडर में 100 ग्राम ग्वार गम मिलाकर गूंथ लिया जाता है। इसके बाद इस क्ले को सांचे में डालकर मूर्तियां तैयार कर ली जाती हैं। ग्वार गम की वजह से मूर्तियां काफी मजबूत होती हैं। गिरने पर टूटती भी नहीं हैं। लंबे अरसे तक पानी में रहने के बाद ये पूरी तरह से घुल जाती हैं। सहकार भारती की प्रदेश महिला प्रमुख मीनाक्षी राय ने बताया कि इन मूर्तियों का निर्माण शुरू हो गया है। अभी 40 महिलाओं को इसके लिए प्रशिक्षित किया गया है। आरएसएस की स्वावलंबन महिला की अध्यक्ष विनीता पांडेय ने इन महिलाओं को प्रशिक्षण दिया है। ये सभी महिलाएं कांशीराम आवास कॉलोनी की हैं।
धूप नहीं, इन मूर्तियों को हवा से सुखाते हैं
मीनाक्षी राय ने बताया कि इन मूर्तियों को धूप में नहीं, बल्कि हवा में सुखाते हैं। धूप लगने से इसमें दरारें आ जाती हैं। हवा में पूरी तरह से सूख जाने के बाद इन्हें प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है।
पर्यावरण को नहीं करेंगी प्रदूषित, खाद के रूप में भी हो सकेंगी इस्तेमाल
दिवाली के दौरान सामान्य तौर पर गौरी गणेश की मूर्तियां, दीपक, स्वास्तिक आदि मिट्टी या चीनी मिट्टी के बनाए जाते हैं। मिट्टी की मूर्तियों को बनाने के बाद उन पर केमिकल पेंटिंग की जाती हैं। फिर अगली दिवाली के बाद इन मूर्तियों को नदी, तालाब या पोखर में विसर्जित करने की मान्यता है। ऐसे में केमिकल रंग से रंगी हुई मूर्तियों की वजह से सिर्फ नदियां या तालाब ही प्रदूषित नहीं होते, बल्कि कालांतर में भूगर्भ जल प्रदूषित होता है। लेकिन, गोबर की मूर्तियां पानी को प्रदूषित नहीं करेंगी। पानी में डालने पर यह पूरी तरह से घुल जाएंगी। अगर इनको जल में प्रवाहित नहीं करना चाहते हैं तो इन्हें गमले में रख दिए जाने पर कुछ दिन में यह पानी से घुल कर खाद के रूप में बन जाएंगी।
गो पालन को बढ़ावा देना ध्येय
मीनाक्षी राय ने बताया कि सहकार भारती द्वारा गोबर से मूर्तियों के निर्माण के पीछे गो पालन को बढ़ावा देना मुख्य ध्येय है। ऐसे में इन मूर्तियों के निर्माण में सिर्फ गाय के गोबर से बने उपले का इस्तेमाल किया जाता है। अभी हाल में तारामंडल इलाके में एक डॉक्टर के अस्पताल परिसर में प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया है, क्योंकि वहां गो पालन भी किया जाता है।
पिछले कई वर्षों से दिवाली के दौरान गोरखपुर के बाजारों में चीन निर्मित लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों का बोलबाला रहा है। साथ ही टेराकोटा शिल्पकारों की बनाई मूर्तियों ने बाजार में बेहतर स्थान बनाया है। लेकिन, इस बार एलएसी पर चीन से तनातनी के बाद देश में माहौल पूरी तरह से बदला हुआ है। चीन की मूर्तियों की आयात की संभावना थोड़ी कम है। ऐसे में गोरखपुर के बाजार में गोबर से बनी गौरी गणेश की मूर्तियां भी काफी बेहतर ढंग से अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी। टेराकोटा शिल्पकार लक्ष्मी प्रजापति का कहना है कि दिवाली के दौरान गोरखपुर में गौरी-गणेश की मूर्तियों के अलावा मिट्टी से बने दीये आदि का करीब 30 करोड़ रुपये का बाजार है।
उद्योग उपायुक्त आरके शर्मा ने बताया कि मैंने उन मूर्तियों को देखा है। गुणवत्ता के मामले में मूर्तियां काफी बेहतर हैं। मैंने संस्था की पदाधिकारियों से मूर्ति बनाने में कुछ और महिलाओं को जोड़ने का निवेदन किया है। साथ ही उन्हें आश्वस्त किया है कि उनकी कला को प्रदेश सरकार की स्वरोजगार संबंधी किसी योजना में शामिल किया जाएगा।