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Aligarh News: केवल रामसर टैग मिलने से सुरक्षित नहीं होगी शेखा झील
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शेखाझील में पक्षी। संवाद
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शेखाझील बर्ड सेंक्चुरी को रामसर साइट का दर्जा मिलने के साथ अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल रामसर टैग मिलने से शेखाझील सुरक्षित नहीं हो जाएगी।
इसके लिए लगातार प्रबंधन, निगरानी और संरक्षण उपाय जरूरी होंगे। शेखाझील सिर्फ पक्षियों की झील नहीं, बल्कि शहर के पर्यावरण संतुलन, भूजल संरक्षण और इको-टूरिज्म की बड़ी संभावना भी है। अब नजर इस बात पर है कि रामसर टैग के बाद संरक्षण जमीन पर कितना मजबूत होता है।
दरअसल 40 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली यह मीठे पानी की आर्द्रभूमि अपर गंगेटिक मैदान में स्थित है। यहां 249 पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें 62 जलपक्षी और वेटलैंड पर निर्भर प्रजातियां शामिल हैं। सर्दियों के चरम मौसम में यहां नियमित रूप से 20 हजार से अधिक जलपक्षी पहुंचते हैं।
यह स्थल सारस क्रेन, कॉमन पोचार्ड, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल और संकटग्रस्त मीठे पानी के कछुओं जैसे जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आश्रयस्थल है। हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने अलीगढ़ की शेखाझील को रामसर साइट घोषित किया।
फिर नामांकन का नहीं बचेगा कोई अर्थ
शेखाझील भूजल रिचार्ज, बाढ़ नियंत्रण, पोषक चक्र, कार्बन संरक्षण और स्थानीय जैव विविधता के लिए बेहद अहम है। नई दिल्ली स्थित वन्यजीव जीवविज्ञानी फैयाज खुदसर ने कहा कि शेखाझील गंगा नहर से जुड़े बड़े जल तंत्र का हिस्सा है। यह महत्वपूर्ण मानसूनी वेटलैंड है और इसकी विविधता इसे जलपक्षियों के लिए उत्कृष्ट आवास बनाती है। उन्होंने कहा कि रामसर टैग एक प्रतिबद्धता है। यदि झील की पारिस्थितिकी और जल विज्ञान की स्थिति को बनाए नहीं रखा गया तो सिर्फ नामांकन का कोई अर्थ नहीं रहेगा।
शेखाझील पर कई दबाव
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वन्यजीव विज्ञान विभाग में प्रोफेसर ओरुस इलियास के मुताबिक, शेखाझील पर सबसे बड़ा दबाव यूट्रोफिकेशन के कारण आवास क्षरण, बिना शोधित सीवेज के प्रवाह और अतिक्रमण का है। सबसे गंभीर चिंता आक्रामक जलीय वनस्पतियों, खासकर जलकुंभी के तेजी से फैलाव को लेकर है।
इससे खुले पानी का क्षेत्र घटता है, घुलित ऑक्सीजन कम होती है और जलीय जैव विविधता प्रभावित होती है। इसके अलावा मानव हस्तक्षेप, ठोस कचरा फेंकना और अनियंत्रित पर्यटन भी झील के लिए अतिरिक्त खतरे बन रहे हैं।
केवल टैग पर्याप्त नहीं, काम भी करना पड़ेगा
वेटलैंड इंटरनेशनल साउथ एशिया के निदेशक रितेश कुमार ने कहा कि केवल रामसर टैग मिलने से आर्द्रभूमि सुरक्षित नहीं हो जाएगी। इसके लिए लगातार और प्रभावी प्रबंधन जरूरी है। रामसर टैग अपने आप में यह प्रतिबद्धता है कि आर्द्रभूमि का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।
इसका मतलब है कि स्थल के प्राकृतिक और पारिस्थितिक स्वरूप को बरकरार रखा जाए। केवल नामांकन पर्याप्त नहीं है। इसके अनुरूप ऐसा प्रबंधन लागू करना होगा, जो लंबे समय तक आर्द्रभूमि की पारिस्थितिक और जलवैज्ञानिक स्थितियों को बनाए रखे। इससे जलपक्षियों के आवास सुरक्षित रहेंगे, जल प्रवाह संतुलित रहेगा और आर्द्रभूमि के बहुआयामी लाभ भी बने रहेंगे।
. साल 2009 में जारी एक अध्ययन में पर्यावरण समूह कल्पवृक्ष ने पाया कि शेखा झील न केवल जलपक्षियों का समर्थन करती है, बल्कि सिंघाड़ा की खेती, मछली पकड़ने और पशुपालन जैसी गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय लोगों की आजीविका को भी सहारा देती है।
ये भी हैं बड़े खतरे : शेखाझील के सामने कई चुनौतियां बनी हुई हैं। इनमें जलकुंभी जैसी आक्रामक प्रजातियों का तेजी से फैलाव, बिना शोधित सीवेज और गंदे पानी का प्रवाह, अतिक्रमण और ठोस कचरा फेंकना, अत्यधिक सिंचाई के लिए पानी निकासी, अनियंत्रित पर्यटन और मानवीय हस्तक्षेप, तापमान बढ़ना और अत्यधिक गर्मी प्रमुख चुनौतियां शामिल हैं।
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इसके लिए लगातार प्रबंधन, निगरानी और संरक्षण उपाय जरूरी होंगे। शेखाझील सिर्फ पक्षियों की झील नहीं, बल्कि शहर के पर्यावरण संतुलन, भूजल संरक्षण और इको-टूरिज्म की बड़ी संभावना भी है। अब नजर इस बात पर है कि रामसर टैग के बाद संरक्षण जमीन पर कितना मजबूत होता है।
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दरअसल 40 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली यह मीठे पानी की आर्द्रभूमि अपर गंगेटिक मैदान में स्थित है। यहां 249 पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें 62 जलपक्षी और वेटलैंड पर निर्भर प्रजातियां शामिल हैं। सर्दियों के चरम मौसम में यहां नियमित रूप से 20 हजार से अधिक जलपक्षी पहुंचते हैं।
यह स्थल सारस क्रेन, कॉमन पोचार्ड, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल और संकटग्रस्त मीठे पानी के कछुओं जैसे जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आश्रयस्थल है। हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने अलीगढ़ की शेखाझील को रामसर साइट घोषित किया।
फिर नामांकन का नहीं बचेगा कोई अर्थ
शेखाझील भूजल रिचार्ज, बाढ़ नियंत्रण, पोषक चक्र, कार्बन संरक्षण और स्थानीय जैव विविधता के लिए बेहद अहम है। नई दिल्ली स्थित वन्यजीव जीवविज्ञानी फैयाज खुदसर ने कहा कि शेखाझील गंगा नहर से जुड़े बड़े जल तंत्र का हिस्सा है। यह महत्वपूर्ण मानसूनी वेटलैंड है और इसकी विविधता इसे जलपक्षियों के लिए उत्कृष्ट आवास बनाती है। उन्होंने कहा कि रामसर टैग एक प्रतिबद्धता है। यदि झील की पारिस्थितिकी और जल विज्ञान की स्थिति को बनाए नहीं रखा गया तो सिर्फ नामांकन का कोई अर्थ नहीं रहेगा।
शेखाझील पर कई दबाव
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वन्यजीव विज्ञान विभाग में प्रोफेसर ओरुस इलियास के मुताबिक, शेखाझील पर सबसे बड़ा दबाव यूट्रोफिकेशन के कारण आवास क्षरण, बिना शोधित सीवेज के प्रवाह और अतिक्रमण का है। सबसे गंभीर चिंता आक्रामक जलीय वनस्पतियों, खासकर जलकुंभी के तेजी से फैलाव को लेकर है।
इससे खुले पानी का क्षेत्र घटता है, घुलित ऑक्सीजन कम होती है और जलीय जैव विविधता प्रभावित होती है। इसके अलावा मानव हस्तक्षेप, ठोस कचरा फेंकना और अनियंत्रित पर्यटन भी झील के लिए अतिरिक्त खतरे बन रहे हैं।
केवल टैग पर्याप्त नहीं, काम भी करना पड़ेगा
वेटलैंड इंटरनेशनल साउथ एशिया के निदेशक रितेश कुमार ने कहा कि केवल रामसर टैग मिलने से आर्द्रभूमि सुरक्षित नहीं हो जाएगी। इसके लिए लगातार और प्रभावी प्रबंधन जरूरी है। रामसर टैग अपने आप में यह प्रतिबद्धता है कि आर्द्रभूमि का विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।
इसका मतलब है कि स्थल के प्राकृतिक और पारिस्थितिक स्वरूप को बरकरार रखा जाए। केवल नामांकन पर्याप्त नहीं है। इसके अनुरूप ऐसा प्रबंधन लागू करना होगा, जो लंबे समय तक आर्द्रभूमि की पारिस्थितिक और जलवैज्ञानिक स्थितियों को बनाए रखे। इससे जलपक्षियों के आवास सुरक्षित रहेंगे, जल प्रवाह संतुलित रहेगा और आर्द्रभूमि के बहुआयामी लाभ भी बने रहेंगे।
. साल 2009 में जारी एक अध्ययन में पर्यावरण समूह कल्पवृक्ष ने पाया कि शेखा झील न केवल जलपक्षियों का समर्थन करती है, बल्कि सिंघाड़ा की खेती, मछली पकड़ने और पशुपालन जैसी गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय लोगों की आजीविका को भी सहारा देती है।
ये भी हैं बड़े खतरे : शेखाझील के सामने कई चुनौतियां बनी हुई हैं। इनमें जलकुंभी जैसी आक्रामक प्रजातियों का तेजी से फैलाव, बिना शोधित सीवेज और गंदे पानी का प्रवाह, अतिक्रमण और ठोस कचरा फेंकना, अत्यधिक सिंचाई के लिए पानी निकासी, अनियंत्रित पर्यटन और मानवीय हस्तक्षेप, तापमान बढ़ना और अत्यधिक गर्मी प्रमुख चुनौतियां शामिल हैं।

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