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बलिया की बाढ़: 50 साल में 71 गांवों का नदी ने भूगोल बदला और वे इतिहास बन गए, दो लाख लोग उजड़े
अमर उजाला नेटवर्क, बलिया।
Published by: Pragati Chand
Updated Thu, 06 Aug 2026 03:04 PM IST
सार
Ballia News: बलिया जिले में गंगा की लगातार बदलती धारा ने तटवर्ती इलाके की तस्वीर बदल दी है। पिछले पांच दशकों में गायघाट से लेकर दूबे छपरा तक लगभग 12 किमी में बसे 71 गांव अब नदी के भीतर हैं।
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दूबेछपरा रिंगबंधा
- फोटो : अमर उजाला
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बलिया से होकर बहने वाली गंगा और सरयू नदी दशकों से उसके किनारे बसे इलाकों में कटान कर रही हैं। हर साल कई गांव नदी में समा जाते हैं। बाढ़ और कटान को रोकने और उससे बचने के लिए पिछले कई वर्षों में कितने अरब रुपये खर्च हुए हैं, उसका हिसाब तक नहीं। बावजूद इसके विकल्प सिर्फ विस्थापन है। पिछले 50 साल में बलिया के 71 गांव हैं जिनका गंगा-सरयू ने ऐसा भूगोल बदला कि वो गांव अब इतिहास बनकर रह गए हैं।
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बलिया की बाढ़
- फोटो : अमर उजाला
गंगा की लगातार बदलती धारा ने तटवर्ती इलाके की तस्वीर बदल दी है। पिछले पांच दशकों में गायघाट से लेकर दूबे छपरा तक लगभग 12 किमी में बसे 71 गांव अब नदी के भीतर हैं। इस विनाश में करीब दो लाख लोग बेघर और विस्थापित हो चुके हैं। हजारों एकड़ खेती की जमीनें, मकान, विद्यालय, मंदिर, बाग-बगीचे और बाजार गंगा में समा गए।
करीब 50 साल पहले गंगा ने बादिलपुर मोड़ से लेकर गायघाट तक के इलाके इलाके में में भीषण तबाही मचाई थी। उस समय ईंट के झांवों के जरिये नदी की धारा मोड़ने का प्रयास किया गया, जिससे कुछ समय के लिए राहत जरूर मिली, लेकिन यह समाधान स्थाई साबित नहीं हुआ।
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बलिया की बाढ़
- फोटो : अमर उजाला
39 करोड़ खर्च, फिर भी नहीं रुकी तबाही
1955 में गीता प्रेस, गोरखपुर की पहल पर बना दूबे छपरा रिंगबंधा 1982, 2003 और 2013 में क्षतिग्रस्त हुआ। 2014-15 में करीब 10 करोड़ रुपये खर्च कर इसकी उंचाई बढ़ाई और चौड़ीकरण किया गया। इसे टेंगरही बिड़ला बंधे से जोड़ा गया। 2016 की बाढ़ में रिंगबंधा फिर बह गया। इसके बाद 2017 में 29 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत हुई। 2018 में कम बाढ़ के बावजूद स्पर और रिंगबंधे का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। 16 सितंबर 2019 को करीब एक किलोमीटर लंबा रिंगबंधा गंगा में समा गया और दर्जनों गांवों के 50 हजार लोग फिर बाढ़ की चपेट में आ गए।
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बलिया की बाढ़
- फोटो : अमर उजाला
1973 में मझौवां-धरमपुरा से शुरू हुई थी तबाही
गायघाट के बाद गंगा ने 1973 में धरमपुरा और मझौवां पर ऐसा हमला किया कि दोनों गांवों का अस्तित्व मिट गया। 1973 से 1985 के बीच लगभग सात हजार आबादी और सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि गंगा में समा गई। बाद में गांव राष्ट्रीय राजमार्ग 31 के उत्तर दिशा में बसाया गया। मझौवां के बाद एनएच-31 को बचाने के लिए मझौवां से पचरुखिया तक 13 स्पर बनाए गए। 1990 से 1995 के बीच पचरुखिया गांव भी कटान की भेंट चढ़ गया। लगभग दो हजार आबादी और 87 एकड़ भूमि नदी में समा गई। आज यह गांव बलिया-बैरिया तटबंध के उत्तर दिशा में बसा है। करीब 130 वर्ष पुराने राजस्व गांव नारायणपुर ने पहली बार कटान झेलने के बाद पचरुखिया के पास नया ठिकाना बनाया था, लेकिन 1995 में गंगा ने गांव का अस्तित्व दूसरी बार समाप्त कर दिया।
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