मेरठ में धर्मांतरण के शिकार हुए लावड़ के सौरभ गुप्ता की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। 12 साल पहले कोचिंग सेंटर संचालक की बहन ने सौरभ को रिहान बनाकर खतौली की सादमा से दोस्ती कराई। सादमा की मोहब्बत में वह खतौली में भी बस गया। 40-40 दिन की जमात में तीन बार गया और नमाज पढ़ी। मुस्लिम समुदाय के त्योहार मनाए। खतौली के फुलत में मौलाना कलीम ने उसका धर्मांतरण कराया। एटीएस ने सौरभ, सुशील जैन समेत तीन लोगों से इस बारे में जानकारी जुटाई है।
धर्मांतरण मामला: किसी फिल्म से कम नहीं सौरभ गुप्ता की कहानी, सादमा से की थी बात, फिर मोहब्बत और निकाह
बताया गया कि करीब 20-25 दिन पहले हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं ने खतौली में कार्यक्रम रखकर भव्य यज्ञ कराया और दोनों युवकों की वापसी हिंदू धर्म में कराई। सौरभ अब सादमा और अपने दो बच्चों को छोड़कर वापस लावड़ में रह रहा था। उसने एटीएस से धर्मांतरण होने की शिकायत की थी।
12 साल तक यूं जाल में फंसा रहा सौरभ
सौरभ गुप्ता ने बताया कि वह लावड़ में एक कोचिंग सेंटर में पढ़ता था। 2009 में कोचिंग संचालक की बहन ने सादमा का नंबर दिया था। मैंने रिहान नाम बताकर उसको कॉल की। इस पर सादमा ने मुझे धमकाया और कहां कि कॉल करोगे तो शिकायत कर दूंगी। 15 दिन बाद सादमा ने खुद ही मुझे कॉल की। वह बोली थी- मैं जानती हूं कि तुम रिहान नहीं बल्कि सौरभ गुप्ता हो। इस्लाम कबूल कर लो तो मैं दोस्ती कर लूंगी। उसके बाद फोन पर बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। वर्ष 2010 में मुजफ्फरनगर में सादमा से मुलाकात हुई।
सौरभ के मुताबिक, सादमा के साथ एक मुस्लिम युवक था, जो उसे फुलत ले गया। इसकी जानकारी लगने पर परिजन वहां पहुंचे और पांच-छह दिन बाद वापस ले आए। लेकिन वह सादमा के प्रेम में पड़ चुका था। इसी बीच, हाफिज अबरार ने सौरभ से संपर्क किया और उसने फुलत से उसे 40 दिन की जमात पर बाहर भेज दिया। वहां से लौटा तो मौलाना कलीम सिद्दीकी से उसकी मुलाकात हुई। उसने कारोबार कराने की बात कही और पुरकाजी में इसरार के पास भेज दिया। वहां भी कलीम ने आकर इसरार से परचून की दुकान खुलवाने की बात कही। दुकान खोलने से पहले ही सौरभ को फिर से 40 दिन की जमात पर भेज दिया।
बड़ौत में खुलवाई परचून की दुकान
सौरभ ने बताया कि जमात से लौटने के बाद कलीम ने उसे बड़ौत में परचून की दुकान खुलवा दी। दुकान नहीं चली तो फलों का ठेला लगवा दिया। इसी दौरान कलीम ने सादमा से उसका निकाह करा दिया। उसके बाद कुछ दिन आढ़त का भी काम किया। इस दौरान फिर जमात पर भेजा गया। मदरसे में पढ़ाई भी की। नमाज अदा करना भी सिखाया गया। वह अब मुस्लिम समुदाय के रीति रिवाज के तौर तरीकों से वाकिफ हो गया था। बाद में अहसास हुआ और फिर हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं से संपर्क किया। उन्होंने मौलाना कलीम के चंगुल से छुड़ाया।