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High Court : विवेचना की खामियां चश्मदीदों के बयानों को झुठला नहीं सकती, दोहरे हत्याकांड में उम्रकैद बरकरार
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 27 Feb 2026 01:48 PM IST
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सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन के विवाद को लेकर पंचायत के दौरान बरेली में 42 साल पहले हुए दोहरे हत्याकांड के दो दोषियों को मिली उम्रकैद पर अपनी मुहर लगा दी। कहा कि विवेचना की खामियां या हत्या में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी न होना, चश्मदीदों के ठोस बयानों को झुठला नहीं सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन के विवाद को लेकर पंचायत के दौरान बरेली में 42 साल पहले हुए दोहरे हत्याकांड के दो दोषियों को मिली उम्रकैद पर अपनी मुहर लगा दी। कहा कि विवेचना की खामियां या हत्या में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी न होना, चश्मदीदों के ठोस बयानों को झुठला नहीं सकता।
यह फैसला न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह, न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने दोषी रामचंद्र और बाबू राम की अपील खारिज करते हुए सुनाया है। मामला बरेली के बहेड़ी थाना क्षेत्र के राजपुरा का है। दो जुलाई 1984 की रात जमीन के विवाद को सुलझाने के लिए बुलाई गई पंचायत के दौरान रामचंद्र, बाबू राम ने अपने ही रिश्तेदारों दामोदर और चंद्र पाल पर चाकू-लाठी से हमला कर दिया था। इससे दोनों भाइयों की मौके पर ही मौत हो गई थी।
18 अक्तूबर 1985 को सत्र न्यायालय ने दोनों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके खिलाफ दोनों ने 1985 में ही हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। कोर्ट ने अपील खारिज कर कहा कि 40 साल पहले की घटना को याद करने में मामूली विसंगतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन इससे गवाहों की विश्वसनीयता संदिग्ध नहीं हो जाती। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद को बरकरार रखते हुए जमानत पर जेल से बाहर रह रहे दोनों दोषियों को तीन हफ्ते में समर्पण करने का आदेश दिया है।
कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने फैसले में कहा कि केवल इसलिए कि पुलिस हत्या में प्रयुक्त हथियार (चाकू) बरामद करने में विफल रही, दोषियों को बरी नहीं किया जा सकता। यदि चश्मदीद गवाहों के बयान विश्वसनीय और चिकित्सा रिपोर्ट से मेल खाते हैं तो जांच अधिकारी की लापरवाही या चूक का लाभ आरोपियों को नहीं दिया जा सकता। ऐसा करना न्याय के साथ खिलवाड़ होगा और समाज का न्याय प्रणाली से भरोसा उठ जाएगा।
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यह फैसला न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह, न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने दोषी रामचंद्र और बाबू राम की अपील खारिज करते हुए सुनाया है। मामला बरेली के बहेड़ी थाना क्षेत्र के राजपुरा का है। दो जुलाई 1984 की रात जमीन के विवाद को सुलझाने के लिए बुलाई गई पंचायत के दौरान रामचंद्र, बाबू राम ने अपने ही रिश्तेदारों दामोदर और चंद्र पाल पर चाकू-लाठी से हमला कर दिया था। इससे दोनों भाइयों की मौके पर ही मौत हो गई थी।
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18 अक्तूबर 1985 को सत्र न्यायालय ने दोनों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके खिलाफ दोनों ने 1985 में ही हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। कोर्ट ने अपील खारिज कर कहा कि 40 साल पहले की घटना को याद करने में मामूली विसंगतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन इससे गवाहों की विश्वसनीयता संदिग्ध नहीं हो जाती। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद को बरकरार रखते हुए जमानत पर जेल से बाहर रह रहे दोनों दोषियों को तीन हफ्ते में समर्पण करने का आदेश दिया है।
कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने फैसले में कहा कि केवल इसलिए कि पुलिस हत्या में प्रयुक्त हथियार (चाकू) बरामद करने में विफल रही, दोषियों को बरी नहीं किया जा सकता। यदि चश्मदीद गवाहों के बयान विश्वसनीय और चिकित्सा रिपोर्ट से मेल खाते हैं तो जांच अधिकारी की लापरवाही या चूक का लाभ आरोपियों को नहीं दिया जा सकता। ऐसा करना न्याय के साथ खिलवाड़ होगा और समाज का न्याय प्रणाली से भरोसा उठ जाएगा।
