शहर से सटे गांव की बदहाल जिंदगी: केशोपुर जोफरी में हालात नारकीय, पढ़ाई-नौकरी का बड़ा संकट, विकास है कोसों दूर
इस गांव का एक रास्ता डामर रोड है, जबकि दूसरा नाले के पास वाला रास्ता कच्चा और ऊबड़खाबड़ है। दशकों बाद भी इसको बनाया नहीं गया है। इसी कच्चे रास्ते पर गुनु, मनीषा, आदित्य और सागर का घर है। यह बच्चे बताते हैं कि बरसात में पानी भरने के बाद उन्हें घर में ही बंद होना पड़ता है।
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अलीगढ़ में खेरेश्वर चौराहे के पास शहर की सीमा से सटे केशोपुर जोफरी गांव में हालात बेहद नारकीय हैं। लोग गंदे पानी, कीचड़, कूड़ा और गंदगी से जूझ रहे हैं। 40 से 50 मीटर तक लंबी कई गलियों में बेतहाशा कीचड़ है। ग्रामीण बताते हैं कि पूर्व के चार प्रधानों ने अपने घरों का रास्ता ऊंचा कराया तो बीच गांव में ही गंदा पानी भरना शुरू हो गया। यह पानी गांव की पोखरों तक नहीं पहुंच पा रहा है और तब से कीचड़ ही कीचड़ है।
सफाई कर्मी मुश्किल से आता है और खानापूर्ति कर चला जाता है। कीचड़ साफ नहीं होता है। खाली प्लॉटों पर कूड़ा भरा है। शाम होते ही मच्छर लोगों का खून चूसने लगते हैं। लगभग 3200 की आबादी वाले इस गांव में एक छोटा प्राथमिक अस्पताल तक नहीं है, इसलिए लोगों को मामूली बुखार के उपचार के लिए लगभग छह किमी दूर नादा पुल तक जाकर निजी डॉक्टरों से उपचार कराना पड़ता है।
इस गांव का एक रास्ता डामर रोड है, जबकि दूसरा नाले के पास वाला रास्ता कच्चा और ऊबड़खाबड़ है। दशकों बाद भी इसको बनाया नहीं गया है। इसी कच्चे रास्ते पर गुनु, मनीषा, आदित्य और सागर का घर है। यह बच्चे बताते हैं कि बरसात में पानी भरने के बाद उन्हें घर में ही बंद होना पड़ता है।
14 घंटे की बिजली कटौती
ग्रामीण इलाकों में 18 घंटे बिजली देने का नियम लागू है, लेकिन यहां केवल 10 घंटे की आपूर्ति मिलती है। 14 घंटे तक बिजली गुल रहती है। नलकूपों के लिए तारों में केवल पांच घंटे करंट दौड़ता है, जिससे खेतों में सिंचाई करना भी सिरदर्द हो चुका है।
400 लोग बाहर खा रहे धक्के
शहर से सटे इस गांव के बेरोजगारी बड़ी समस्या बन चुकी है। यहां के 400 लोग वर्तमान में दिल्ली, ग्रेटर नोएडा, नोएडा, गुरुग्राम सहित एनसीआर के अलग-अलग शहरों में नौकरी या कोई न कोई काम करते हैं। यहां उन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता है। अजय सिंह तोमर कहते हैं कि वह डिफेंस कॉरिडोर में काम की तलाश में गए, लेकिन सिफारिश के बिना यहां कोई नौकरी नहीं मिलती। बोले-पूर्व में एसपी सिटी मान सिंह ने कुछ लोगों की सिफारिश कर नौकरी लगवा दी थी।
2800 पशु, अस्पताल नहीं
कोई राेजगार नहीं मिलने से परेशान ग्रामीण खेती या पशुपालन पर आश्रित हैं। यहां दो हजार भैंस, 400 गाय, 400 भेंड़ और बकरियां पली हैं। जिनके सहारे घर गृहस्थी चलती है। शहर से सटे होने के कारण दूध हाथों-हाथ बिक जाता है। पशुपालन को डेयरी उद्योग में बदला जा सकता है, लेकिन यहां एक अदद पशु अस्पताल तक नहीं है। पशु पालक बलराम सिंह कहते हैं कि बीमार होने पर पशुओं को चार किमी दूर लोधा के अस्पताल तक ले जाना पड़ता है। अगर गांव में ही किसी पशु चिकित्सक को बुलाएं तो 500 से हजार रुपये तक ठंडे हो जाते हैं।
छह किमी दूर है इंटर कॉलेज
गांव में आठवीं तक का सरकारी स्कूल है, इसके बाद की पढ़ाई के लिए छात्र-छात्राओं को छह किमी दूर नादा पुल की ओर आना पड़ता है। उन्हें जीटी रोड का फोरलेन हाईवे पार करना होता है, जिस पर भारी वाहन तेज रफ्तार से गुजरते हैं। इससे अभिभावक चिंतित रहते हैं। बरसात में विद्यार्थी कॉलेज नहीं जा पाते, उनकी पढ़ाई ढंग से नहीं हो पाती है। भावना, भूमि, वर्षा, कीर्ति, दिव्यांशी, गुंजन, डॉली, रमा, शिवानी और संगीता उच्च शिक्षित होकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं, लेकिन इंटर और डिग्री कॉलेज तक पहुंचना उनके लिए बड़ी चुनौती है। हीतेश, दीपांशु और अभी भी इससे जूझ रहे हैं।
श्मशान गृह तक नहीं
दशकों पुराना गांव होने के बाद भी अगर बरसात के समय किसी का निधन हो जाए तो बिना तिरपाल लगाए बिना अंतिम संस्कार तक नहीं हो पाता है। अब तक यहां पर श्मशान गृह तक नहीं बन पाया है। ग्राम पंचायत की कीमती जमीनों पर अवैध कब्जे हो चुके हैं।
थाना बना तो खुल गया ठेका
गांव के पास ही रोरावर थाना बनने के बाद यहां देसी शराब का ठेका खुल गया है। महिलाएं कहतीं हैं कि ठेका खुलने के बाद गांव के लोग शराब में पैसा बर्बाद कर देते हैं। जब तक थाना नहीं बना था, तब तक ठेका यहां से दूर था, इसलिए लोगों को आसानी से शराब नहीं मिल पाती थी। ठेका इस गांव से दूर कर दिया जाए।
पाइपलाइन बिछी, नल सूखे
यहां के घरों तक पाइपलाइन पहुंच चुकी है, लेकिन अब तक टंकी नहीं बन पाई है जिससे ग्रामीणों को हैंडपंप या सबमर्सिबल पंप का सहारा लेना पड़ता है। टंकी कब तक बनेगी, इसका कोई समय तय नहीं है।
इनको मिल रहा है लाभ
लोधा ब्लॉक के डीपीओ ने बताया कि गांव में किसान सम्मान निधि के लाभार्थी 269 हैं। 25 लोगों को दिव्यांग, 73 को विधवा और 31 को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 25 स्वयं सहायता समूह हैं, 275 महिलाएं इनसे जुड़ी हैं। यह महिलाएं पशु पालन सहित अन्य काम करती हैं।
आठ अगस्त को डीएम को लिखित शिकायती पत्र देकर गंदगी और जलभराव से निजात दिलाने की गुहार लगाई गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।-बलराम सिंह तोमर।
शहर के इतना पास होने के बाद भी गांव में कीचड़ और जलभराव है। गलियां टूटी-फूटी हैं। पानी की पाइपलाइन डालने के बाद इनको ठीक नहीं किया गया।-नरेंद्र सिंह।
जब तक बड़े अफसर खुद गांवों का निरीक्षण नहीं करेंगे, तब तक कोई सुधार नहीं होगा। लोधा ब्लॉक वाले कर्मी भी देखने तक नहीं आते हैं।-धर्मपाल सिंह।
मैं इस गांव में रिश्तेदारी में आता-जाता रहता हूं। पहले बहुत अच्छा लगता था, लेकिन अब हालात बहुत खराब हो चुके हैं। गंदगी के कारण बहुत मच्छर हैं।-दिनेश कुमार।
जब भी बच्चे गांव से बाहर कॉलेज जाते हैं तो हाईवे के तेज रफ्तार बड़े वाहनों का डर सताता है। जब तक वे घर नहीं आते चिंता रहती है। गांव में इंटर कॉलेज खोला जाए।-राधा।
गांव में सफाई की बहुत जरूरत है। 18 से 20 घंटे तक बिजली दी जाए और बच्चों के लिए इंटर कॉलेज खोला जाए। बच्चे ठीक से नहीं पढ़ेंगे तो उनका क्या भविष्य होगा।-कुसुम।
गांव में दो पोखर हैं, एक में 80 और दूसरे में 20 फीसदी गंदा पानी पहुंचता है। इन दोनों को साफ कराने और बेहतर बनाने का प्रस्ताव वित्तीय वर्ष 2026-27 की कार्ययोजना में शामिल किया है। सफाई अभियान भी चलाया जाएगा।-संजीव कुमार शर्मा, एडीओ, लोधा ब्लॉक।