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हाईकोर्ट : अदालत निजी प्रतिशोध का हथियार नहीं, झूठी गवाही का मुकदमा चलाने की मांग खारिज
Thu, 20 Aug 2026 06:24 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 20 Aug 2026 06:24 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतें निजी प्रतिशोध का हथियार नहीं हैं। झूठे साक्ष्य की शिकायत पर तब तक संज्ञान नहीं लिया जा सकता, जब तक प्रश्नगत साक्ष्य दोषसिद्धि का वास्तविक कारण न बने।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतें निजी प्रतिशोध का हथियार नहीं हैं। झूठे साक्ष्य की शिकायत पर तब तक संज्ञान नहीं लिया जा सकता, जब तक प्रश्नगत साक्ष्य दोषसिद्धि का वास्तविक कारण न बने। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति राजबीर सिंह की एकल पीठ ने कानपुर नगर निवासी अंकित तिवारी की उस आपराधिक अपील को खारिज कर दिया, जिसमें पत्नी और ससुरालीजनों के खिलाफ झूठी गवाही का मुकदमा चलने की मांग की गई थी।
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मामला याची और उसकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। याची ने कानपुर नगर के न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पत्नी और उनके अन्य परिजनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग वाली दाखिल अर्जी खारिज कर दी गई थी। इसके खिलाफ याची ने पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। इसके खिलाफ पत्नी व उनके परिजनों ने तीन जनवरी 2025 को आपत्ति दाखिल की। इसके समर्थन में पत्नी की ओर से दाखिल हलफनामा 11 दिसंबर 2024 को सत्यापित हुआ था।
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याची ने पत्नी व उनके परिजनों के खिलाफ झूठा साक्ष्य दाखिल करने का आरोप लगा उन पर मुकदमा चलाने की मांग की। दलील दी कि आपत्तियां तैयार होने से पहले हलफनामा तैयार होना इस बात का प्रमाण है कि अदालत में झूठा साक्ष्य दिया गया। कोर्ट ने याची की दलील सिरे से खारिज कर दी। साथ ही स्पष्ट किया कि महज हलफनामे या अन्य किसी दस्तावेज की तारीख में तकनीकी विसंगति आधार पर झूठी गवाही या जालसाजी की कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।
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झूठी गवाही की कार्रवाई तभी होनी चाहिए, जब झूठ जानबूझकर और किसी ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य पर बोला गया हो, जिससे दोषसिद्धि की वास्तविक संभावना हो। कोर्ट ने यह भी पाया कि मामला पति-पत्नी के बीच उपजे मतभेद से जुड़ा है। आपसी अनबन के चलते एक दूसरे के खिलाफ प्रतिशोध में मुकदमेबाजी चल रही है। लिहाजा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कहा, अदालतें निजी प्रतिशोध का हथियार नहीं बन सकतीं। बीएनएसएस की धारा 379 का उद्देश्य झूठे मुकदमों से लोगों को सुरक्षा देना और न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना है। हर छोटी तकनीकी गलती पर अभियोजन शुरू करना इस प्रावधान के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।