High Court : पत्नी शिक्षित है तो भी पति भरण-पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता, हाईकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का उच्च शिक्षित होना या उसमें कमाने की क्षमता होने के आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का उच्च शिक्षित होना या उसमें कमाने की क्षमता होने के आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि पति का यह कर्तव्य है कि वह पत्नी को उसी सामाजिक और आर्थिक स्तर के अनुरूप जीवन प्रदान करे जैसा उसने वैवाहिक घर में अनुभव किया था। यह आदेश न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की अदालत ने आगरा निवासी कोमल की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका पर दिया है।
याची की शादी अगस्त 2014 को अहमदाबाद में सिख रीति-रिवाजों से हुई थी। शादी के कुछ ही समय बाद पत्नी को ससुराल से निकाल दिया गया। पत्नी ने 2015 में आगरा के पारिवारिक न्यायालय में भरण-पोषण के लिए आवेदन किया था जिस पर लगभग एक दशक बाद 12 जुलाई 2024 को फैसला आया। पारिवारिक न्यायालय ने पति को मार्च 2022 से पत्नी को 15 हजार रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था। याची ने भरण-पोषण राशि को बढ़ाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
पति की ओर से दलील दी गई कि उसकी पत्नी के पास एमबीए की डिग्री है और वह पूर्व में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम कर चुकी है। इसलिए वह अपना खर्च स्वयं उठाने में सक्षम है। पति ने अपनी स्वयं की आय को मात्र 15,000 से 20,000 रुपये प्रति माह बताया था।
पति के दावों में पाई गईं विसंगतियां
हालांकि, हाईकोर्ट ने पति के इन दावों में गंभीर विसंगतियां पाईं। रिकॉर्ड के अनुसार पति अहमदाबाद में जीईसी इंटरनेशनल स्टडी सेंटर नामक एक बड़ा व्यवसाय चलाता है और उसने कनाडा से उच्च शिक्षा प्राप्त की है। अदालत ने पाया कि पति ने आयकर रिटर्न से संबंधित विरोधाभासी जानकारियां दीं और फर्म के टर्नओवर के विवरण छिपाने की कोशिश की।
कोर्ट ने कहा कि केवल पत्नी की पिछली कमाई या उसकी योग्यता के आधार पर भरण-पोषण से इन्कार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि 15,000 रुपये की राशि पति की आर्थिक स्थिति और वर्तमान जीवन स्तर के हिसाब से न्यायसंगत नहीं है। अंततः, अदालत ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनर्निर्धारण के लिए वापस भेज दिया है। पारिवारिक न्यायालय को निर्देश दिया गया है कि वह छह महीने के भीतर भरण-पोषण की नई और उचित राशि तय करे और तब तक पति को पिछले आदेश के अनुसार सभी बकाया राशि का भुगतान करना होगा।
सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान पर तीन महीने के भीतर निर्णय लें अधिकारी : हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले वित्तीय लाभों के भुगतान में हो रही देरी को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को तीन माह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की एकल पीठ ने झांसी की नगर पालिका परिषद से सेवानिवृत्त कर्मचारी अर्चना की याचिका पर दिया है।
याची ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उसे ग्रेच्युटी, पेंशन, अवकाश नकदीकरण और जीपीएफ जैसे बकाया फंड का भुगतान 18 प्रतिशत ब्याज के साथ तत्काल प्रभाव से कराया जाए। याचिका में यह भी मांग की गई थी कि पेंशन के बकाये के साथ-साथ वर्तमान मासिक पेंशन का भुगतान भी समय पर सुनिश्चित किया जाए।
सुनवाई के दौरान नगर पालिका परिषद, झांसी के वकील ने दलील दी कि यदि याची नगर पालिका परिषद, बरुआ सागर के अधिशासी अधिकारी के समक्ष एक नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करता है, तो प्रभावी निस्तारण किया जाएगा। इसपर कोर्ट ने याची को तीन सप्ताह के भीतर अपनी मांगों से संबंधित एक विस्तृत आवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। साथ ही अधिकारी को कानून के दायरे में रहते हुए तीन महीने की अवधि के भीतर शिकायतों का निपटारा करने का निर्देश दिया।