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तिरस्कार ने बनाया रोगी, दुश्मन लगने लगी बेटी: ससुराल वालों ने निकाला, मायके ने नहीं अपनाया; हुई मानसिक रोगी

पुनीत त्रिपाठी, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: Sharukh Khan Updated Mon, 22 Jun 2026 03:23 PM IST
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सार

यूपी के प्रयागराज से रिश्तों की झकझोर देने वाली कहानी सामने आई है। प्रसव के बाद महिला ने अपनी ही बेटी से मुंह फेर लिया है। महिला लड़का पाने के दबाव में मानसिक रोगी हो गई है। ससुराल वालों ने उसे निकाल दिया है। मायके वालों ने उसे अपनाया नहीं है। काउंसलिंग में पोस्टपार्टम डिप्रेशन रोग की पुष्टि हुई है।

Prayagraj News Family Rejection Leaves Woman Mentally Ill Know Full Details in Hindi
फाइल फोटो - फोटो : AI Generated
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विस्तार

दम तोड़ते रिश्तों की झकझोर देने वाली कहानी सामने आई है। कौशाम्बी की एक बेटी को अपनों से ऐसा तिरस्कार मिला कि वह अपना अस्तित्व ही भूल गई। बेटी पैदा हुई तो उसके प्रति भी विमुख हो गई। दरअसल, गर्भ में बेटी होने का पता चला तो ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया। मायके वालों ने भी साथ नहीं दिया। वह लावारिस हालत में भटकती रही। अब वह मानसिक रोगी हो चुकी है। उसकी बेटी अनाथों की तरह पल रही है।


अगस्त 2025 में किसी दिन मंझनपुर थाना क्षेत्र के एक ग्राम प्रधान ने पुलिस को सूचना दी कि एक गर्भवती महिला लावारिस हालत में पड़ी है। पुलिस ने उसे कौशाम्बी के वन स्टॉप सेंटर पहुंचाया। महिला के पैर में सफेद धब्बे थे। उसकी हालत ठीक नहीं थी। वह अपने बारे में कुछ बता नहीं पा रही थी।
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एक महीने तक महिला का उपचार चला। इस दौरान उसने एक बच्ची को जन्म दिया। प्रसव के बाद महिला ने बेटी से दूरी बना ली। पूरा-पूरा दिन वह उसकी तरफ देखती तक नहीं। इससे वन स्टॉप सेंटर के सदस्यों की परेशानी बढ़ गई।
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उसकी मनोचिकित्सक से काउंसलिंग कराई गई। बेहतर इलाज के लिए उसे प्रयागराज रेफर कर दिया गया। जांच में पाया गया कि महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन नामक मानसिक रोग की शिकार है। हालत थोड़ी ठीक हुई तो उसने बताया कि पति और सास-ससुर बेटा पैदा करने का दबाव बनाते थे। उसे घर से निकाल दिया गया है। उसके रहने का कोई ठिकाना नहीं है। वह मंझनपुर कैसे पहुंची, इस बारे में कुछ नहीं बता सकी।

ससुराल, ननिहाल और मायके में नहीं मिली जगह
पड़ताल में सामने आया कि महिला का मायका सिराथू के एक गांव में है। 12 साल की उम्र में मां की मौत हो गई। पिता ने दूसरी शादी कर ली। बेटी को नाना-नानी अपने साथ ले गए। उन्होंने सही उम्र में बेटी की शादी अयोध्या में कर दी थी। कुछ समय बाद नाना-नानी की भी मौत हो गई। इसके बाद से उसका मायके से संबंध खत्म हो गया। न तो पिता ने उसकी सुध ली, न ही मामा-मामी ने।
 

खोजबीन में पता चला कि महिला का 12 साल का एक बेटा भी है। सास नहीं है। ससुर ने बहू को रखने से मना कर दिया है। ससुर ने बताया कि उसका बेटा और बहू दोनों मानसिक रोगी हैं। ऐसे में वह सिर्फ पोते की ही परवरिश कर सकता है। ससुर का कहना है कि महिला अपने मन से घर से चली गई। महिला का कहना है कि उसे घर से निकाल दिया गया। ससुराल से निकाले जाने के बाद महिला को मंझनपुर ननिहाल और सिराथू में पिता के यहां रहने के लिए जगह नहीं मिली। मामा-मामी ने भी रखने से मना कर दिया।
 

कौन ले सुध, कौन कराए कार्रवाई
महिला बेसुध हालत में अनाथों की तरह रह रही है। ससुराल से निकाले जाने की स्थिति में उनके खिलाफ कौन शिकायत दे। कौन पैरवी करे, यह सवाल बना हुआ है? सवाल ये भी है कि अपना घर होते हुए भी क्या नवजात जीवन भर अनाथों की तरह रहेगी। वन स्टॉप सेंटर की टीम का कहना है कि इसके कानूनी पक्ष का अध्ययन किया जा रहा है। महिला की हालत में सुधार के बाद कोई निर्णय लिया जाएगा।
 

गर्भवती महिलाओं का अधिक चिंता करना पोस्टपार्टम मानसिक रोग का कारण है। फिलहाल महिला का उपचार चल रहा है। महिला के सामने शर्त रखी गई है कि वह दवा खाने के बाद ही अपनी बच्ची से मिल सकती है। दिन में जब उसे बच्ची की याद आती है तो दवा दी जाती है। उसकी काउंसलिंग और थेरेपी चल रही है। -पंकज कौटार्य, नैदानिक मनोवैज्ञानिक, कॉल्विन अस्पताल।

महिलाओं को मुख्य रूप से एंटीडिप्रेसेंट (उदासी-रोधी) दवाएं और कुछ मामलों में नई न्यूरोएक्टिव दवाएं दी जा रही हैं। इन दवाओं का चयन महिला के लक्षणों की गंभीरता और स्तनपान कराने की स्थिति के आधार पर तय किया जाता है। फिलहाल महिला पहले से थोड़ी बेहतर है।-डॉ. राकेश पासवान, मनोचिकित्सक परामर्शदाता, कॉल्विन अस्पताल।
 
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