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बहू बनाकर लाए थे बेटी की तरह किया कन्यादान
अमर उजाला ब्यूरो शाहजहांपुर।
Updated Sun, 21 May 2017 11:56 PM IST
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कन्यादान
- फोटो : अमर उजाला
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बीबीजई हद्दफ के सास-ससुर ने विधवा बहू को दिया नया जीवन
- ट्रेन से गिरकर बेटे की हो गई थी मौत
- बहू को बीएड तक शिक्षा भी दिलाई
बेटी का कन्यादान तो हर पिता करता है लेकिन बीबीजई निवासी रामऔतार ने एक अलग मिसाल कायम की है। ट्रेन से गिरकर बेटे की मौत होने पर ससुर की जगह एक पिता की भूमिका निभाते हुए उन्होंने अपनी पुत्रवधू को न सिर्फ उच्च शिक्षा दिलाई, बल्कि उसका कन्यादान भी किया। उनके इस सराहनीय कार्य में उनकी पत्नी शांति देवी ने भी पूरा सहयोग दिया। दहेज के लिए बहुओं को जलाने वाले समाज में विधवा बहू का कन्यादान कर उन्होंने समाज को आयना दिखाया है।
बीबीजई हद्दफ निवासी पनीर वाले रामऔतार के जीवन की कहानी किसी फिल्मी स्टोरी स्क्रिप्ट से भी कम नहीं है। तीन संतानें पिता रामऔतार के दो बेटे और एक बेटी थी। बड़ा बेटा सुधीर कुमार पशु चिकित्साधिकारी है, जबकि दूसरा बेटा सुनील कुमार थर्मल पॉवर में फिटर था। तीनों संतानों का विवाह करके रामऔतार पत्नी शांति देवी के साथ सुकून की जिंदगी जी रहे थे। छोटे बेटे सुनील का विवाह उन्होंने 20 नवंबर, 2009 को शाहबाद के ककरघटा निवासी राकेश कुमार और सरिता की बेटी पारुल से किया था। दोनों बेटे-बहू सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे थे, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। तीन जुलाई, 2013 को सुनील किसी काम से दिल्ली जा रहे थे, तभी वह गजरौला में ट्रेन से गिर गए और उनकी मौत की खबर घर पहुंची।
जवान बेटे की मौत ने परिवार को झकझोर कर रख दिया, लेकिन रामऔतार ने हिम्मत से काम लिया और परिवार को सहारा दिया। उन्होंने इंटर पास बहू पारुल को उसके घर यानी मायके भेजने के बजाय उसे उच्चशिक्षा दिलानी शुरू की। तब वह तिलहर में रहते थे। रामऔतार और शांति देवी ने उसे बीएससी और उसके बाद बीएड कराया, ताकि उसका जीवन संवर सके। फिर उन्होंने सोचा कि उनका बेटा तो चला गया, बहू अपना जीवन कैसे काटेगी। यह सोचकर उन्होंने शहर के मोहल्ला बृज विहार कॉलोनी निवासी विद्याराम के बेटे आशुतोष राठौर से उसका रिश्ता पक्का कर दिया। आशुतोष दिल्ली में काम करते हैं। आर्य समाज मंदिर से 16 जनवरी, 2017 को दोनों का विवाह कर दिया गया।
खास बात यह भी है कि अपने बेटे सुनील की शादी में उन्होंने बहू के लिए जो जेवर बनवाए थे वे भी पारुल से नहीं लिए। बाकायदा बहू का कन्यादान किया और फिर जिस लड़की को वह बहू बनाकर बड़े अरमानों से ब्याह कर घर लाए थे, उसे बेटी की तरह उसी शान-ओ-शौकत से विदा कर दिया। आज पारुल अपने मायके जाने के बजाय रामऔतार और शांति देवी के घर अर्थात अपने उस मायके में आती है, जो कभी उसकी ससुराल थी।
पारुल कहती है कि जीवन के कुछ पहलू ऐसे होते हैं, जिन्हें समझा नहीं जा सकता। जिस घर में बहू बनकर आई और नया जीवन शुरू किया, वहीं से फिर विदा होना पड़ा। कभी सोचा नहीं था कि जीवन में ऐसा मोड़ भी आएगा। मेरे लिए तो मम्मी-पापा (सास-ससुर) ही भगवान हैं, जिन्होंने इतना सोचा। पति की मौत के बाद समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा, लेकिन ससुराल में सास-ससुर के प्यार और सम्मान ने सब कुछ भुला दिया। पढ़ाया-लिखाया और फिर से एक नया जीवन दिया। मेरे तो असली माता-पिता तो यही हैं।
इस बातचीत में शांति देवी के आंसू नहीं रुक रहे थे। उन्होंने सास की नई भूमिका लिखी है और साबित किया है कि रिश्तों को कैसे निभाया जाए। रुंधे गले से बोलीं, उन्होंने जिस दिन बेटा खोया, उसी दिन तय कर लिया था कि बहू को इस योग्य बना देंगी कि कोई उंगली न उठा सके। बेटे की शादी करके जब पारुल को बहू के रूप में घर लाईं तो सोचा था कि बुढ़ापा अच्छा कटेगा, इतनी संस्कारी बहू आखिर हर किसी को नहीं मिल सकती। तय किया कि हम लोग तो अपना जीवन जी चुके, लेकिन 20-22 साल की बहू जीवन कैसे काटेगी, इसलिए पहले उसे पढ़ाना जरूरी समझा। मोहल्ले के लोग देखते थे और बातें करते थे कि देखोे बहू पढ़ने जा रही है। हमने तो एक मां-बाप का फर्ज अदा किया और कलेजे पर पत्थर रखकर बहू को विदा किया।
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- ट्रेन से गिरकर बेटे की हो गई थी मौत
- बहू को बीएड तक शिक्षा भी दिलाई
बेटी का कन्यादान तो हर पिता करता है लेकिन बीबीजई निवासी रामऔतार ने एक अलग मिसाल कायम की है। ट्रेन से गिरकर बेटे की मौत होने पर ससुर की जगह एक पिता की भूमिका निभाते हुए उन्होंने अपनी पुत्रवधू को न सिर्फ उच्च शिक्षा दिलाई, बल्कि उसका कन्यादान भी किया। उनके इस सराहनीय कार्य में उनकी पत्नी शांति देवी ने भी पूरा सहयोग दिया। दहेज के लिए बहुओं को जलाने वाले समाज में विधवा बहू का कन्यादान कर उन्होंने समाज को आयना दिखाया है।
बीबीजई हद्दफ निवासी पनीर वाले रामऔतार के जीवन की कहानी किसी फिल्मी स्टोरी स्क्रिप्ट से भी कम नहीं है। तीन संतानें पिता रामऔतार के दो बेटे और एक बेटी थी। बड़ा बेटा सुधीर कुमार पशु चिकित्साधिकारी है, जबकि दूसरा बेटा सुनील कुमार थर्मल पॉवर में फिटर था। तीनों संतानों का विवाह करके रामऔतार पत्नी शांति देवी के साथ सुकून की जिंदगी जी रहे थे। छोटे बेटे सुनील का विवाह उन्होंने 20 नवंबर, 2009 को शाहबाद के ककरघटा निवासी राकेश कुमार और सरिता की बेटी पारुल से किया था। दोनों बेटे-बहू सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे थे, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। तीन जुलाई, 2013 को सुनील किसी काम से दिल्ली जा रहे थे, तभी वह गजरौला में ट्रेन से गिर गए और उनकी मौत की खबर घर पहुंची।
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जवान बेटे की मौत ने परिवार को झकझोर कर रख दिया, लेकिन रामऔतार ने हिम्मत से काम लिया और परिवार को सहारा दिया। उन्होंने इंटर पास बहू पारुल को उसके घर यानी मायके भेजने के बजाय उसे उच्चशिक्षा दिलानी शुरू की। तब वह तिलहर में रहते थे। रामऔतार और शांति देवी ने उसे बीएससी और उसके बाद बीएड कराया, ताकि उसका जीवन संवर सके। फिर उन्होंने सोचा कि उनका बेटा तो चला गया, बहू अपना जीवन कैसे काटेगी। यह सोचकर उन्होंने शहर के मोहल्ला बृज विहार कॉलोनी निवासी विद्याराम के बेटे आशुतोष राठौर से उसका रिश्ता पक्का कर दिया। आशुतोष दिल्ली में काम करते हैं। आर्य समाज मंदिर से 16 जनवरी, 2017 को दोनों का विवाह कर दिया गया।
खास बात यह भी है कि अपने बेटे सुनील की शादी में उन्होंने बहू के लिए जो जेवर बनवाए थे वे भी पारुल से नहीं लिए। बाकायदा बहू का कन्यादान किया और फिर जिस लड़की को वह बहू बनाकर बड़े अरमानों से ब्याह कर घर लाए थे, उसे बेटी की तरह उसी शान-ओ-शौकत से विदा कर दिया। आज पारुल अपने मायके जाने के बजाय रामऔतार और शांति देवी के घर अर्थात अपने उस मायके में आती है, जो कभी उसकी ससुराल थी।
पारुल कहती है कि जीवन के कुछ पहलू ऐसे होते हैं, जिन्हें समझा नहीं जा सकता। जिस घर में बहू बनकर आई और नया जीवन शुरू किया, वहीं से फिर विदा होना पड़ा। कभी सोचा नहीं था कि जीवन में ऐसा मोड़ भी आएगा। मेरे लिए तो मम्मी-पापा (सास-ससुर) ही भगवान हैं, जिन्होंने इतना सोचा। पति की मौत के बाद समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा, लेकिन ससुराल में सास-ससुर के प्यार और सम्मान ने सब कुछ भुला दिया। पढ़ाया-लिखाया और फिर से एक नया जीवन दिया। मेरे तो असली माता-पिता तो यही हैं।
इस बातचीत में शांति देवी के आंसू नहीं रुक रहे थे। उन्होंने सास की नई भूमिका लिखी है और साबित किया है कि रिश्तों को कैसे निभाया जाए। रुंधे गले से बोलीं, उन्होंने जिस दिन बेटा खोया, उसी दिन तय कर लिया था कि बहू को इस योग्य बना देंगी कि कोई उंगली न उठा सके। बेटे की शादी करके जब पारुल को बहू के रूप में घर लाईं तो सोचा था कि बुढ़ापा अच्छा कटेगा, इतनी संस्कारी बहू आखिर हर किसी को नहीं मिल सकती। तय किया कि हम लोग तो अपना जीवन जी चुके, लेकिन 20-22 साल की बहू जीवन कैसे काटेगी, इसलिए पहले उसे पढ़ाना जरूरी समझा। मोहल्ले के लोग देखते थे और बातें करते थे कि देखोे बहू पढ़ने जा रही है। हमने तो एक मां-बाप का फर्ज अदा किया और कलेजे पर पत्थर रखकर बहू को विदा किया।