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दीक्षांत समारोह: डिग्री के साथ रोजगारपरक कौशल भी सीखें विद्यार्थी, आनंदीबेन पटेल ने विद्यार्थियों को दी बधाई

Tue, 11 Aug 2026 03:42 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़।
अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़। Published by: Pragati Chand Updated Tue, 11 Aug 2026 03:42 PM IST
सार

Azamgarh News: महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने 63,084 उपाधियां पाने वाले विद्यार्थियों को बधाई दी। इस दौरान उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय स्थानीय जरूरत के अनुसार दो-तीन माह के सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करें, शिक्षा को रोजगार से जोड़ना जरूरी है। 

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Governor Anandiben Patel attended convocation ceremony of Maharaja Suheldev University in Azamgarh
महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं राज्यपाल आनंदीबेन पटेल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के तृतीय दीक्षांत समारोह में मंगलवार को राज्यपाल एवं कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने विद्यार्थियों को डिग्री के साथ रोजगारपरक कौशल हासिल करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि युवाओं को आत्मनिर्भर और रोजगार योग्य बनाना भी है। विश्वविद्यालयों को ऐसे छोटे अवधि के सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करने चाहिए, जिनसे विद्यार्थी अपनी नियमित पढ़ाई के साथ कोई अतिरिक्त कौशल सीखकर रोजगार प्राप्त कर सकें।

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राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में दोपहर के बाद उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए रोजगार की जरूरत वाले विद्यार्थियों को चिह्नित किया जाए। उनकी रुचि के अनुसार दो-तीन माह के सर्टिफिकेट कोर्स संचालित किए जाएं। इससे विद्यार्थियों के पास नियमित डिग्री के साथ अतिरिक्त प्रमाणपत्र होगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि सीखना कभी समाप्त नहीं होता। व्यक्ति को आजीवन विद्यार्थी बने रहना चाहिए। 
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उन्होंने अपने एमएड करने का उदाहरण देते हुए कहा कि नौकरी के दौरान भी उन्होंने शनिवार और रविवार को विश्वविद्यालय जाकर पढ़ाई की। महिलाओं और अन्य ऐसे लोगों के लिए भी ऑनलाइन बिक्री, केवाईसी सहित अलग-अलग रोजगारपरक पाठ्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए, जो पढ़ना और अपने काम में आगे बढ़ना चाहते हैं। 

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राज्यपाल ने बताया कि दीक्षांत समारोह के तहत 63,084 उपाधियां डिजीलॉकर पर अपलोड की गई हैं। इनमें 42,724 छात्राएं और 20,360 छात्र शामिल हैं। कुल उपाधियों में छात्राओं की हिस्सेदारी करीब दो तिहाई है। उन्होंने छात्राओं की इस उपलब्धि पर प्रसन्नता जताते हुए कहा कि बेटियां उच्च शिक्षा में लगातार आगे बढ़ रही हैं।
उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से छात्रों की संख्या कम होने का कारण भी पूछा। 

बताया गया कि बड़ी संख्या में युवक रोजगार की तलाश में मुंबई सहित दूसरे शहरों में चले जाते हैं। राज्यपाल ने कहा कि ऐसे युवाओं को स्थानीय स्तर पर कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की दिशा में भी विश्वविद्यालय को काम करना चाहिए। दीक्षांत समारोह में 74 विद्यार्थियों को 88 पदक प्रदान किए गए। इनमें 48 छात्राएं और 25 छात्र शामिल रहे। राज्यपाल ने पदक विजेताओं के साथ उनके अभिभावकों को भी बधाई दी। 

महाराजा सुहेलदेव के जीवन से विद्यार्थियों को जोड़ें 
आजमगढ़ में राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालय जिस महापुरुष के नाम पर स्थापित है, विद्यार्थियों को उनके जीवन और योगदान के बारे में जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों से उनके नाम से जुड़े महापुरुषों के जीवन पर उपलब्ध पुस्तकों को पुस्तकालय में तलाशने और विद्यार्थियों को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करने को कहा गया है। उन्होंने कहा कि केवल भवन या विश्वविद्यालय का नाम किसी महापुरुष के नाम पर रख देना पर्याप्त नहीं है। पूरे वर्ष उनके जीवन, संघर्ष और योगदान पर कार्यक्रम होने चाहिए। यदि संबंधित स्थान आसपास है तो विद्यार्थियों को वहां ले जाकर उनके जीवन से परिचित कराया जाए और परिवार के लोगों से भी मिलवाया जाए। संबद्ध महाविद्यालयों को भी इस दिशा में काम करना चाहिए।

पं. हरिप्रसाद चौरसिया की मौजूदगी गौरव का विषय
राज्यपाल ने समारोह के मुख्य अतिथि एवं विश्वविख्यात बांसुरी वादक पद्म विभूषण पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की उपस्थिति को विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय बताया। उन्होंने कहा कि अपनी साधना, समर्पण और निरंतर अभ्यास से पंडित चौरसिया ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई है। उनका जीवन विद्यार्थियों को अनुशासन, निरंतर अभ्यास और उत्कृष्टता के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने पीलीभीत में बांसुरी के स्टॉल से 25 बांसुरी खरीदकर राजभवन के बच्चों को बांसुरी सिखाने का उदाहरण भी सुनाया। कहा कि अलग-अलग प्रतिभाओं और संसाधनों को जोड़कर बच्चों के लिए नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

विश्वविद्यालय की डिजिटल व्यवस्था की सराहना
आनंदीबेन पटेल ने महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय में डिजिटल प्रशासन, समयबद्ध परीक्षा प्रणाली, उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन, समर्थ पोर्टल, शोध पीठों की स्थापना और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ शैक्षणिक सहयोग की सराहना की। उन्होंने अखिल भारतीय विश्वविद्यालय संघ की सदस्यता को विश्वविद्यालय की बढ़ती शैक्षणिक प्रतिष्ठा का प्रमाण बताया। उन्होंने शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के लिए लागू बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था, केंद्रीय पुस्तकालय और स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना को भी सकारात्मक पहल बताया। कहा कि विश्वविद्यालय की शुरुआत में बनाई गई पारदर्शी और व्यवस्थित कार्यप्रणाली आने वाले वर्षों तक बनी रहनी चाहिए।
 
एआई के उपयोग में नैतिकता और जिम्मेदारी जरूरी
राज्यपाल ने कहा कि भारत दुनिया के अग्रणी स्टार्टअप इकोसिस्टम के रूप में उभर रहा है। नवाचार, उद्यमिता और प्रौद्योगिकी देश के विकास को गति दे रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक का उपयोग पारदर्शिता, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से नशे से दूर रहने, स्वस्थ और अनुशासित जीवन अपनाने तथा योग, खेल और सकारात्मक चिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। डिजिटल माध्यमों का विवेकपूर्ण उपयोग करने और साइबर अपराध तथा डिजिटल व्यसन से बचने की सलाह दी।

दूसरों से नहीं, स्वयं से करें प्रतियोगिता
राज्यपाल ने कहा कि विद्यार्थियों को दूसरों से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। अपनी प्रगति का आकलन अपने पिछले प्रदर्शन से करना चाहिए। दूसरों से तुलना परेशानी बढ़ा सकती है, जबकि स्वयं से प्रतियोगिता व्यक्ति को बेहतर बनाने में मदद करती है। उन्होंने कहा कि डिग्री हासिल करने के बाद शिक्षा समाप्त नहीं होती। जीवन स्वयं एक विश्वविद्यालय है और हर दिन कुछ नया सीखने का अवसर देता है। उन्होंने विद्यार्थियों से समस्याओं के समाधान खोजने और समाधान न मिलने पर नया समाधान तैयार करने का साहस रखने की अपील की।
 
नई शिक्षा नीति ने खोले नए अवसर
राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने उच्च शिक्षा में नवाचार, अनुसंधान, बहुविषयक अध्ययन और कौशल विकास के नए अवसर खोले हैं। शिक्षा अब केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रयोगशालाओं, उद्योगों, स्टार्टअप और समाज से जुड़ रही है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ खेल, संगीत, चित्रकला, लेखन और अन्य प्रतिभाओं को विकसित करने का अवसर मिलना चाहिए। शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि जिन बच्चों में कोई विशेष प्रतिभा है, उन्हें पहचानकर आगे बढ़ाएं। कमजोर लिखावट या किसी अन्य कमी वाले बच्चे को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उसकी क्षमता को निखारने का प्रयास करना चाहिए।
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