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UP: सईद शाह बाबा की मजार हुई स्थानांतरित, 390 साल पुरानी इतिहास; गुजरात से आए थे रुस्तम सईद शाह और उनके गुरु
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Wed, 17 Jun 2026 12:09 PM IST
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सार
दरगाह के खादिम के अनुसार हजरत रुस्तम सईद शाह और उनके गुरु हजरत शेख नासिर नाजिर (नौगजे) शाह शाहजहां के शासनकाल में गुजरात से आगरा आए थे। करीब 390 साल पुरानी इस विरासत से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार नौगजे शाह सूफी संत थे, जो शाही सेवा के साथ-साथ गरीबों और जरूरतमंदों की मदद के लिए भी प्रसिद्ध थे।
हजरत रुस्तम सईद शाह बाबा की मजार
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
आगरा प्रशासन ने करीब 390 साल पुरानी हजरत रुस्तम सईद शाह बाबा की मजार को जहां स्थानांतरित किया है, वह उनके उस्ताद हजरत शेख नासिर नाजिर (नाैगजे) शाह की है। दरगाह के खादिम का दावा है कि दोनों बादशाह शाहजहां के शासनकाल में गुजरात से आगरा आए थे।
हजरत शेख नासिर नाजिर (नाैगजे) शाह दरगाह के बारे में खादिम प्रदीप कुमार तिवारी दावा करते हैं कि नासिर मोहम्मद इब्ने सैयद हाजी को शेख नासिर नाजिर के नाम से जाना जाता था। वह इस्लामी न्यायशास्त्र की एक शाखा को मानने वाले थे। वह सैनिक वेशभूषा के पीछे छिपे हुए आध्यात्मिक महापुरुष (सूफी संत) थे। वह काफी समय तक अहमदाबाद, गुजरात में रहे। हजरत शेख नासिर नाजिर के अनोखे और अद्भुत चमत्कारों का वर्णन इतिहास की पुस्तकों में मिलता है।
प्रदीप कुमार के मुताबिक, हजरत शेख नासिर नाजिर (नाैगजे) शाह ने बादशाह शाहजहां से मुलाकात की थी। शाहजहां और उनके बेटों (शहजादों) के कहने पर शाही सेवा और शाहजहां के महल में नौकरी स्वीकार की थी। वह हमेशा सैनिक वेशभूषा में हथियारों से लैस और मुस्तैद रहते थे। नौकरी से मिलने वाले वेतन (पैसे) को अपने निजी खर्च में नहीं लाते थे, बल्कि उसे गरीबों, अनाथों और लाचारों में दान (खैरात) कर दिया करते थे।
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नौकरी के समय के बाद जंगलों से घास-फूस और सूखी लकड़ी लाकर बाजार में बेचते थे। उससे जो पैसा मिलता था उससे ही अपना खर्च चलाते थे। अक्सर उनके भोजन में केवल घास और पत्ते ही होते थे। सन 1647 में उनका इंतकाल हो गया। उनकी मजार कभी डायमंड रोड या ठंडी सड़क के नाम से जानी जाने वाली वर्तमान में महात्मा गांधी मार्ग पर गोकुलपुरा मोड़ और आगरा कॉलेज के सामने है।
हजरत शेख नासिर नाजिर (नाैगजे) शाह दरगाह के बारे में खादिम प्रदीप कुमार तिवारी दावा करते हैं कि नासिर मोहम्मद इब्ने सैयद हाजी को शेख नासिर नाजिर के नाम से जाना जाता था। वह इस्लामी न्यायशास्त्र की एक शाखा को मानने वाले थे। वह सैनिक वेशभूषा के पीछे छिपे हुए आध्यात्मिक महापुरुष (सूफी संत) थे। वह काफी समय तक अहमदाबाद, गुजरात में रहे। हजरत शेख नासिर नाजिर के अनोखे और अद्भुत चमत्कारों का वर्णन इतिहास की पुस्तकों में मिलता है।
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प्रदीप कुमार के मुताबिक, हजरत शेख नासिर नाजिर (नाैगजे) शाह ने बादशाह शाहजहां से मुलाकात की थी। शाहजहां और उनके बेटों (शहजादों) के कहने पर शाही सेवा और शाहजहां के महल में नौकरी स्वीकार की थी। वह हमेशा सैनिक वेशभूषा में हथियारों से लैस और मुस्तैद रहते थे। नौकरी से मिलने वाले वेतन (पैसे) को अपने निजी खर्च में नहीं लाते थे, बल्कि उसे गरीबों, अनाथों और लाचारों में दान (खैरात) कर दिया करते थे।
नौकरी के समय के बाद जंगलों से घास-फूस और सूखी लकड़ी लाकर बाजार में बेचते थे। उससे जो पैसा मिलता था उससे ही अपना खर्च चलाते थे। अक्सर उनके भोजन में केवल घास और पत्ते ही होते थे। सन 1647 में उनका इंतकाल हो गया। उनकी मजार कभी डायमंड रोड या ठंडी सड़क के नाम से जानी जाने वाली वर्तमान में महात्मा गांधी मार्ग पर गोकुलपुरा मोड़ और आगरा कॉलेज के सामने है।