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Amroha News: गुरु जंभेश्वर ने करुणा, संयम और प्रकृति संरक्षण को बनाया धर्म का मूल
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अमरोहा के जेएस हिंदू पीजी कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते अतिथि। स्रोत कॉलेज
- फोटो : संवाद
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अमरोहा। जेएस हिंदू पीजी कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हो गया। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली की ओर से दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी गुरु जंभेश्वर का दार्शनिक चिंतन विषय पर आयोजित की गई।
आचार्य सत्य देवानंद ने जंभवाणी को लोकभाषा में व्यक्त उच्च दर्शन की परंपरा बताते हुए कहा कि गुरु जंभेश्वर महाराज ने करुणा, संयम और प्रकृति-संरक्षण को धर्म का मूल बनाया। उन्होंने जीव दया पालणी और रूंख लीला न काटसी जैसे शब्द-सूत्रों को आज के पर्यावरणीय संकट का समाधान बताया।
प्रोफेसर अशोक कुमार रुस्तगी ने कहा कि जंभवाणी के 120 शब्द और 29 नियम भारतीय समाज के लिए एक समग्र सामाजिक आचार-संहिता हैं, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं। उन्होंने विश्नोई पंथ को समकालीन वैश्विक संकटों, जलवायु परिवर्तन, नैतिक पतन और सामाजिक विघटन के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक बताया।
मुख्य अतिथि प्रो. अतवीर यादव ने समाजशास्त्रीय दृष्टि से विश्नोई पंथ का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह पंथ व्यक्ति को उपभोक्ता नहीं, बल्कि संरक्षक बनाता है। उन्होंने 29 नियमों को व्यक्ति, समाज एवं विश्व के कल्याण का माध्यम बताया। मुख्य वक्ता प्रो. किशनाराम विश्नोई ने गुरु जंभेश्वर के विचारों की भारतीय दर्शन एवं गीता, उपनिषद आदि भारतीय संस्कृति के आधार ग्रंथों के आलोक में समीक्षा प्रस्तुत की। संगोष्ठी में पढे़ गए शोधपत्रों की सराहना की।
विशिष्ट वक्ता डाॅ. सत्यकेतु ने जम्भवाणी में समाहित शब्दों का दार्शनिक दृष्टिकोण से विवेचन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि इस संगोष्ठी में आठ तकनीकी सत्रों के माध्यम से लगभग 350 प्रतिभागियों ने भाग लिया। सभी प्रतिभागियों के निशुल्क रजिस्ट्रेशन किए गए।
इस संगोष्ठी में राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, दिल्ली आदि दर्जन भर राज्यों के विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लेते हुए गुरु जंभेश्वर के दार्शनिक चिंतन के संबंध में शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
प्राचार्य प्रोफेसर वीर वीरेंद्र सिंह ने बताया कि यह संगोष्ठी महाविद्यालय में हर साल आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की शृंखला में से एक है। इससे महाविद्यालय के शोधार्थियों को शोध दृष्टि मिलेगी तथा शोध का वातावरण बनाने में सहयोग प्राप्त होगा। इस दौरान विभिन्न विश्वविद्यालय के शोधार्थी प्राध्यापक प्रतिभागी मौजूद रहे।
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आचार्य सत्य देवानंद ने जंभवाणी को लोकभाषा में व्यक्त उच्च दर्शन की परंपरा बताते हुए कहा कि गुरु जंभेश्वर महाराज ने करुणा, संयम और प्रकृति-संरक्षण को धर्म का मूल बनाया। उन्होंने जीव दया पालणी और रूंख लीला न काटसी जैसे शब्द-सूत्रों को आज के पर्यावरणीय संकट का समाधान बताया।
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प्रोफेसर अशोक कुमार रुस्तगी ने कहा कि जंभवाणी के 120 शब्द और 29 नियम भारतीय समाज के लिए एक समग्र सामाजिक आचार-संहिता हैं, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं। उन्होंने विश्नोई पंथ को समकालीन वैश्विक संकटों, जलवायु परिवर्तन, नैतिक पतन और सामाजिक विघटन के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक बताया।
मुख्य अतिथि प्रो. अतवीर यादव ने समाजशास्त्रीय दृष्टि से विश्नोई पंथ का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह पंथ व्यक्ति को उपभोक्ता नहीं, बल्कि संरक्षक बनाता है। उन्होंने 29 नियमों को व्यक्ति, समाज एवं विश्व के कल्याण का माध्यम बताया। मुख्य वक्ता प्रो. किशनाराम विश्नोई ने गुरु जंभेश्वर के विचारों की भारतीय दर्शन एवं गीता, उपनिषद आदि भारतीय संस्कृति के आधार ग्रंथों के आलोक में समीक्षा प्रस्तुत की। संगोष्ठी में पढे़ गए शोधपत्रों की सराहना की।
विशिष्ट वक्ता डाॅ. सत्यकेतु ने जम्भवाणी में समाहित शब्दों का दार्शनिक दृष्टिकोण से विवेचन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि इस संगोष्ठी में आठ तकनीकी सत्रों के माध्यम से लगभग 350 प्रतिभागियों ने भाग लिया। सभी प्रतिभागियों के निशुल्क रजिस्ट्रेशन किए गए।
इस संगोष्ठी में राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, दिल्ली आदि दर्जन भर राज्यों के विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लेते हुए गुरु जंभेश्वर के दार्शनिक चिंतन के संबंध में शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
प्राचार्य प्रोफेसर वीर वीरेंद्र सिंह ने बताया कि यह संगोष्ठी महाविद्यालय में हर साल आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की शृंखला में से एक है। इससे महाविद्यालय के शोधार्थियों को शोध दृष्टि मिलेगी तथा शोध का वातावरण बनाने में सहयोग प्राप्त होगा। इस दौरान विभिन्न विश्वविद्यालय के शोधार्थी प्राध्यापक प्रतिभागी मौजूद रहे।
