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एएमयू: किचन से निकला विरोध का नया मेन्यू, एक कचौड़ी, दो समोसा... इस वीसी का क्या भरोसा

Fri, 02 Oct 2026 03:00 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो मो. तौहिद आलम, अमर उजाला, अलीगढ़
मो. तौहिद आलम, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: अलीगढ़ ब्यूरो Updated Fri, 02 Oct 2026 03:00 AM IST
सार

लंबे भाषणों और पारंपरिक नारों के साथ अब मीम, तुकबंदी, व्यंग्य और रोजमर्रा के खान-पान से जुड़े शब्द भी विरोध का हिस्सा बन रहे हैं। इन नारों का मकसद सिर्फ ध्यान खींचना नहीं, बल्कि महिला सुरक्षा, स्वतंत्रता, बराबरी और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले खुद लेने के अधिकार की बात को ज्यादा सहज और यादगार तरीके से सामने रखना है।

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A new menu of protest emerges from the kitchen
एक कचौड़ी दो समौसा, इस वीसी का क्या भरोसा स्लोगन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक कचौड़ी, दो समोसा... इस वीसी का क्या भरोसा। एक जीरा, दो अजवाइन... मर्द जात दो रिजाइन। आलू लो, पूरी लो... इन मर्दों से दूरी लो। ये किसी रसोई का मेन्यू नहीं बल्कि जेन-जी युवतियों के विरोध की आवाज है। जिस किचन तक महिलाओं को सीमित किए जाने की बातें लंबे समय तक होती रहीं, उसी किचन के सामान और रोजमर्रा की भाषा को अब लड़कियां सड़क पर विरोध का हथियार बना रही हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर, पंजाब के लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) से लेकर एएमयू तक छात्राओं के प्रदर्शनों में विरोध के तरीके और भाषा में यह बदलाव दिखाई दे रहा है।

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लंबे भाषणों और पारंपरिक नारों के साथ अब मीम, तुकबंदी, व्यंग्य और रोजमर्रा के खान-पान से जुड़े शब्द भी विरोध का हिस्सा बन रहे हैं। इन नारों का मकसद सिर्फ ध्यान खींचना नहीं, बल्कि महिला सुरक्षा, स्वतंत्रता, बराबरी और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले खुद लेने के अधिकार की बात को ज्यादा सहज और यादगार तरीके से सामने रखना है। एएमयू की बीए ऑनर्स की छात्रा सुमैया और इब्रा नूर कहती हैं कि महिलाओं पर लंबे समय से यह ठप्पा लगाया जाता रहा है कि उनकी दुनिया किचन तक सीमित है। अब उसी किचन की रेसिपी और रोजमर्रा की चीजें विरोध की आवाज बनकर सड़क पर उतर रही हैं।

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महिलाओं की आवाज को अक्सर घर और निजी क्षेत्र तक सीमित माना जाता था, लेकिन जब महिलाएं सड़क, विश्वविद्यालय, सार्वजनिक स्थानों और सोशल मीडिया पर आकर सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता के मुद्दों पर अपनी बात रखती हैं तो वे पब्लिक स्फीयर में अपनी भागीदारी बढ़ा रही होती हैं।- प्रो. मोहम्मद अकरम, चेयरमैन, समाजशास्त्र विभाग, एएमयू

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A new menu of protest emerges from the kitchen
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रदर्शन करतीं छात्राएं - फोटो : अमर उजाला

पुरुषों पर नहीं, सोच पर सवाल
छात्रा महवीश कहती हैं कि इन नारों का मकसद सभी पुरुषों को निशाना बनाना नहीं है। सभी पुरुष एक जैसे नहीं हैं, लेकिन कुछ के व्यवहार की वजह से पूरे पुरुष समाज पर सवाल उठते हैं। पुरुषों को यह समझना होगा कि महिलाओं को भी अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है। संविधान महिलाओं को समानता और स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

सार्वजनिक क्षेत्र में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी
एएमयू समाजशास्त्र विभाग के चेयरमैन प्रो. मोहम्मद अकरम कहते हैं कि लोकतांत्रिक समाज में सिविल सोसाइटी के विकास के साथ पब्लिक स्फीयर भी लगातार बदलता है। भारत के शहरी सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तीकरण से उनकी भागीदारी बढ़ी है, जिसका असर रोजमर्रा के नैरेटिव और विरोध की भाषा में भी दिखाई दे रहा है।

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