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Bahraich News: हिंदी रक्षा आंदोलन में बहराइच से भी भरी गई थी हुंकार
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सत्य नारायण सिंह की फाइल फोटो।
- फोटो : सत्य नारायण सिंह की फाइल फोटो।
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बहराइच। पंजाब के हिंदी रक्षा आंदोलन के दौरान बहराइच के कैसरगंज स्थित गुथिया गांव निवासी सत्य नारायण सिंह सत्याग्रहियों का नेतृत्व कर रहे थे। उन्हें पंजाब में गिरफ्तार किया गया और जालंधर जेल भेज दिया। वहां उन्होंने तीन महीने तेरह दिन की सजा काटी। शुक्रवार को ग्राम गुथिया में उनकी जयंती पर गोष्ठी आयोजित की गई।
गोष्ठी के संयोजक तथा सत्य नारायण सिंह के पौत्र डॉ. सत्य भूषण सिंह ने कहा कि 1957 में हिंदी रक्षा आंदोलन में उनकी भूमिका जिले के लिए गौरव का विषय है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति राजनीतिक कारणों से 1957 में पंजाब की तत्कालीन प्रताप सिंह कैरो की सरकार ने राष्ट्रभाषा के प्रति भेदभाव का रुख अपनाया था। इसकी प्रतिक्रिया में पंजाब व दिल्ली में एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया जिसे ‘हिंदी रक्षा आंदोलन’ का नाम मिला।
असिस्टेंट प्रोफेसर धर्मवीर सिंह ने कहा कि इस आंदोलन में बहराइच के सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व करते हुए सत्यनारायण सिंह चंडीगढ़ पहुंचे। वहां उनको सर्वाधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया। बाद में वे गिरफ्तार होकर विचाराधीन कैदी के रूप में जालंधर जेल में तीन माह तेरह दिन रहे। सत्याग्रहियों की व्यवस्थापिका सभा के प्रधान चुने गए थे। उनकी निष्ठा और कर्मठता से प्रभावित होकर देश के कोने-कोने से आए हुए सत्याग्रहियों ने उन्हें विशाल मानपत्र देकर 14 दिसंबर 1957 को सम्मानित किया।
शिक्षक वीपी सिंह ने कहा सत्यनारायण सिंह का जन्म 1 मई 1907 को कैसरगंज के निकट स्थित ग्राम गुथिया में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। 1947 से पूर्व उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। 1952 में देश के पहले संसदीय चुनाव में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में चुनाव चिह्न दीपक से बहराइच पश्चिमी (कैसरगंज) लोकसभा क्षेत्र से लड़े।
समाजसेवी विशाल कश्यप ने कहा 1952 में आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में शामिल होकर उन्होंने कोलैला घाट से श्रावस्ती तक पद यात्रा की थी। शोध छात्रा साधना सिंह ने कहा कि उन्होंने जिले में अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। वे समाज और शिक्षा के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे। 27 नवंबर 1963 को उनका निधन हो गया।
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गोष्ठी के संयोजक तथा सत्य नारायण सिंह के पौत्र डॉ. सत्य भूषण सिंह ने कहा कि 1957 में हिंदी रक्षा आंदोलन में उनकी भूमिका जिले के लिए गौरव का विषय है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति राजनीतिक कारणों से 1957 में पंजाब की तत्कालीन प्रताप सिंह कैरो की सरकार ने राष्ट्रभाषा के प्रति भेदभाव का रुख अपनाया था। इसकी प्रतिक्रिया में पंजाब व दिल्ली में एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया जिसे ‘हिंदी रक्षा आंदोलन’ का नाम मिला।
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असिस्टेंट प्रोफेसर धर्मवीर सिंह ने कहा कि इस आंदोलन में बहराइच के सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व करते हुए सत्यनारायण सिंह चंडीगढ़ पहुंचे। वहां उनको सर्वाधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया। बाद में वे गिरफ्तार होकर विचाराधीन कैदी के रूप में जालंधर जेल में तीन माह तेरह दिन रहे। सत्याग्रहियों की व्यवस्थापिका सभा के प्रधान चुने गए थे। उनकी निष्ठा और कर्मठता से प्रभावित होकर देश के कोने-कोने से आए हुए सत्याग्रहियों ने उन्हें विशाल मानपत्र देकर 14 दिसंबर 1957 को सम्मानित किया।
शिक्षक वीपी सिंह ने कहा सत्यनारायण सिंह का जन्म 1 मई 1907 को कैसरगंज के निकट स्थित ग्राम गुथिया में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। 1947 से पूर्व उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। 1952 में देश के पहले संसदीय चुनाव में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में चुनाव चिह्न दीपक से बहराइच पश्चिमी (कैसरगंज) लोकसभा क्षेत्र से लड़े।
समाजसेवी विशाल कश्यप ने कहा 1952 में आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में शामिल होकर उन्होंने कोलैला घाट से श्रावस्ती तक पद यात्रा की थी। शोध छात्रा साधना सिंह ने कहा कि उन्होंने जिले में अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। वे समाज और शिक्षा के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे। 27 नवंबर 1963 को उनका निधन हो गया।
