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Auraiya News: ढोलक की थाप गायब, मोबाइल तक सिमटा होली का उल्लास

Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sun, 01 Mar 2026 11:06 PM IST
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The beats of the dholak are gone, Holi celebrations are confined to mobile phones.
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अछल्दा। कभी होली का मतलब केवल रंग नहीं होता था, वह पूरे गांव की जान हुआ करती थी। फाल्गुन लगते ही माहौल बदल जाता था। खेतों में सरसों झूमती थी और गलियों में ढोलक की थाप पर फाग गीत गूंजने लगते थे। अब हालात ऐसे बदले कि फाग की टोलियां नदारद हो गईं और सब कुछ मोबाइल पर निर्भर हो गया।
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होली आने से लगभग एक माह पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती थीं। महिलाएं घरों की दीवारों पर चीका और पीली मिट्टी से लिपाई पुताई कर घरों को नया रूप देती थीं। शाम ढलते ही चौपाल सजती थी। बुजुर्ग रसिया छेड़ते, युवक सुर में सुर मिलाते और बच्चे तालियां बजाकर उत्साह बढ़ाते थे। सुबह प्रभात फेरियां निकलतीं। इनमें भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलता था। होली आपसी प्रेम और अपनत्व का पर्व थी। देवर-भाभी की नोकझोंक, मित्रों की ठिठोली और बच्चों की शरारतें त्योहार की असली पहचान थी। युवक होलिका दहन के लिए लकड़ियां इकट्ठा करते नजर आते थे। अब समय के साथ तस्वीर बदल गई। अब ढोलक की जगह डीजे ने ले ली है और चौपाल की जगह मोबाइल फोन की स्क्रीन दमक रही है।(संवाद)
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