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Auraiya News: अपील में देरी को जिला जज ने किया माफ, 500 रुपये जुर्माना
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औरैया। जनपद न्यायाधीश मयंक चौहान की अदालत ने सिविल अपील दायर करने में हुई देरी को पर्याप्त कारण मानते हुए स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने विपक्षी की आपत्ति को दरकिनार करते हुए 500 रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही अपील को नियमित सुनवाई के लिए स्वीकार करने का आदेश दिया है। अब मामले की सुनवाई के लिए 27 मई की तारीख नियत की गई है।
मामला सुभाष चंद्र श्रीवास्तव बनाम लक्ष्मी देवी के बीच चल रहे एक दीवानी विवाद से जुड़ा है। निचली अदालत ने मामले में 27 फरवरी 2026 को अपना फैसला सुनाया था। नियमानुसार फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील एक निश्चित समय सीमा के भीतर करनी थी। अपीलकर्ता सुभाष चंद्र ने अदालत को बताया कि उन्होंने फैसले की प्रमाणित नकल के लिए 10 मार्च 2026 को आवेदन किया था जो उन्हें 31 मार्च 2026 को प्राप्त हुई। इसके बाद रुपये का इंतजाम करने और वकील के माध्यम से कागजात तैयार करवाने में समय लग गया जिसके कारण अपील समय पर दाखिल नहीं हो सकी।
लक्ष्मी देवी की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि अपीलकर्ता व्यापारी हैं। उनके पास रुपयों की कोई कमी नहीं है। देरी के लिए दिए गए तर्क पूरी तरह निराधार और असत्य हैं। बृहस्पतिवार को जनपद न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद परिसीमा अधिनियम का हवाला दिया। न्यायालय ने 500 रुपये के जुर्माना पर देरी माफ करने का प्रार्थना पत्र स्वीकार कर लिया।
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मामला सुभाष चंद्र श्रीवास्तव बनाम लक्ष्मी देवी के बीच चल रहे एक दीवानी विवाद से जुड़ा है। निचली अदालत ने मामले में 27 फरवरी 2026 को अपना फैसला सुनाया था। नियमानुसार फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील एक निश्चित समय सीमा के भीतर करनी थी। अपीलकर्ता सुभाष चंद्र ने अदालत को बताया कि उन्होंने फैसले की प्रमाणित नकल के लिए 10 मार्च 2026 को आवेदन किया था जो उन्हें 31 मार्च 2026 को प्राप्त हुई। इसके बाद रुपये का इंतजाम करने और वकील के माध्यम से कागजात तैयार करवाने में समय लग गया जिसके कारण अपील समय पर दाखिल नहीं हो सकी।
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लक्ष्मी देवी की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि अपीलकर्ता व्यापारी हैं। उनके पास रुपयों की कोई कमी नहीं है। देरी के लिए दिए गए तर्क पूरी तरह निराधार और असत्य हैं। बृहस्पतिवार को जनपद न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद परिसीमा अधिनियम का हवाला दिया। न्यायालय ने 500 रुपये के जुर्माना पर देरी माफ करने का प्रार्थना पत्र स्वीकार कर लिया।