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हाशिमपुरा नरसंहार: हिरासत में हत्या की सबसे बड़ी वारदात, 31 साल बाद मिला इंसाफ
Thu, 01 Nov 2018 01:36 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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Updated Thu, 01 Nov 2018 01:36 PM IST
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मेरठ में हाशिमपुरा नरसंहार पर दोषियों को सजा मिलने में 31 साल लग गए। पहला फैसला 2015 में 28 साल बाद आया था, जिसमें सुबूतों के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने सभी आरोपी पीएसी के 16 जवानों को बरी कर दिया था। घटना के समय गाजियाबाद के एसएसपी रहे विभूति नारायण राय की उस प्रतिक्रिया पर नजर डालते हैं, जो उन्होंने 2015 में कोर्ट से आरोपियों की रिहाई के बाद दी थी। राय ने कहा था, ‘हाशिमपुरा का नरसंहार स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग (हिरासत में हत्या) की घटना है।
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इसके पहले जहां तक मुझे याद है, कभी इतनी बड़ी संख्या में पुलिस ने अपनी हिरासत में लेकर लोगों को नहीं मारा था। दरअसल भारतीय राज्य का कोई भी जिम्मेदार नहीं चाहता था कि दोषियों को सजा मिले। राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, मीडिया- सभी ने 22 मई, 1987 से ही इस मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की थी। राय ही वह शख्स हैं जिन्होंने पीएसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई थी और 31 वर्षों तक इस पूरे केस के तमाम प्रयासों के साक्षी रहे।
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राय सहज स्वीकार करते हैं कि भारतीय राज्य के विभिन्न अंग दोषियों को बचाने के लिए प्रयास करते रहे। सबसे पहला प्रयास सरकार के स्तर पर हुआ था। कांग्रेस शासित राज्य सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने कुछ ही घंटों में तफ्तीश सीआईडी से कराने के आदेश दे दिए थे। यह विवेचना इकाई पहले दिन से ही दोषियों को बचाने के पक्ष में खड़ी रही।
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सीआईडी की केस डायरियां ऐसे लिखी गईं, जैसे बचाव पक्ष का वकील अपने दस्तावेज बनाता है। कुल 19 आरोपियों में सबसे वरिष्ठ ओहदेदार एक सब-इंस्पेक्टर था, जो बिना वरिष्ठ अधिकारियों की शह, अभयदान और मजबूत आश्वासन के इतने बड़े पैमाने पर लोगों को मारने जैसा कदम नहीं उठा सकता था।
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सीआईडी ने बेमन से छोटे ओहदेदारों के खिलाफ चार्जशीट लगाई और बड़े अफसरों को छोड़ दिया। राय के दृष्टिकोण से इतर यह मामला सिर्फ पुलिस-प्रशासन और जांच एजेंसी का नहीं था। राजनेताओं ने भी इस मामले में आपराधिक चुप्पी अख्तियार की। जिस समय यह कांड हुआ, यूपी और केंद्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें थीं और उसके बाद दोनों जगहों पर सरकारें बदलती रहीं, लेकिन किसी ने भी इस मामले को चुनौती के रूप में नहीं लिया। खास तौर से उत्तर प्रदेश की सरकारों ने तो गंभीर लापरवाहियों से आरोपियों को दोषमुक्त होने में मदद की।
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