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High Court : जज पर प्रभाव डालने का आरोप लगाने वाले याचियों पर एक लाख का जुर्माना

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 08 Feb 2026 02:26 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के न्यायाधीश पर शिकायतकर्ता के अधिवक्ता भाई के दबाव में गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी करने का आरोप लगाने वाले दो याचियों की तबादला याचिका खारिज कर दी।

High Court: Petitioners accused of influencing judge fined Rs 1 lakh
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के न्यायाधीश पर शिकायतकर्ता के अधिवक्ता भाई के दबाव में गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी करने का आरोप लगाने वाले दो याचियों की तबादला याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने आरोपों को बेबुनियाद और निराधार करार देते हुए याचियों पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही कहा है कि राशि जमा नहीं की जाती है तो ट्रायल कोर्ट डीएम के माध्यम से भू-राजस्व की तरह वसूली कराएगा।

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यह आदेश न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकल पीठ ने श्याम सुंदर और अन्य की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया। श्याम सुंदर और अन्य के खिलाफ झांसी के नवाबाद थाने में जबरन वसूली, मारपीट समेत गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। मामला झांसी की जिला अदालत में अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट में लंबित है। याचियों का आरोप था कि शिकायतकर्ता का सगा भाई झांसी जिला न्यायालय में अधिवक्ता है, उसने न्यायाधीश के चेंबर में मुलाकात कर उन्हें प्रभावित किया। इससे नवंबर में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया। इस आधार पर याचियों ने स्थानांतरण की मांग की थी।

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हलफनामे में लगाए गए अवमानना की श्रेणी में

शासकीय अधिवक्ता ने दलील कि हलफनामे में लगाए गए आरोप अदालत की अवमानना की श्रेणी में आते हैं। न्यायिक आदेश में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि आदेश किसी बाहरी दबाव में पारित किया गया हो। याची लगातार कार्यवाही टालने का प्रयास कर रहे हैं। इससे पहले हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने उनके खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इन्कार करते हुए उन्हें डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने की छूट दी थी। तब तक किसी प्रकार की कार्रवाई पर रोक लगाई थी।

इसके बाद भी याचियों ने न तो डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की और न ही ट्रायल कोर्ट के निर्देशों का पालन किया। कोर्ट ने कहा कि याचियों की ओर से दाखिल हलफनामा रिकॉर्ड के अवलोकन के आधार पर बताया गया है। जबकि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि संबंधित न्यायिक अधिकारी किसी प्रकार के दबाव या प्रभाव में आए हों।

ट्रायल कोर्ट के आदेश की लिखावट पर भी नाराजगी

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश की अपठनीय लिखावट पर भी नाराजगी जताई। कहा कि प्रस्तुत आदेश पांच पंक्तियों का था, जिसमें तारीख और एनबीडब्ल्यू शब्द के अलावा कुछ भी पढ़ने योग्य नहीं था। न्यायालय बार-बार निर्देश और परिपत्र जारी कर चुका है कि आदेश स्पष्ट-पठनीय होने चाहिए। इसके बावजूद संबंधित न्यायिक अधिकारी ने बिना देखे आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए। हाईकोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, झांसी को निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि संबंधित ट्रायल कोर्ट भविष्य में स्पष्ट और पठनीय आदेश पारित करे। साथ ही इस संबंध में दो सप्ताह में रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश भी दिया।

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