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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court: Appointment based on fraud is void ab initio; the court cannot turn a blind eye.

हाईकोर्ट : फर्जीवाड़े के आधार पर नियुक्ति शुरू से ही शून्य, अदालत अपनी आंखें बंद नहीं कर सकती

Fri, 09 Oct 2026 02:59 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 09 Oct 2026 02:59 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि फर्जीवाड़े के आधार पर नियुक्ति शुरू से ही शून्य मानी जाएगी। इस आधार कर्मचारी पदोन्नति या सेवा विस्तार जैसे कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

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High Court: Appointment based on fraud is void ab initio; the court cannot turn a blind eye.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि फर्जीवाड़े के आधार पर नियुक्ति शुरू से ही शून्य मानी जाएगी। इस आधार कर्मचारी पदोन्नति या सेवा विस्तार जैसे कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। किसी स्पष्ट अवैधता को कायम रखने या बढ़ावा देने के लिए अदालत अपनी आंखें नहीं बंद कर सकती।

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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में फर्जी शासनादेश से निदेशक (प्रकाशन) पद पर पदोन्नत हुए डॉ.पद्माकर मिश्रा की स्पेशल अपील खारिज कर दी। साथ ही उनके सेवा विस्तार पर मुहर लगाने वाले एकल पीठ के आदेश को चुनौती देने वाली विवि की अपील स्वीकार कर ली।
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डॉ.पद्माकर मिश्रा की नियुक्ति 18 सितंबर 1998 को विक्रय अधिकारी के पद पर हुई थी। बाद में उन्होंने 31 दिसंबर 2003 के एक शासनादेश के आधार पर निदेशक (प्रकाशन) पद पर पदोन्नति का दावा किया। इसी आधार पर उन्होंने सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने की मांग की थी।
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इस पर राज्य सरकार की जांच में सामने आया कि वह कथित शासनादेश शासन स्तर से जारी ही नहीं हुआ था। तत्कालीन अनुसचिव प्रेम शंकर ने भी उस पर अपने हस्ताक्षर होने से इन्कार कर दिया। लखनऊ स्थित विधि विज्ञान प्रयोगशाला की जांच में भी हस्ताक्षर कूटरचित पाए गए। इसके बाद शासन ने 17 सितंबर 2019 को कथित शासनादेश निरस्त कर एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए थे।

हालांकि, हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका पर उन्हें 62 वर्ष की आयु तक पद पर बने रहने की अनुमति दे दी थी। इस आदेश को विवि ने खंडपीठ के समक्ष अपील में चुनौती दी, जो स्वीकार कर ली गई। कोर्ट ने कहा कि फर्जी या अस्तित्वहीन दस्तावेज के आधार पर कानूनी अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता। धोखाधड़ी उस पूरे आधार को दूषित कर देती है, जिस पर कोई दावा खड़ा किया गया हो। पदोन्नति का मूल आधार ही फर्जी साबित हो गया है तो उसके आधार पर याची को निदेशक (प्रकाशन) पद पर बने रहने का कोई विधिक अधिकार नहीं बचता।


काम की अवधि का वेतन मिलेगा, वसूली नहीं होगी

कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए स्पष्ट किया कि याची ने निदेशक (प्रकाशन) के रूप में जितनी अवधि वास्तव में काम किया है, उसका वेतन और अन्य भुगतान उसे दिए जाएंगे। इस अवधि में किए गए भुगतानों की कोई वसूली नहीं की जाएगी।

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