Ramsar Site Shekha Jheel: चीन-साइबेरिया और मास्को से आते-जाते हैं परिंदे, ये और है खास यहां
यह झील बेहद प्राचीन है, जहां कछुओं की तीन दुर्लभ प्रजातियां भी रहती हैं। इसमें क्रमश: काला तालाब कछुआ (जियोक्लेमिस हैमिल्टन), भारतीय फ्लैप-शेल्ड कछुआ (लिसेमिस पंक्टाटा) और गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ (निल्सोनिया गैंगेटिका) शामिल है।
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बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सहयोग से शुरू हुई एक परियोजना में अलीगढ़ की शेखा झील में एक बार-हेडेड गूंज को सेटेलाइट टेलिमेट्री एंटीना लगाकर ट्रैक किया गया। यह पक्षी उड़ान भरते हुए पूर्वी चीन तक पहुंचा। इसके अलावा साइबेरिया से मास्को रिंग लगे कई पक्षी भी यहां देखे गए। जिससे यह प्रमाणित हुआ कि शेखा झील अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण ठहराव स्थल है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग भारत सरकार द्वारा प्रायोजित “अलीगढ़ के कृषि के महत्वपूर्ण पक्षी” परियोजना के दौरान वर्ष 1988 से 1990 के बीच इस झील में एक पायलट बर्ड-बैंडिंग अध्ययन (प्रवासी पक्षियों की आदतों, प्रवास के पैटर्न और उनके स्वास्थ्य का पता लगाना) किया गया था। इसमें भरतपुर में पहले से रिंग किए गए प्रवासी पक्षियों की यहां पुनः प्राप्ति हुई। यहां पर चीन, श्रीलंका, रूस, भूटान व पोलेंड से भी हजारों परिंदे आते-जाते हैं। अन्य कई देशों से 20 हजार से अधिक मेहमान परिंदे हर साल आते हैं। यह परिंदे लगभग चार हजार से 10 हजार किमी तक का सफर तय करते हैं। इनके अलावा 249 प्रजातियों के स्वदेशी पक्षी भी हैं, जिनमें से 62 आर्द्रभूमि पर निर्भर हैं। यह आंशिक रूप से मानव निर्मित आर्द्रभूमि परिसर (सूची में साइट संख्या 2594) है। बर्ड लाइफ इंटरनेशनल ने झील को एक महत्वपूर्ण पक्षी और जैव विविधता क्षेत्र आईबीए ( इंटरनेशनल बर्ड एंड बायोडायवर्सिटी एरिया) के रूप में नामित किया है।
रामसर साइट घोषित होने के बाद शेखा झील को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल गई है। अब यहां पर परिंदों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर और गंभीरता के साथ काम होगा। पर्यटकों की सुविधाओं को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा।-शिवम कुमार, प्रभागीय निदेशक, सामाजिक वानिकी प्रभाग अलीगढ़।
यह अलीगढ़ के लिए यकीनन बहुत बड़ी सौगात है। शेखा झील रामसर साइट घोषित हो गई है। अब यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाएगी। यहां पर आने वाले परिंदों को और बेहतर प्रवास की सुविधाएं मिल सकेंगी। इससे आसपास का पर्यावरण भी बेहतर होगा।-प्रो.अफीफुल्लाह, वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट एएमयू।
ये हैं विदेशी मेहमान
यहां पर ग्रेलक ग्रूज (हंस), बार हेडेड गूज (राजहंस), ब्रह्मणी सैल डक (चकवा- चकवी), रेड क्रस्टेड पोचार्ड, टफ टफ पोचार्ड, मलार्ड, मलार्ड टील, कांमन टील, मार्बल्ड टील, पेन्टिल, सौबलर, रेड पोचार्ड, टफ टफ पोचार्ड, कांमन पोचार्ड, लाल सर, कांमन कूट, पेलीकन, कार्मोस्ट सैलडक, व्हाइट पेलीकन, पेंटेड स्टार्क, ब्लैक हेडेड गल, गैडबाल, स्पून बिल डक, गार्गिनी समेत डेढ सौ से अधिक प्रजातियों के पक्षी यहां आते हैं। फिलहाल लगभग पंद्रह से बीस प्रकार की प्रजातियों के परिंदे यहां मौजूद हैं।
ये हैं स्थानीय परिंदे
भारतीय नदी टर्न (स्टर्ना ऑरेंटिया) और सारस क्रेन (ग्रस एंटीगोन), पुल पुल मूरहेन, पनकौआ, जलकौआ, ब्लैक आइविश, व्हाइट आईविश, बड़ा बगुला, स्पॉट बिल, ओपन बिल, जल मुर्गा, डार्टर, ग्रे हीरोन, पेटेंड स्ट्रोक, ग्रेट कोरमोरेंट, पर्पल हीरोन, कॉम्ब डक, व्हाइट आईबिज, ब्लैक हैडेड आईबिज, ओपन बिल स्ट्रोक, स्पॉट बिल्ड डक, ब्लैक नेक्ड स्ट्रोक, व्हाइट ब्रेस्टेड वाटर हेन, कॉमन मूरहेन, लिटिल कोरमोरेंट, व्लाइट आईबिज।
तीन दुर्लभ प्रजातियों के कछुओं का भी घर
यह झील बेहद प्राचीन है, जहां कछुओं की तीन दुर्लभ प्रजातियां भी रहती हैं। इसमें क्रमश: काला तालाब कछुआ (जियोक्लेमिस हैमिल्टन), भारतीय फ्लैप-शेल्ड कछुआ (लिसेमिस पंक्टाटा) और गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ (निल्सोनिया गैंगेटिका) शामिल है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि परिंदों के साथ ही इन कछुओं का संरक्षण भी बेहद जरूरी है। झील के आसपास पर्णपाती जंगल हैं। खुले जल निकाय और जंगल के बीच संक्रमण ने इस पारिस्थितिक क्षेत्र का निर्माण किया है, जिससे पौधों और जानवरों की प्रजातियों की एक विशाल विविधता सामने आई है।

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