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Auraiya News: फाग गायन की टोली में अब युवा शामिल
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Tue, 03 Mar 2026 10:18 PM IST
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फोटो-12- रुरुगंज में होली के मौके पर भाग गाती युवाओं की टोली। संवाद
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औरैया। समय के साथ होने वाले बदलाव का असर पारंपरिक संगीत पर भी दिखाई देता है। इसमें फाग गायन भी शामिल है।
होली पर ढोलक, झाल और मंजीरे पर गाया जाने वाला फाग अब बहुत ही कम स्थानों पर सुनने को मिलता है। ऐसे में रुरुगंज क्षेत्र में बुजुर्गों ने इसमें युवाओं को भी शामिल किया है। यहां कोई युवा ढोलक तो कोई मंजीरे बजाकर फाग गायन में अपनी भूमिका निभा रहा है।
रुरुगंज गांव के लोगों का कहना है कि एक समय था जब वसंत पंचमी के बाद से ही गांवों में जगह-जगह मतवालों की टोली बैठकर फाग गाती हुई मिलती थी। यह क्रम होली के दिन तक चलता था। इसके बाद जिस दिन होलिका दहन होता था, उस दिन होली जलने से पूर्व भी गांव के एक सार्वजनिक स्थान पर लोग जुटते थे और फाग का गायन करते थे।
इसके बाद जोगिरा गाते हुए होलिका दहन होता था। देर रात को लोग सोने जाते थे। फिर सुबह उठकर लोगों के दरवाजे-दरवाजे घूमकर फाग का गायन करते हुए घूमते थे।
महिलाएं घर की छतों से उनके ऊपर रंगों की बारिश करती थी, लेकिन समय के साथ सब बदल गया। नई पीढ़ी होली के दिन डीजे लगाकर जगह-जगह झूमती नजर आती है। ऐसे में युवाओं का फाग के प्रति लगाव बढ़ाने के लिए बुजुर्ग अब अपनी टोली में युवाओं को शामिल करने लगे हैं। उन्हें फाग का महत्व भी समझ आने लगा है। राग से लेकर वाद्य यंत्र बजाने की तरकीब भी वह समझने लगे हैं।
टोली में शामिल
होली के उपलक्ष्य में रोजाना फाग गायन का हिस्सा बन रहे हैं। मंजीरा बजाकर टोली का हिस्सा बने हैं। फाग की राग अब समझ आने लगी है।-सत्यम गुप्ता
लय ठीक हो रही
फाग की टोली में ढोलक बजाने की जिम्मेदारी मिली है। गायन भी आने लगा है। राग में कुछ हद तक कमजोरी है। अगले साल तक लय आ जाएगी।-धर्मेंद्र कुमार
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होली पर ढोलक, झाल और मंजीरे पर गाया जाने वाला फाग अब बहुत ही कम स्थानों पर सुनने को मिलता है। ऐसे में रुरुगंज क्षेत्र में बुजुर्गों ने इसमें युवाओं को भी शामिल किया है। यहां कोई युवा ढोलक तो कोई मंजीरे बजाकर फाग गायन में अपनी भूमिका निभा रहा है।
रुरुगंज गांव के लोगों का कहना है कि एक समय था जब वसंत पंचमी के बाद से ही गांवों में जगह-जगह मतवालों की टोली बैठकर फाग गाती हुई मिलती थी। यह क्रम होली के दिन तक चलता था। इसके बाद जिस दिन होलिका दहन होता था, उस दिन होली जलने से पूर्व भी गांव के एक सार्वजनिक स्थान पर लोग जुटते थे और फाग का गायन करते थे।
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इसके बाद जोगिरा गाते हुए होलिका दहन होता था। देर रात को लोग सोने जाते थे। फिर सुबह उठकर लोगों के दरवाजे-दरवाजे घूमकर फाग का गायन करते हुए घूमते थे।
महिलाएं घर की छतों से उनके ऊपर रंगों की बारिश करती थी, लेकिन समय के साथ सब बदल गया। नई पीढ़ी होली के दिन डीजे लगाकर जगह-जगह झूमती नजर आती है। ऐसे में युवाओं का फाग के प्रति लगाव बढ़ाने के लिए बुजुर्ग अब अपनी टोली में युवाओं को शामिल करने लगे हैं। उन्हें फाग का महत्व भी समझ आने लगा है। राग से लेकर वाद्य यंत्र बजाने की तरकीब भी वह समझने लगे हैं।
टोली में शामिल
होली के उपलक्ष्य में रोजाना फाग गायन का हिस्सा बन रहे हैं। मंजीरा बजाकर टोली का हिस्सा बने हैं। फाग की राग अब समझ आने लगी है।-सत्यम गुप्ता
लय ठीक हो रही
फाग की टोली में ढोलक बजाने की जिम्मेदारी मिली है। गायन भी आने लगा है। राग में कुछ हद तक कमजोरी है। अगले साल तक लय आ जाएगी।-धर्मेंद्र कुमार

फोटो-12- रुरुगंज में होली के मौके पर भाग गाती युवाओं की टोली। संवाद

फोटो-12- रुरुगंज में होली के मौके पर भाग गाती युवाओं की टोली। संवाद
