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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Kargil Vijay Diwas: The last letter, the final words, and a husband returning wrapped in the Tricolour.

Kargil Vijay Diwas : आखिरी खत, आखिरी बात और तिरंगे में लिपटा लौटा सुहाग

Sun, 26 Jul 2026 07:07 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 26 Jul 2026 07:07 PM IST
सार

कारगिल की जंग ने देश को कई वीर दिए लेकिन उनके पीछे छूटे परिवारों के हिस्से में ऐसा दर्द आया जो कभी खत्म नहीं हुआ। प्रयागराज के शहीदों की वीरांगनाएं आज भी पति का आखिरी खत, आखिरी मुलाकात और तिरंगे में लौटे सुहाग की यादें संजोए हैं।

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Kargil Vijay Diwas: The last letter, the final words, and a husband returning wrapped in the Tricolour.
कारगिल विजय दिवस - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कारगिल की जंग ने देश को कई वीर दिए लेकिन उनके पीछे छूटे परिवारों के हिस्से में ऐसा दर्द आया जो कभी खत्म नहीं हुआ। प्रयागराज के शहीदों की वीरांगनाएं आज भी पति का आखिरी खत, आखिरी मुलाकात और तिरंगे में लौटे सुहाग की यादें संजोए हैं। संघर्ष के लंबे सफर में उन्होंने न सिर्फ परिवार को संभाला, बल्कि बच्चों को सफल बनाकर शहीदों के सपनों को भी पूरा किया। 

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‘हमें लड़ाई नहीं लड़नी, सिर्फ जवानों तक राशन पहुंचाना है’

कुमहटपुर, प्रयागराज निवासी कारगिल युद्ध में शहीद हुए हवलदार कंचन सिंह की वीरांगना कुसमा देवी आज भी सात अगस्त, 1999 की वह बरसाती शाम नहीं भूल पातीं। वह बताती हैं कि रात करीब 7:30 बजे कुछ लोग आए और पति के शहीद होने की सूचना दी। अगले दिन उनका पार्थिव शरीर सैन्य सम्मान के साथ गांव पहुंचा।युद्ध से पहले पति 10 दिन की छुट्टी पर घर आए थे। हल्द्वानी जाते समय उन्होंने कहा था, ‘हमें लड़ाई नहीं लड़नी है, सिर्फ जवानों तक राशन पहुंचाना है।’ कुसमा को यह अंदाजा भी नहीं था कि वह पति की आखिरी विदाई कर रही हैं। 32 साल की उम्र में कुसमा ने अकेले दोनों बच्चों का पालन-पोषण किया। आज भी कुसमा 1999 की उस घटना को याद करके सहम जाती हैं और कहती हैं उनको तो बस राशन पहुंचाना था।
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संघर्ष से लिखी हौसले की नई इबारत

कारगिल युद्ध निर्णायक दौर में था। इसी बीच संतोष देवी के पास पति लालमणि यादव का पत्र आया। इसमें लिखा था कि उनकी यूनिट कारगिल जा रही है। उस पत्र के बाद इंतजार शुरू हुआ लेकिन लौटकर आया तो सिर्फ उनका पार्थिव शरीर। सितंबर 1999 को कारगिल की चोटियों पर लड़ते हुए लालमणि यादव शहीद हो गए। पार्थिव शरीर पूरे सैन्य सम्मान के साथ गांव पहुंचा। महज 35 वर्ष की उम्र में संतोष देवी के सामने चार छोटे बच्चों का भविष्य था। पति के नाम मिले पेट्रोल पंप की जिम्मेदारी संभाली और बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। संतोष कहती हैं, ‘सेना ने उनका हर सामान हमें सौंप दिया, बस वही नहीं लौटे’। बड़ी बेटी अंजू यादव को डॉक्टर बनाया और अन्य बच्चों को सरकार से मिले पेट्रोल पंप व अन्य कारोबार में लगाया। बाद में क्षेत्र में इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज की स्थापना की।

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